Habeas Corpus याचिका की खारिज, हाईकोर्ट ने कहा स्वेच्छा से विवाह करने वाली बालिग महिला को माता-पिता के पास लौटने के लिए मजबूर नहीं किया जा सकता

इलाहाबाद हाईकोर्ट ने रामपुर निवासी राकेश कुमार की Habeas Corpus याचिका खारिज कर दी है और कहा है कि वयस्क महिला अपनी मर्जी से अपने रहने की जगह और साथी चुनने के लिए पूरी तरह स्वतंत्र है, और उसके माता-पिता की नाराजगी इसका आधार नहीं बन सकती. रामपुर निवासी राकेश कुमार ने Habeas Corpus याचिका दायर कर आरोप लगाया कि उनकी बेटी निकिता (लगभग 20 वर्ष) को प्रतिवादी मनीष बहला फुसलाकर ले गया है.
इस संबंध में 22 जून 2026 को थाना बिलारी, जिला मुरादाबाद में भारतीय न्याय संहिता की धारा 87 के तहत मनीष और अजीत के खिलाफ एफआईआर दर्ज कराई गई है. याचिकाकर्ता के वकील ने यह भी दलील दी कि मनीष पहले से विवाहित है, इसलिए निकिता के साथ हुआ विवाह कानूनी रूप से मान्य नहीं है.
राज्य सरकार की ओर से पेश अतिरिक्त शासकीय अधिवक्ता ने बताया कि जांच के दौरान मजिस्ट्रेट के समक्ष निकिता का बयान दर्ज कराया गया, जिसमें उसने कहा कि परिवार वाले उसकी शादी एक मानसिक रूप से अस्वस्थ व्यक्ति से करना चाहते थे. इस प्रस्ताव को अस्वीकार करते हुए वह 21/22 जून 2026 की रात करीब 12 बजे अपने घर से खुद निकली, मनीष के साथ बरेली गई, वहां 22 जून को दोनों ने विवाह किया और वह अब अपनी मर्जी से ससुराल में रह रही है.
उसने किसी तरह के दबाव, धमकी या अवैध बंधक बनाए जाने से इन्कार किया, हालांकि उसने यह आशंका जताई कि पति के रिश्तेदार शादी से खुश नहीं हैं और उसे धमकियां दे रहे हैं. जस्टिस संदीप जैन ने कहा कि रिकॉर्ड से स्पष्ट है कि निकिता की जन्मतिथि 1 जनवरी 2006 है, यानी घर छोड़ने के समय वह वयस्क हो चुकी थी. कोर्ट ने कहा कि जब यह साबित हो जाए कि संबंधित व्यक्ति बालिग है और अपनी इच्छा से किसी स्थान पर रह रहा है, तो अदालत उसे केवल माता-पिता की असहमति के आधार पर वापस लौटने का आदेश नहीं दे सकती.
एक वयस्क महिला को अपना निवास स्थान और साथी चुनने का पूरा अधिकार है, और यह स्वायत्तता संविधान के अनुच्छेद 21 के तहत जीवन और व्यक्तिगत स्वतंत्रता के अधिकार का अभिन्न हिस्सा है. इन तथ्यों के आधार पर कोर्ट ने पाया कि गैरकानूनी बंधक बनाए जाने का कोई मामला नहीं बनता और Habeas Corpus याचिका को खारिज कर दिया.
गिरफ्तारी के कारण न बताने पर आरोपी को तुरंत रिहा करने का आदेश, Habeas Corpus याचिका स्वीकार

इलाहाबाद हाईकोर्ट ने एक महत्वपूर्ण फैसले में पुलिस द्वारा गिरफ्तारी का आधार न बताए जाने के मामले में याची की गिरफ्तारी और हिरासत को अवैध करार देते हुए उसे तत्काल रिहा करने का आदेश दिया है. जस्टिस सिद्धार्थ और जस्टिस विनय कुमार द्विवेदी की खंडपीठ ने आलोक सिंह एवं अन्य की Habeas Corpus याचिका पर यह आदेश पारित किया.
याचिकाकर्ताओं के अधिवक्ता सतीष कुमार सिंह ने अदालत में दलील दी कि पुलिस ने याचिकाकर्ता संख्या 1 को गिरफ्तार करते समय गिरफ्तारी के कारण न तो लिखित रूप में दर्ज किए और न ही उसे बताए गए. याचिका में इस संबंध में स्पष्ट रूप से आवश्यक तथ्य दर्ज किए गए थे. राज्य सरकार की ओर से दाखिल जवाबी हलफनामे में इस तथ्य से इन्कार नहीं किया गया.

हलफनामे में केवल इतना कहा गया कि याचिकाकर्ता को एस.आई. नितिन कुमार द्वारा चेकिंग के दौरान गिरफ्तार कर हिरासत में लिया गया था, लेकिन यह नहीं बताया गया कि उसे गिरफ्तारी के कारण सूचित किए गए थे. यहां तक कि हलफनामे के साथ गिरफ्तारी के आधार का कोई अभिलेख भी अदालत में प्रस्तुत नहीं किया गया.
खंडपीठ ने कहा कि राज्य सरकार की ओर से पेश अपर शासकीय अधिवक्ता इस तथ्य का खंडन नहीं कर सके कि याचिकाकर्ता को गिरफ्तारी के कारणों की जानकारी नहीं दी गई थी. इसके आधार पर अदालत ने पाया कि याचिकाकर्ता संख्या 1 की गिरफ्तारी और हिरासत अवैध है. अदालत ने आदेश दिया कि याचिकाकर्ता को इस आदेश की प्रमाणित प्रति मिलने का इंतजार किए बिना तत्काल रिहा किया जाए. साथ ही, स्पष्ट किया कि विधि के अनुसार सरकार व विपक्षी याचिकाकर्ता के विरुद्ध पुनः कार्यवाही करने के लिए स्वतंत्र होंगे.