Dependent on deceased की नियुक्ति खैरात में नहीं मांगी जाती, कानून, भले ही प्रक्रिया की औपचारिकताओं से बंधा हो उसे अपने मानवीय मकसद को कभी नहीं भूलना चाहिए
इलाहाबाद हाई कोर्ट ने नियुक्ति में पेंच फंसाने वाले अफसरों पर लगाया 50 हजार जुर्माना, आश्रत को नियुक्ति देने का आदेश

Dependent on deceased कोटे में नियुक्ति खैरात में नहीं मांगी जाती. आश्रित कोटे में नियुक्ति के लिए आवेदन पर विचार किया जाना चाहिए. अफसरों को ऐसे मामलों को डील करते समय अड़ियल रुख अख्तियार नहीं करना चाहिए. कानून, भले ही प्रक्रिया की औपचारिकताओं से बंधा हो उसे अपने मानवीय मकसद को कभी नहीं भूलना चाहिए. मृतक कर्मचारी द्वारा की गई सेवा के आधार पर नियमितीकरण के अधिकार को संवैधानिक आदेश के तहत मान्यता दी गई है और यह कानूनी योजना के दायरे में आता है.
सुप्रीम कोर्ट ने ‘जग्गो बनाम भारत संघ’, ‘श्रीपाल और अन्य बनाम नगर निगम गाजियाबाद’ और ‘धर्म सिंह और अन्य बनाम उत्तर प्रदेश राज्य और अन्य’ मामलों में नियमितीकरण के अधिकार को मान्यता तय कर चुका है. मृतक कर्मचारी द्वारा की गई लंबी सेवा को प्रतिवादियों की मनमानी, सनक और अड़ियल रवैये के कारण बेकार नहीं जाने दिया जा सकता.
इस कमेंट के साथ इलाहाबाद हाई कोर्ट की लखनऊ बेंच के जस्टिस इन्द्रजीत शुक्ला ने कहा कि मृतक कर्मचारी को उस तारीख से रेगुलर माना जाएगा जिस तारीख से वह इस फायदे के लिए योग्य हुआ था. पैसे और दूसरी चीजों समेत सभी हकदारियाँ उसके कानूनी वारिसों को दी जाएँगी, जो आज सिर्फ पैसे के दावेदार नहीं बल्कि एक नैतिक अन्याय के शिकार हैं और न्याय चाहते हैं.
न्याय में भले ही देर हो जाए, लेकिन उसे न सिर्फ कानूनी तौर पर बल्कि सिद्धांतों के स्तर पर भी हुई गड़बड़ी को ठीक करते हुए दिखना चाहिए. उन्होंने याचिकाकर्ता हसन अहमद को मृतक Dependent on deceased कोटे में नियुक्त करने का आदेश दिया है. यह रिट याचिका निदेशक और मुख्य अभियंता, ग्रामीण इंजीनियरिंग विभाग, यू.पी. लखनऊ द्वारा 17 मार्च 2023 को जारी आदेश को रद्द करने के साथ की पिता की डयूटी के दौरान मौत पर अनुकंपा नियुक्ति (Dependent on deceased) की मांग में हसन अहमद की ओर से दाखिल की गयी थी.
शुरुआत में ही कोर्ट ने कहा कि रिट याचिका के रिकॉर्ड को देखने के बाद, यह कोर्ट पाती है कि प्रतिवादी ने बार-बार दिए गए आदेशों का उल्लंघन किया है – या तो समझ की कमी के कारण या जानबूझकर अवज्ञा करते हुए, और इस कोर्ट की गरिमा के प्रति बहुत कम सम्मान दिखाया है. याचिकाकर्ता के पिता रिफाकत हुसैन को 1 नवंबर 1985 को ग्रामीण इंजीनियरिंग विभाग, ब्लॉक हरदोई के ‘वर्क चार्ज एस्टेब्लिशमेंट’ में जूनियर असिस्टेंट के पद पर नियुक्त किया गया था. 11 अगस्त 2012 को अचानक निधन होने से पहले उन्होंने विभाग में 18 वर्षों से अधिक समय तक सेवा की थी.

राज्य सरकार ने ‘यूपी रेगुलराइजेशन ऑफ डेली वेजेज अपॉइंटमेंट ऑन ग्रुप-सी पोस्ट्स (आउटसाइड द परव्यू ऑफ द उत्तर प्रदेश पब्लिक सर्विस कमीशन), रूल्स, 1998’ लागू किए. नियमितीकरण प्रक्रिया को आगे बढ़ाने के उद्देश्य से 7 जुलाई 2005 को एक वरिष्ठता सूची तैयार की गई जिसमें याचिकाकर्ता (Dependent on deceased) के पिता का नाम सीरियल नंबर 58 पर था.
यूपी सरकार ने 21 जून 2012 के सरकारी आदेश के माध्यम से डेली वेजर/वर्क चार्ज/कोर्ट केस वाले कर्मचारियों को नियमित करने के लिए ग्रुप-सी के 172 पदों को मंजूरी दी थी. कर्मचारियों को रेगुलर करने के लिए एक सिलेक्शन कमिटी बनाई गई. इस कमिटी ने 14 अगस्त 2012 को एक पत्र जारी करके ब्लॉक हरदोई के रूरल इंजीनियरिंग डिपार्टमेंट के एग्जीक्यूटिव इंजीनियर को निर्देश दिया कि वे डेली वेजर, वर्क चार्ज और कोर्ट केस वाले कर्मचारियों के जरूरी रिकॉर्ड सर्टिफाई करें. इन कर्मचारियों को 30 अगस्त 2012 को उसी सिलेक्शन कमिटी के सामने पेश होना था.
दुर्भाग्यवश याचिकाकर्ता (Dependent on deceased) के पिता का 11.08.2012 को निधन हो गया तो उन्हें रेगुलर नहीं किया जा सका जबकि उसी स्थिति वाले अन्य कर्मचारियों को रेगुलर कर दिया गया था. तथ्यों को परखने के बाद कोर्ट के सामने बुनियादी सवाल था कि ‘क्या किसी व्यक्ति का कानूनी अधिकार उसकी मृत्यु के साथ खत्म हो जाता है. खासकर तब जब वे अधिकार जीवित कानूनी उत्तराधिकारियों को मिलते हों. विशेष रूप से रेगुलराइजेशन पर विचार किए जाने का अधिकार?’
याचिकाकर्ता (Dependent on deceased) की माँ श्रीमती जाहिदा बेगम ने रिट याचिका संख्या 10144(SS) 2017 के जरिए कोर्ट का दरवाजा खटखटाया. इसका निपटारा 23 मार्च 2018 के आदेश से किया गया. इसमें ‘स्टेट ऑफ यूपी बनाम कुलदीप ठाकुर’ मामले में इस कोर्ट की डिवीजन बेंच के फैसले को ध्यान में रखते हुए याचिकाकर्ता (Dependent on deceased) के पिता के रेगुलराइजेशन के मामले पर विचार करने और अगर मामला सही पाया जाता है, तो उसके बाद ‘उत्तर प्रदेश सरकारी कर्मचारियों के सेवाकाल में मृत्यु होने पर आश्रितों की भर्ती नियमावली (Dependent on deceased), 1974’ के तहत याचिकाकर्ता की माँ की नियुक्ति के दावे पर विचार करने का निर्देश दिया गया.
आदेश का पालन करते हुए दूसरे प्रतिवादी ने 8 अक्टूबर 2018 को एक आदेश पारित किया. इसमें याचिकाकर्ता के पिता रिफाकत हुसैन को नियमित करने से इनकार कर दिया गया. इसका कारण यह था कि याचिकाकर्ता (Dependent on deceased) के पिता का निधन 11 अगस्त 2012 को उसी तरह के अन्य कर्मचारियों के लिए नियमितीकरण की प्रक्रिया पूरी होने से पहले ही हो गया था.
याचिकाकर्ता (Dependent on deceased) की माँ ने इस आदेश को चुनौती देते हुए रिट-A नंबर 3792/2019 दायर की
उन्होंने यह भी कहा कि 1974 के नियमों के तहत ‘वर्क चार्ज’ कर्मचारियों के आश्रितों की नियुक्ति का कोई प्रावधान नहीं है. याचिकाकर्ता (Dependent on deceased) की माँ ने इस आदेश को चुनौती देते हुए रिट-A नंबर 3792/2019 दायर की. इस पर कोर्ट ने आदेश दिया कि अगर याचिकाकर्ता के पिता से जूनियर लोगों को रेगुलर किया गया है, तो दूसरे प्रतिवादी को उनके पिता के रेगुलराइजेशन के दावे पर विचार करना चाहिए और उन्हें भी वही लाभ देना चाहिए.
फैसले और आदेश की सर्टिफाइड कॉपी मिलने पर दूसरे प्रतिवादी ने याचिकाकर्ता (Dependent on deceased) के पिता की सेवाओं को रेगुलर करने से इनकार कर दिया और अनुकंपा के आधार पर नियुक्ति के दावे को भी ठुकरा दिया. उन्होंने वही तर्क अपनाया जो दूसरे प्रतिवादी के पद पर उनसे पहले वाले अधिकारी ने अपनाया था.
चौंकाने वाली बात यह थी कि कोर्ट ने स्पष्ट आदेश दिया था कि अगर याचिकाकर्ता (Dependent on deceased) के पिता से जूनियर किसी व्यक्ति को रेगुलर किया गया है, तो उन्हें भी रेगुलराइजेशन का लाभ दिया जाए. इस तरह, दूसरे प्रतिवादी के पास याचिकाकर्ता के पिता की नौकरी पक्की करने के दावे को अस्वीकार करने का कोई अधिकार नहीं था. उन्होंने वही कारण दोहराए जो उनके पूर्ववर्ती अधिकारी ने 08.10.2018 के आदेश में बताए थे.
कोर्ट ने कहा कि आदेश को पढ़ने से पता चलता है कि इसे इस कोर्ट द्वारा रिट-A नंबर 3792/2019 में जारी आदेश के खिलाफ जाकर पारित किया गया है, जबकि उस मामले में दिया गया अंतिम फैसला फाइनल हो चुका है और अभी भी लागू है. कोर्ट द्वारा पहले ही खारिज किए जा चुके कारणों के आधार पर दोबारा आदेश पारित करना प्रथम दृष्टया अदालत की अवमानना है; इसलिए कोर्ट इस मामले को गंभीरता से लेती है और दूसरे प्रतिवादी के इस व्यवहार की निंदा करते हुए उसे भविष्य में सावधान रहने की स्पष्ट चेतावनी देती है.
राज्य के वकील ने तर्क दिया कि याचिकाकर्ता (Dependent on deceased) मृतक कर्मचारी का आश्रित है, लेकिन उसे ‘डाइंग-इन-हार्नेस’ नियमों के तहत अपने पक्ष में नियुक्ति की मांग करते हुए नया मामला पेश करने की अनुमति नहीं दी जा सकती, क्योंकि उसकी माँ ऐसा दावा साबित करने में विफल रही थी. उन्होंने इलाहाबाद हाईकोर्ट की फुल बेंच द्वारा ‘पवन कुमार यादव बनाम यू.पी. राज्य’ मामले में दिए गए फैसले को देखते हुए, मृतक ‘वर्क चार्ज’ कर्मचारी के आश्रित होने के नाते याचिकाकर्ता को ‘डाइंग-इन-हार्नेस’ नियम, 1974 के तहत नियुक्ति के लिए नहीं माना जा सकता, का हवाला दिया.
इस फैसले में कहा गया है कि दिहाड़ी और ‘वर्क चार्ज’ कर्मचारी ‘यू.पी. सरकारी कर्मचारी की सेवाकाल में मृत्यु होने पर आश्रितों की भर्ती नियमावली (Dependent on deceased), 1974’ के तहत ‘सरकारी कर्मचारी’ नहीं हैं और इसलिए वे अनुकंपा नियुक्ति के लिए अयोग्य हैं. क्या याचिकाकर्ता के दावे को बार-बार उन्हीं तर्कों के आधार पर खारिज करना – जबकि इस अदालत ने पहले के मुकदमे में उन्हें रद्द कर दिया था – ‘कानून की दृष्टि से दुर्भावना’ के दायरे में आता है या नहीं, कोर्ट ने कहा कि सुप्रीम कोर्ट के उन आधिकारिक फैसलों की जांच करना उचित है जो ‘कानून की दृष्टि से दुर्भावना’ के सिद्धांत और प्रशासनिक कार्रवाई की वैधता पर इसके प्रभाव को स्पष्ट करते हैं.
यह अच्छी तरह से स्थापित है कि ‘कानून की दृष्टि से दुर्भावना’ का मतलब जरूरी नहीं कि संबंधित अधिकारी की ओर से व्यक्तिगत द्वेष, दुर्भावना या दुश्मनी हो. बल्कि, यह बिना किसी कानूनी आधार के, बिना अधिकार वाले मकसद से, या शक्ति के इस्तेमाल को नियंत्रित करने वाले कानूनी नियमों की अनदेखी करके की गई कार्रवाई को बताता है.
रत्नागिरी गैस एंड पावर प्राइवेट लिमिटेड बनाम आरडीएस प्रोजेक्ट्स और अन्य 3 के मामले में, सुप्रीम कोर्ट ने कहा है:
‘असल में दुर्भावना’ और ‘कानून की नजर में दुर्भावना’ के बीच एक बड़ा अंतर है, जो किसी खास कानूनी प्रणाली तक सीमित नहीं है. जो व्यक्ति कानून का उल्लंघन करके किसी दूसरे व्यक्ति को नुकसान पहुँचाता है या चोट पहुँचाता है, उसे यह कहने की इजाजत नहीं है कि उसने ऐसा मासूम इरादे से किया था. यह माना जाता है कि उसे गलती का पता था और उसे कानून के दायरे में ही काम करना चाहिए था. इसलिए, वह ‘कानून की नजर में दुर्भावना’ का दोषी हो सकता है, भले ही उसके मन की स्थिति के हिसाब से उसने अनजाने में, और उस अर्थ में मासूमियत से काम किया हो. ‘असल में दुर्भावना’ एक अलग चीज है. इसका मतलब है उस व्यक्ति की तरफ से असल में दुर्भावनापूर्ण इरादा जिसने गलत काम किया है.”
विवादित आदेश में यह आधार बताया गया था कि याचिकाकर्ता (Dependent on deceased) के पिता, जिनकी मृत्यु हो चुकी है, अब जीवित नहीं हैं, इसलिए इस चरण में रेगुलराइजेशन के मामले पर विचार नहीं किया जा सकता. यह तर्क इस कोर्ट की डिवीजन बेंच द्वारा कुलदीप ठाकुर मामले में दिए गए फैसले के खिलाफ होने के कारण मान्य नहीं होगा. याचिकाकर्ता (Dependent on deceased) के पिता के मामले में रेगुलराइजेशन पर विचार करने का आधार तब ही बन गया था, जब कानूनी स्कीम के तहत रेगुलराइजेशन के लिए सीनियरिटी लिस्ट बनाई गई थी और उनके मामले पर सक्रिय रूप से विचार किया जा रहा था.
यह कोर्ट इस बात को नजरअंदाज नहीं कर सकता कि याचिकाकर्ता अपने पिता की असामयिक मृत्यु के समय नाबालिग था और अब उसकी माँ ने भेदभावपूर्ण व्यवहार का सामना करने के बाद अपना दावा छोड़ दिया है. लंबे समय तक चले कानूनी विवाद ने ऐसी स्थिति पैदा कर दी है कि न्याय प्रणाली में भरोसा बनाए रखने के लिए, याचिकाकर्ता के देर से किए गए दावे पर भी राज्य सरकार को विचार करना जरूरी है; क्योंकि याचिकाकर्ता के दावे पर विचार न करना गैर-कानूनी कार्रवाई और भेदभावपूर्ण व्यवहार को बढ़ावा देने जैसा होगा, जिसका सामना मृतक कर्मचारी के कानूनी वारिसों ने लंबे समय तक किया है. यह कानून के शासन के खिलाफ है और इस पर लैटिन कहावत ‘Nullus commodum capere potest de injuria sua propria’ (कोई भी व्यक्ति अपनी ही गलती का फायदा नहीं उठा सकता) पूरी तरह लागू होती है.
बेंच ने फैसले में कोट कराया
यह कोर्ट शायद ही कभी किसी कर्मचारी को रेगुलर मानने का निर्देश देता है, लेकिन इस मामले में कई दौर की कानूनी कार्यवाही के बाद भी याचिकाकर्ता के पिता की नौकरी रेगुलर न करने का एकमात्र कारण यही सामने आया कि ‘रेगुलर करने का फैसला होने से पहले ही उनकी दुखद मृत्यु हो गई थी’. प्रतिवादी अधिकारी हर बार – जब भी मृतक कर्मचारी की नौकरी रेगुलर करने पर विचार करने का आदेश जारी किया गया – कोई अन्य कारण नहीं बता पाए, खासकर इसलिए क्योंकि यह कारण पहले के कानूनी विवादों में खारिज हो चुका था और उस पर अंतिम फैसला हो चुका था. इसलिए, प्रतिवादी अधिकारियों द्वारा पांचवीं बार इस पर विचार करना न्याय प्रशासन के हित में नहीं होगा, क्योंकि उन्होंने पहले ही इस कोर्ट के अधिकार और कानून के शासन के प्रति घोर अवहेलना दिखाई है. इस प्रकार, यह कोर्ट मामले को वापस भेजने और इस उद्देश्य के लिए एक और अवसर देने से बचता है.
बेंच ने कहा
नियमों के तहत यह बात मानी गई है कि 1974 के नियमों के तहत नौकरी के लिए आवेदन सरकारी कर्मचारी की मृत्यु के पाँच साल के भीतर किया जाना चाहिए. नियमों में एक प्रावधान है कि अगर राज्य सरकार को लगता है कि नौकरी के लिए आवेदन करने की समय-सीमा किसी खास मामले में बहुत ज्यादा मुश्किल पैदा कर रही है, तो वह इस शर्त को हटा सकती है या उसमें ढील दे सकती है और मामले पर उचित और निष्पक्ष तरीके से विचार कर सकती है.
दूसरा प्रावधान यह भी कहता है कि नियम 5(iii) से जुड़े पहले प्रावधान के मकसद के लिए, फायदे का दावा करने वाले व्यक्ति को आवेदन करने की तय समय-सीमा खत्म होने के बाद नौकरी (Dependent on deceased) के लिए आवेदन करने में हुई देरी के कारण और उचित वजह लिखित में बतानी होगी. साथ ही, देरी से जुड़े जरूरी दस्तावेज और सबूत भी देने होंगे. सरकार देरी से जुड़ी सभी बातों पर विचार करने के बाद उचित कार्रवाई करेगी.
यह कोर्ट मानता है कि नियम 10 एक और ऐसा प्रावधान है जो राज्य सरकार को मुश्किलों को दूर करने की शक्ति देता है. 1974 के नियमों का नियम 10 मुश्किलों को दूर करने की बात करता है. इसके मुताबिक यदि इन नियमों के प्रावधानों को लागू करने में कोई मुश्किल आती है तो राज्य सरकार आदेश द्वारा ऐसे प्रावधान कर सकती है जो इन नियमों के खिलाफ न हों और जो उसे मुश्किल को दूर करने के लिए जरूरी या उचित लगें.
बेंच ने कहा कि राज्य सरकार को 1974 के नियमों के नियम 5(iii) के साथ नियम 10 में दी गई शक्तियों का इस्तेमाल करते हुए देखना होगा. इस आदेश का पालन करने के लिए आवेदन मिलने पर, राज्य सरकार कानून के अनुसार जरूरी कार्रवाई करेगी.
यह कोर्ट मृतक कर्मचारी के कानूनी उत्तराधिकारी के लिए अनुकंपा के आधार पर नियुक्ति पर विचार करने के अधिकार को मानता है. उसे एक ऐसे अधिकार के लिए लड़ना पड़ा है जो लंबे समय से लंबित था, क्योंकि मामला लंबे समय तक कोर्ट में चला और याचिकाकर्ता के पिता की समय से पहले मौत हो गई. यह उचित और न्यायसंगत है कि याचिकाकर्ता के कानूनी उत्तराधिकारियों के पक्ष में बने अधिकार को अब माना जाए और उसका सम्मान किया जाए.
दूसरे प्रतिवादी को यह भी निर्देश दिया जाता है कि वह ‘डाइंग-इन-हार्नेस रूल्स, 1974’ के तहत याचिकाकर्ता की नियुक्ति के दावे पर विचार करने की प्रक्रिया शुरू करे. यदि देरी या किसी अन्य वैध कारण से यह दूसरे प्रतिवादी के अधिकार क्षेत्र में नहीं आता है, तो मामले को 1974 के नियमों के नियम 5(iii) और नियम 10 के तहत राज्य सरकार को विचार के लिए भेजा जाए, और यह पूरी तरह से 1974 के नियमों के अनुसार किया जाए. किसी भी स्थिति में, यह पूरी प्रक्रिया इस आदेश की प्रमाणित प्रति पेश करने की तारीख से दो महीने के भीतर पूरी की जानी चाहिए.
बेंच ने कहा
सरकारी अधिकारियों के अड़ियल रवैये से परेशान होकर याचिकाकर्ता को इस कोर्ट का दरवाजा खटखटाना पड़ा, क्योंकि अधिकारी इस कोर्ट के बार-बार दिए गए आदेशों का पालन करने में नाकाम रहे. इसलिए, याचिकाकर्ता को 50,000 रुपये का हर्जाना दिया जायेगा.