Employee को बिना आरोप-पत्र और सुनवाई का अवसर दिए बिना नौकरी से निकालना कानूनन अमान्य, बर्खास्तगी के 2 आदेश रद
सहारनपुर के कोऑपरेटिव सोसाइटी के Employee को इलाहाबाद हाई कोर्ट ने दिया सेवा में वापस लेने का आदेश

इलाहाबाद उच्च न्यायालय ने महत्वपूर्ण फैसले में कहा है कि किसी Employee को बिना आरोप पत्र दिये और उचित सुनवाई का अवसर दिये बिना नौकरी से निकाला जाना कानून की दृष्टि से मान्य नहीं है. इसके साथ ही जस्टिस दिनेश पाठक की बेंच ने प्राकृतिक न्याय के सिद्धांतों की अनदेखी कर सेवा से बर्खास्त किए गए एक Employee को बड़ी राहत दी है.
अदालत ने अपने एक महत्वपूर्ण फैसले में सहकारी समिति द्वारा सहकारिता Employee रोहित सिंह के खिलाफ जारी किए गए दोहरे बर्खास्तगी आदेशों को पूरी तरह से खारिज कर दिया है. अदालत के इस फैसले से याचिकाकर्ता को सेवा में वापस लेने का रास्ता साफ हो गया है. कोर्ट ने उन्हें सेवा में निरंतर मानते हुए सभी परिणामी लाभ प्रदान करने का भी आदेश दिया है.
यह पूरा प्रकरण रोहित सिंह बनाम उत्तर प्रदेश राज्य एवं अन्य (रिट ए संख्या 10654/2026) से जुड़ा हुआ है. याचिकाकर्ता रोहित सिंह सहकारी समिति जनपद सहारनपुर में में ‘आंकित’ के पद पर कार्यरत थे. उन्हें प्रतिवादी प्राधिकारियों द्वारा एक के बाद एक दो बार यानी 23 मई 2026 और 13 जून 2026 को जारी आदेशों के तहत सेवा से बर्खास्त कर दिया गया था.
बर्खास्तगी से आहत होकर Employee ने इलाहाबाद उच्च न्यायालय का दरवाजा खटखटाया
अपनी बर्खास्तगी से आहत होकर Employee रोहित सिंह ने अपने अधिवक्ताओं के माध्यम से इलाहाबाद उच्च न्यायालय का दरवाजा खटखटाया और रिट याचिका दाखिल कर बर्खास्तगी आदेशों को चुनौती दी. याचिका में मुख्य रूप से यह दलील दी गई कि बिना किसी विभागीय जांच के, बिना आरोप-पत्र के और बिना नैसर्गिक न्याय के सिद्धांतों का पालन किए उन्हें अचानक नौकरी से बाहर का रास्ता दिखा दिया गया था.

मामला की सुनवाई के दौरान बेंच ने शुरुआती स्तर पर ही इस कार्रवाई पर गहरी हैरानी जताई थी. अदालत ने अपने पूर्व आदेश (20 अगस्त 2026) में यह टिप्पणी की थी कि यह अपने आप में एक आश्चर्यजनक स्थिति है कि एक ही व्यक्ति (Employee) की सेवाएं एक ही पद पर रहते हुए दो अलग-अलग तारीखों में कैसे समाप्त की जा सकती हैं. हाईकोर्ट ने प्रतिवादी अधिकारियों को यह सत्यापित करने का निर्देश दिया था कि क्या Employee के खिलाफ कोई औपचारिक जांच संस्थित की गई थी या उसे बचाव का कोई मौका दिया गया था.
मामले की अगली सुनवाई के दौरान प्रतिवादी प्राधिकारियों की ओर से पेश हुए वकील ने अदालत के समक्ष अपने निर्देश रखे और यह निष्पक्ष रूप से स्वीकार किया कि याचिकाकर्ता Employee के विरुद्ध कोई भी औपचारिक अनुशासनात्मक कार्रवाई शुरू नहीं की गई थी. इसके चलते उसे किसी भी स्तर पर कोई आरोप पत्र तामील नहीं कराया गया था. यहां तक कि बर्खास्तगी का आदेश देने से पहले कर्मचारी को व्यक्तिगत सुनवाई का भी कोई मौका नहीं दिया गया था.
दोनों पक्षों की तरफ से पेश की गयी दलीलों और रिकॉर्ड पर उपलब्ध साक्ष्यों को परखने के बाद कोर्ट ने एक Employee को दो बार बर्खास्त किया जाना कानून की नजर में यह स्पष्ट रूप से ‘प्राकृतिक न्याय के सिद्धांतों का उल्लंघन’ है. बेंच ने कहा कि बिना किसी पूर्व सूचना और निष्पक्ष जांच के किसी भी कर्मचारी की आजीविका छीनना किसी भी तरह से वैध कदम नहीं बताया जा सकता.
कोर्ट ने कहा कि यह कार्यवाही पूरी तरह से अवैध है. परिणामस्वरूप, इलाहाबाद हाई कोर्ट ने याचिका को मंजूर करते हुए प्रतिवादी प्राधिकारियों द्वारा 23 मई 2026 और 13 जून 2026 को जारी किए गए दोनों बर्खास्तगी आदेशों को रद्द (Quash) कर दिया.
अदालत ने अपने आदेश में स्पष्ट निर्देश दिए हैं कि याचिकाकर्ता रोहित सिंह को तुरंत प्रभाव से उनकी सेवा में वापस बहाल किया जाए. इसके साथ ही, उन्हें सेवा की निरंतरता (Continuity of Service) का लाभ मिलेगा तथा कानून के अनुसार देय पूर्ण पिछला वेतन (Back Wages) और अन्य सभी परिणामी सेवा लाभ भी प्रदान किए जाएंगे. यह फैसला उन नियोक्ताओं के लिए एक कड़ी चेतावनी है जो बिना उचित विधिक प्रक्रिया और प्रशासनिक पारदर्शिता के अपने कर्मचारियों के अधिकारों का हनन करते हैं.