+91-9839333301

legalbulletin@legalbulletin.in

| Register

Remand Magistrate ने मांगी माफी, जस्टिस अतुल श्रीधरन की बेंच ने की अस्वीकार, कहा न्यायिक कार्य के भारी दबाव की आड़ में अपने कर्तव्यों से नहीं बच सकते Magistrate

इलाहाबाद हाई कोर्ट ने मंजूर की बंदी प्रत्यक्षीकरण याचिका, आरोपी को तत्काल रिहा करने का आदेश

Remand Magistrate ने मांगी माफी, जस्टिस अतुल श्रीधरन की बेंच ने की अस्वीकार, कहा न्यायिक कार्य के भारी दबाव की आड़ में अपने कर्तव्यों से नहीं बच सकते Magistrate
Atul Shridharan J.

इलाहाबाद हाई कोर्ट ने एक महत्वपूर्ण फैसले में कहा है कि Remand Magistrate का दायित्व है कि वह गिरफ्तारी मेमा में कमियों को देखे और कोई भी फैसला लेते वक्त अपने न्यायिक विवेक का इस्तेमाल करे. जस्टिस अतुल श्रीधरन और जस्टिस अचल सचदेव की बेंच ने Magistrate के इस तर्क को खारिज कर दिया कि काम के प्रेशर में गलती हो गयी है.

बेंच ने कहा कि Magistrate का कर्तव्य बेहद संवेदनशील और महत्वपूर्ण है, जो सीधे तौर पर नागरिकों की व्यक्तिगत स्वतंत्रता से जुड़ा है. Magistrate न्यायिक कार्य के भारी दबाव की आड़ में अपने कर्तव्यों से नहीं बच सकते. रिमांड आदेश देना महज एक कागजी औपचारिकता नहीं है, बल्कि इसके लिए न्यायिक विवेक के इस्तेमाल की आवश्यकता होती है.

बता दें कि पिछली सुनवाई की तिथि पर अरेस्ट मेमो में कमियों की तरफ कोर्ट का ध्यान वादी के अधिवक्ता ने दिलाया था. अरेस्ट मेमो की कई कमियां रखे जाने पर कोर्ट ने कड़ा रुख अपनाते हुए पूर्व में कुशीनगर के जिला जज को निर्देश दिया था कि वे संबंधित Magistrate से स्पष्टीकरण लें कि उन्होंने बिना गिरफ्तारी मेमो की कमियों को देखे रिमांड कैसे मंजूर कर लिया.

Magistrate ने अदालत के समक्ष अपना स्पष्टीकरण प्रस्तुत किया जिसमें उन्होंने मुकदमों के अत्यधिक दबाव का हवाला दिया

इसके जवाब में Magistrate ने अदालत के समक्ष अपना स्पष्टीकरण प्रस्तुत किया, जिसमें उन्होंने भारी न्यायिक कार्यभार और मुकदमों के अत्यधिक दबाव का हवाला देते हुए अपनी गलती स्वीकार की और माफी मांगी. कोर्ट ने Magistrate के इस स्पष्टीकरण को खारिज कर दिया.

बेंच ने कहा कि गिरफ्तारी के समय पुलिस द्वारा गिरफ्तारी मेमो (Arrest Memo) में सभी आवश्यक कानूनी और तथ्यात्मक विवरण भरना अनिवार्य है. ऐसा न करना सीधे तौर पर संविधान के अनुच्छेद 21 और 22 के तहत नागरिकों को मिले मौलिक अधिकारों का उल्लंघन है. जस्टिस अतुल श्रीधरन और जस्टिस अचल सचदेव की बेंच ने कुशीनगर जिले से जुड़े एक बंदी प्रत्यक्षीकरण मामले की सुनवाई करते हुए यह सख्त टिप्पणी की.

इसे भी पढ़ें… हाई कोर्ट का आदेश: ग्राम प्रधान को प्रशासक बनाने के आदेश में कोई गलती नहीं, यूपी में 3 महीने के भीतर कराएं पंचायत चुनाव

यह पूरा मामला साइबर धोखाधड़ी (Cyber Fraud) से जुड़ा हुआ है. कुशीनगर जिले के साइबर क्राइम थाने में 23 जुलाई 2026 को भारतीय न्याय संहिता की विभिन्न धाराओं और सूचना प्रौद्योगिकी (IT) अधिनियम की धारा 66सी के तहत एक प्राथमिकी दर्ज की गई थी. याचिकाकर्ताओं के अनुसार, इस मामले में कॉर्पस (बंदी) को 23 जुलाई 2026 की आधी रात से न्यायिक हिरासत में रखा गया था.

पुलिस का आरोप था कि बंदी का बैंक खाता एक ‘म्यूल अकाउंट’ के रूप में इस्तेमाल किया गया था, जिसके जरिए साइबर धोखाधड़ी के पैसे ट्रांसफर किए गए थे. गिरफ्तारी के बाद बंदी के परिवार की ओर से इलाहाबाद उच्च न्यायालय में बंदी प्रत्यक्षीकरण याचिका दाखिल की गई, जिसमें गिरफ्तारी की वैधता को चुनौती दी गई. अदालत ने जब मामले के दस्तावेजों, विशेषकर गिरफ्तारी मेमो का बारीकी से निरीक्षण किया, तो उसमें भारी और गंभीर अनियमितताएं पाई गईं. मेमो के कई महत्वपूर्ण कॉलम या तो पूरी तरह खाली छोड़ दिए गए थे या उनमें खानापूर्ति की गई थी.

इसे भी पढ़ें…37 साल पुराने Criminal Case में ‘कुंभकरण’ को आजीवन कारावास की सजा इलाहाबाद हाई कोर्ट ने रखी बरकरार

गिरफ्तारी के कारणों से संबंधित कॉलम नंबर 12 में केवल ‘हाँ’ लिखकर इतिश्री कर ली गई थी, जबकि कोई ठोस विवरण नहीं दिया गया था.

कॉलम 13(1), जो मामले की संलिप्तता और गिरफ्तारी की आवश्यकता को स्पष्ट करने के लिए था, पूरी तरह खाली था.

बंदी के पास से बरामद मोबाइल फोन और अन्य इलेक्ट्रॉनिक साक्ष्यों से जुड़े विवरण भी संबंधित कॉलम में दर्ज नहीं किए गए थे.

यहाँ तक कि गिरफ्तारी के समय गवाहों और बंदी के किसी करीबी या परिजन के विवरण का कॉलम भी खाली छोड़ दिया गया था.

उच्च न्यायालय ने इस पर कड़ी आपत्ति जताते हुए कहा कि यह लापरवाही उच्चतम न्यायालय द्वारा ‘विहान कुमार बनाम हरियाणा राज्य’ ((2025) 5 एससीसी 799) और ‘मिहिर राजेश शाह बनाम महाराष्ट्र राज्य’ ((2026) 1 एससीसी 500) जैसे कई अहम मामलों में तय किए गए कानूनी सिद्धांतों का खुला उल्लंघन है.

इसे भी पढ़ें… विवाहित हो जाने मात्र से कोई पुत्री अपने माता-पिता के प्रति कर्तव्यों और आश्रित होने के संवैधानिक अधिकारों से वंचित नहीं हो सकती

अदालत ने इस मामले में कड़ा रुख अपनाते हुए याचिका को स्वीकार कर लिया और आदेश दिया कि यदि बंदी किसी अन्य मामले में वांछित नहीं है, तो उसे तत्काल प्रभाव से रिहा किया जाए. इसके साथ ही, अदालत ने अपने आदेश में कुछ अत्यंत महत्वपूर्ण टिप्पणियाँ भी कीं. पीठ ने चिंता जताई कि ऐसे कई मामले सामने आ रहे हैं जहाँ पुलिस द्वारा जानबूझकर गिरफ्तारी मेमो में कानूनी औपचारिकताएं पूरी नहीं की जाती हैं, ताकि आरोपी इसका लाभ उठाकर बंदी प्रत्यक्षीकरण याचिका के जरिए आसानी से छूट सकें.

Magistrate स्तर पर हो रही ऐसी चूकों को रोकने के लिए अदालत ने लखनऊ स्थित न्यायिक प्रशिक्षण एवं अनुसंधान संस्थान के निदेशक को निर्देश दिया कि वे इस विषय पर विशेष प्रशिक्षण मॉड्यूल तैयार करें और मजिस्ट्रेट के लिए दिशा-निर्देश जारी करें. हाई कोर्ट ने यह भी चेतावनी दी कि भविष्य में यदि किसी Magistrate द्वारा इस प्रकार के कर्तव्यों की अनदेखी की गई, तो अदालत उस पर बेहद गंभीर रुख अपनाएगी और प्रशासनिक स्तर पर अनुशासनात्मक कार्रवाई की संस्तुति भी कर सकती है.

इसे भी पढ़ें…इलाहाबाद हाई कोर्ट का महत्वपूर्ण फैसला: किसी व्यक्ति का मृतक का वैध वारिस होना अपने आप उसे फैमिली पेंशन का हकदार नहीं बनाता

2 thoughts on “Remand Magistrate ने मांगी माफी, जस्टिस अतुल श्रीधरन की बेंच ने की अस्वीकार, कहा न्यायिक कार्य के भारी दबाव की आड़ में अपने कर्तव्यों से नहीं बच सकते Magistrate”

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *