Sexual Exploitation पीड़ित बच्चों के लिए वित्तीय सहायता हेतु इंजरी रिपोर्ट अनिवार्य करना संविधान के अनुच्छेद 14 का उल्लंघन
इलाहाबाद हाई कोर्ट के दो जजों की बेंच ने पीड़िता को 3 लाख की आर्थिक सहायता 10 दिन के भीतर प्रदान करने का आदेश दिया

इलाहाबाद उच्च न्यायालय ने Sexual Exploitation पीड़ित बच्चों के लिए एक अत्यंत महत्वपूर्ण और संवेदनशील फैसले में व्यवस्था दी है कि उत्तर प्रदेश रानी लक्ष्मीबाई महिला एवं बाल सम्मान कोष नियमों, 2015 के तहत बच्चों के यौन उत्पीड़न के मामलों में वित्तीय सहायता पाने के लिए ‘इंजरी रिपोर्ट’ को अनिवार्य शर्त नहीं बनाया जा सकता. कोर्ट ने इस शर्त को संविधान के अनुच्छेद 14 का उल्लंघन और मनमाना करार देते हुए रद्द कर दिया है.
यह निर्णय जस्टिस सरल श्रीवास्तव और जस्टिस गरिमा प्रसाद की बेंच ने माइनर एक्स की तरफ से दाखिल याचिका पर सुनवाई के बाद सुनाया है. कोर्ट ने स्पष्ट किया कि कानूनी रूप से संरक्षित सहमति के अधिकार और पीड़िता के शारीरिक-मानसिक स्वास्थ्य को ताक पर रखकर कोई भी शर्त पीड़ितों को कल्याणकारी योजनाओं के लाभ से वंचित नहीं कर सकती.
यह याचिका Sexual Exploitation पीड़ित एक आठ वर्षीय नाबालिग की ओर से उसकी मां द्वारा दायर की गई थी. घटना 28 जनवरी 2024 की है, जिसके संबंध में 7 मार्च 2024 को शाहगंज पुलिस स्टेशन (जिला जौनपुर) में भारतीय दंड संहिता (IPC) की धारा 376-AB, 120-B, 504, 506 और पॉक्सो अधिनियम (POCSO Act) की धारा 5(m) व 6 के तहत मामला दर्ज किया गया था.
8 मार्च 2024 को जब Sexual Exploitation पीड़िता को मेडिकल जांच के लिए ले जाया गया, तो उसने या उसके अभिभावक ने पैट्रेटिव सेक्सुअल असॉल्ट से संबंधित विशेष जांच के लिए सहमति नहीं दी. परिणामस्वरूप, इस विशिष्ट पहलू पर कोई इंजरी रिपोर्ट तैयार नहीं हो सकी. हालांकि, पुलिस ने गहन जांच के बाद 20 मार्च 2024 को पॉक्सो एक्ट की धाराओं के तहत चार्जशीट दाखिल कर दी.
जब पीड़िता ने राज्य की कल्याणकारी योजना — उत्तर प्रदेश रानी लक्ष्मीबाई महिला एवं बाल सम्मान कोष के तहत 3,00,000 रुपये की वित्तीय सहायता के लिए आवेदन किया, तो जिला स्टीयरिंग कमेटी ने 2 जनवरी 2025 को उसका दावा खारिज कर दिया. कमेटी का तर्क था कि चूंकि नियम के ‘एंट्री 7’ के तहत Sexual Exploitation पीड़िता की इंजरी रिपोर्ट उपलब्ध नहीं है, इसलिए सहायता राशि नहीं दी जा सकती.
बेंच ने Sexual Exploitation मामले की समीक्षा करते हुए कई महत्वपूर्ण विधिक बिंदुओं को रेखांकित किया:
कल्याणकारी उद्देश्य की प्रधानता: अदालत ने कहा कि ‘उत्तर प्रदेश रानी लक्ष्मीबाई महिला एवं बाल सम्मान कोष नियम, 2015’ का नियम 4(a) स्पष्ट रूप से यह प्रावधान करता है कि यह योजना एक सामाजिक-कल्याणकारी उपाय है. इसका मुख्य उद्देश्य जघन्य अपराधों की महिला/बाल पीड़ितों को तुरंत मौद्रिक और चिकित्सीय राहत प्रदान करना है, ताकि उनके पुनर्वास, शिक्षा और स्वास्थ्य का ध्यान रखा जा सके. कोई भी नियम इस मूल उद्देश्य को बाधित करने वाला नहीं होना चाहिए.
इंजरी रिपोर्ट की अनिवार्यता तर्कसंगत नहीं: अदालत ने माना कि योजना के तहत एफआईआर (FIR) और चार्जशीट (Charge-sheet) मुख्य दस्तावेज हैं जो अपराध के होने और जांच के निष्कर्ष को दर्शाते हैं. आपराधिक मुकदमों में भी केवल इंजरी रिपोर्ट न होने या उसमें स्पष्ट चोट न दिखने मात्र से अभियुक्त बरी नहीं हो जाता, बल्कि पूरे साक्ष्य देखे जाते हैं. ऐसे में प्रारंभिक और तत्काल राहत के लिए इसे एक अनिवार्य शर्त बना देना अनुचित है.
सहमति का अधिकार और कानून: पॉक्सो अधिनियम की धारा 27(1) और सीआरपीसी (CrPC) की धारा 164-A(7) (तथा नई भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता, 2023 की धारा 184-7) स्पष्ट रूप से यह सुरक्षा प्रदान करती हैं कि किसी भी महिला या बच्चे की बिना सहमति के कोई चिकित्सीय जांच कानूनन बाध्यकारी नहीं है. अदालत ने सुप्रीम कोर्ट के कई पुराने फैसलों (जैसे लिल्लू उर्फ राजेश बनाम हरियाणा राज्य) का हवाला देते हुए कहा कि Sexual Exploitation पीड़िता की गरिमा और शारीरिक अखंडता सर्वोपरि है. यदि कोई Sexual Exploitation पीड़िता सहमति नहीं देती, तो उसे कल्याणकारी सहायता से वंचित करना एक अवांछित दबाव डालना है.
अनुच्छेद 14 का उल्लंघन: न्यायालय ने कहा कि Sexual Exploitation पीड़िता की अनिवार्य इंजरी रिपोर्ट की शर्त पीड़ितों के बीच अनुचित वर्गीकरण पैदा करती है—एक वर्ग वे जिनके पास रिपोर्ट है और दूसरा वे जिनके पास नहीं है (चाहे सहमति के अभाव में या अन्य कारणों से). यह वर्गीकरण योजना के उद्देश्यों से मेल नहीं खाता और इसलिए यह संविधान के अनुच्छेद 14 (समानता का अधिकार) के तहत मनमाना और शून्य है.

दोनों पक्षों के तर्कों और रिकॉर्ड पर उपलब्ध तथ्यों को परखने के बाद दो जजों की बेंच ने जिला स्टीयरिंग कमेटी के 2 जनवरी 2025 के उस निर्णय को खारिज कर दिया, जिसमें आवेदन को ठुकराया गया था. साथ ही, नियम की अनुसूची 1 की ‘एंट्री 7’ में दी गई “इंजरी रिपोर्ट” की शर्त को असंवैधानिक घोषित करते हुए अलग कर दिया.
हाई कोर्ट ने ने राज्य प्राधिकारियों को निर्देश दिया कि वे इस फैसले के 10 दिनों के भीतर पीड़िता को 3,00,000 रुपये की वित्तीय सहायता राशि जारी करें. राशि को पीड़िता के नाम से संरक्षित बैंक खाते में जमा करने या नाबालिग के हितों की रक्षा के लिए सक्षम न्यायालय की किसी अन्य वैध व्यवस्था के तहत प्रबंधित करने का आदेश दिया गया है.
यह फैसला उन तमाम Sexual Exploitation बाल पीड़ितों के लिए एक मजबूत विधिक ढाल बनकर उभरेगा जो न्याय और राहत की प्रक्रिया के दौरान चिकित्सीय औपचारिकताओं या व्यक्तिगत प्राथमिकताओं के कारण सरकारी योजनाओं के लाभ से वंचित रह जाते थे.