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बिना किसी विशिष्ट intention के केवल गुस्से में बोले गए शब्द आपराधिक धमकी या धारा 504/506 के दायरे में नहीं आते हैं

इलाहाबाद हाईकोर्ट का बड़ा फैसला: सोहम गौड़ उर्फ दीपक के खिलाफ आपराधिक कार्यवाही और चार्जशीट रद्द

बिना किसी विशिष्ट intention के केवल गुस्से में बोले गए शब्द आपराधिक धमकी या धारा 504/506 के दायरे में नहीं आते हैं

इलाहाबाद उच्च न्यायालय ने एक महत्वपूर्ण फैसले में कहा है कि बिना किसी विशिष्ट आशय (intention) के केवल गुस्से में बोले गए शब्द आपराधिक धमकी या धारा 504/506 के दायरे में नहीं आते हैं, जब तक कि उससे सामने वाले को गंभीर या वास्तविक भय पैदा करने का आपराधिक आशय स्पष्ट न हो. जस्टिस मदन पाल सिंह की बेंच ने आपराधिक प्रक्रिया संहिता (Cr.P.C.) की धारा 482 के तहत दायर एक आवेदन को स्वीकार करते हुए याची के खिलाफ चल रही संपूर्ण आपराधिक कार्यवाही को रद्द कर दिया है.

एकल पीठ ने स्पष्ट किया कि जब मामले के रिकॉर्ड और धारा 164 के तहत दर्ज बयानों से कथित अपराधों के आवश्यक तत्व intention ही साबित नहीं होते हैं, तो ऐसी स्थिति में केवल औपचारिकता के लिए आपराधिक कार्यवाही को जारी रखना न्याय प्रक्रिया का दुरुपयोग होगा.

यह पूरा मामला उत्तर प्रदेश के प्रयागराज जिले के मेजा पुलिस स्टेशन से जुड़ा हुआ है. प्रार्थी/आवेदक सोहम गौड़ उर्फ दीपक (Soham Gaur @ Deepak) के खिलाफ मामला दर्ज किया गया था. प्राथमिकी विपक्षी पार्टी नंबर-2 (शिकायतकर्ता) अमृता शुक्ला द्वारा 6 फरवरी 2024 को दर्ज कराई गई थी. प्राथमिकी में आरोप लगाया गया था कि शिकायकर्ता की मुलाकात रायबरेली में टीचर ट्रेनिंग के दौरान आवेदक से हुई थी. आरोप था कि आवेदक ने शादी का झांसा देकर लगभग साढ़े तीन साल तक कई बार शारीरिक संबंध बनाए.

धारा 164 के तहत दर्ज बयानों से कथित अपराधों के आवश्यक तत्व intention ही साबित नहीं होते हैं

इसके अलावा, यह भी कहा गया था कि आवेदक ने वर्ष 2024 में उससे शादी करने का भरोसा दिया था, लेकिन बाद में पता चला कि उसकी शादी किसी अन्य युवती के साथ 6 फरवरी 2024 को तय कर दी गई है, जिसके बाद उसे अपने साथ हुए धोखे का अहसास हुआ. शुरुआती दौर में इस मामले में पुलिस ने भारतीय दंड संहिता (IPC) की धारा 376(2)(n) के तहत प्राथमिकी दर्ज की थी.

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हालांकि, जांच के दौरान पुलिस ने पीड़िता के बयान Cr.P.C. की धारा 161 और 164 के तहत दर्ज किए. गहन विवेचना और बयानों के आधार पर, जांच अधिकारी ने धारा 376(2)(n) हटा दी और केवल IPC की धारा 504 (शांति भंग करने के इरादे से अपमान) और 506 (आपराधिक धमकी) के तहत चार्जशीट दाखिल कर दी. इसके बाद अपर मुख्य न्यायिक मजिस्ट्रेट, कोर्ट संख्या-10, प्रयागराज ने 17 अगस्त 2024 को इस पर प्रसंज्ञान (cognizance) लेते हुए समनिंग आदेश जारी किया और केस संख्या 409/2024 के तहत कार्यवाही शुरू की गई.

आवेदक के अधिवक्ता की ओर से दलील दी गई कि प्राथमिकी में भले ही गंभीर आरोप लगाए गए हों, लेकिन जांच के दौरान मजिस्ट्रेट के समक्ष Cr.P.C. की धारा 164 के तहत दर्ज कराए गए पीड़िता के अपने बयानों में intention पर पूरी तरह से अलग रुख अपनाया. पीड़िता ने अपने धारा 164 के बयान में स्पष्ट रूप से कहा कि वह और सोहम अच्छे दोस्त हैं. जब उससे विशिष्ट रूप से पूछा गया कि क्या आवेदक के साथ उसके कोई शारीरिक संबंध बने हैं, तो उसने इनकार करते हुए कहा “नहीं, हम दोनों के बीच कभी भी शारीरिक संबंध नहीं बने.”

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इसके अलावा, जब उससे यह पूछा गया कि क्या उसके साथ कोई अप्रिय घटना या दुर्व्यवहार हुआ है, तो उसने इसके जवाब में भी “नहीं” कहा. पीड़िता के पिता के बयान में कुछ अन्य बातें कही गई थीं और मां के बयान में धमकी देने का जिक्र था. हाईकोर्ट ने पाया कि धारा 504 और 506 के तहत जो कानूनी आवश्यकता intention होती है, वे रिकॉर्ड पर मौजूद सामग्री से पूरी नहीं होती.

अदालत ने अपने निर्णय में सुप्रीम कोर्ट के महत्वपूर्ण फैसलों का जिक्र किया. कोर्ट ने मणिक तनेजा बनाम कर्नाटक राज्य (2015) और हालिया फैसले तुहीन कुमार बिस्वास उर्फ ​​बुम्बा बनाम पश्चिम बंगाल राज्य (2025) के न्यायिक दृष्टांतों का हवाला देते हुए दोहराया कि बिना किसी विशिष्ट आशय (intention) के केवल गुस्से में बोले गए शब्द आपराधिक धमकी या धारा 504/506 के दायरे में नहीं आते हैं, जब तक कि उससे सामने वाले को गंभीर या वास्तविक भय पैदा करने का आपराधिक आशय स्पष्ट न हो.

इसके अलावा, अदालत ने आपराधिक न्यायशास्त्र के प्रसिद्ध मामले राज्य बनाम हरियाणा (भजनलाल केस) के सिद्धांतों को भी रेखांकित किया, जिसके तहत यह तय किया जाता है कि धारा 482 की शक्ति का उपयोग किन परिस्थितियों में किया जाना चाहिए ताकि कानून के दुरुपयोग को रोका जा सके.

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जस्टिस मदन पाल सिंह ने सभी पक्षों की दलीलों और पत्रावलियों का बारीकी से अध्ययन करने के बाद माना कि धारा 164 के तहत दिए गए बयान में पीड़िता ने खुद शारीरिक संबंधों और किसी भी प्रकार के दुर्व्यवहार (intention) से इनकार कर दिया है. इसके अलावा, चार्जशीट जिन धाराओं (504 और 506 IPC) के तहत दाखिल की गई है, उनके लिए आवश्यक मूल तत्व intention भी अभियोजन पक्ष द्वारा प्रस्तुत सामग्री से स्थापित नहीं होते हैं.

हाईकोर्ट ने स्पष्ट किया कि अदालत धारा 482 के तहत किसी मामले में ‘मिनी-ट्रायल’ (लघु विचारण) नहीं कर सकती है, लेकिन जहां सामग्री अपने प्रथम दृष्टया स्तर पर ही आरोपों (intention) को सही साबित करने में विफल रहती है, वहां आपराधिक कार्यवाही को आगे बढ़ने देना न्यायसंगत नहीं होगा.

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कोर्ट ने आवेदक सोहम गौड़ उर्फ दीपक के खिलाफ 7 अप्रैल 2024 को दाखिल चार्जशीट, 17 अगस्त 2024 का प्रसंज्ञान एवं समनिंग आदेश, तथा अपर मुख्य न्यायिक मजिस्ट्रेट, कोर्ट नंबर-10, प्रयागराज के समक्ष लंबित केस संख्या 409/2024 की संपूर्ण कार्यवाही को आवेदक के संबंध में रद्द कर दिया.

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