Lucky Draw में बम्पर पुरस्कार विजेता को कार देने से इंकार करने वालों को इलाहाबाद हाई कोर्ट ने किया राहत देने से इनकार
ट्रायल कोर्ट से जारी समन को रद करने की मांग में दाखिल आपराधिक अपील एकल पीठ ने की खारिज

इलाहाबाद उच्च न्यायालय ने Lucky Draw से जुड़े एक अनोखे और दिलचस्प मामले में महत्वपूर्ण फैसला सुनाते हुए मनोज गुप्त व अन्य द्वारा दाखिल की गई आपराधिक अपील को खारिज कर दिया है. यह पूरा विवाद एक लकी ड्रॉ (Lucky Draw) प्रतियोगिता के दौरान विजेता घोषित किए जाने के बाद मुख्य पुरस्कार यानी कार न दिए जाने और उसके बाद उपजे कानूनी विवाद से जुड़ा हुआ है. जस्टिस अब्दुल शाहिद की एकल पीठ ने मामले की सुनवाई करते हुए यह आदेश पारित किया है.
यह प्रकरण मूल रूप से फिरोजाबाद जिले के लाइनपार थाना क्षेत्र से जुड़ा हुआ था. घटना के संबंध में रिपोर्ट मानिक चन्द्र दिवाकर की तरफ से दर्ज करायी गयी थी. यह प्रकरण कोर्ट के आदेश पर दर्ज किया गया था. तथ्यों के अनुसार यह पूरा विवाद विशुद्ध रूप से एक कमर्शियल गतिविधि और Lucky Draw योजना से शुरू हुआ था. Lucky Draw आयोजित करने वाली फर्म लेडीज के लिए ब्यूटी प्रोडक्ट तैयार करने और उसे सेल करने की फील्ड में काम करती है.
पीड़ित मानिक चन्द्र जनरल स्टोर संचालित करता था. तहरीर में दर्ज कराये गये तथ्यों के अनुसार फर्म ने विंटर फेस्टिवल के लिए स्कीम की घोषणा की थी. इसके तहत 15499 रुपये का माल एक मुश्त करने वाला Lucky Draw में भाग ले सकता था और बम्पर प्राइज के रूप में कार दी जानी थी. पीड़ित ने इस स्कीम में हिस्सा लिया.
शर्तों के अनुसार स्कीम पूरी होने के बाद योजना के तहत एक Lucky Draw निकाला गया
तय शर्तों के अनुसार स्कीम पूरी होने के बाद योजना के तहत एक Lucky Draw निकाला गया था, जिसमें शिकायतकर्ता को मुख्य यानी बम्पर पुरस्कार के रूप में ‘कार’ जीतने वाला घोषित किया गया था. आरोप है कि आयोजकों (अपीलकर्ताओं) ने विजेता के साथ कार की चाबी सिंबल वाले फ्लेक्स बनवाकर तस्वीरें भी खिंचवाई थीं और सार्वजनिक रूप से विज्ञापन भी जारी किए. मौके पर उसे कार सौंपी नहीं गयी. कार की डिमांड करने पर आश्वासन दिया गया था कि उन्हें जल्द ही पुरस्कार की गाड़ी सौंप दी जाएगी.

जब शिकायतकर्ता ने Lucky Draw में अपनी जीती हुई कार की वास्तविक सुपुर्दगी की मांग की तो कथित तौर पर आरोपियों ने उसे देने से साफ इनकार कर दिया और उसके साथ दुर्व्यवहार किया और जाति सूचक शब्दों का इस्तेमाल करके अपमानित किया गया. इस धोखाधड़ी और अपमान से आहत होकर शिकायतकर्ता ने संबंधित थाने में भारतीय न्याय संहिता (BNS) की विभिन्न धाराओं 316(2), 115(2), 352, और 351(2)—तथा अनुसूचित जाति/जनजाति (अत्याचार निवारण) अधिनियम यानी एससी/एसटी एक्ट की धाराओं 3(1)(da) और 3(1)(dha) के तहत प्राथमिकी (F.I.R.) दर्ज कराई थी.
अदालत में अपीलकर्ताओं के अधिवक्ताओं ने दलील दी कि यह Lucky Draw से जुड़ा यह विवाद मूल रूप से एक कमर्शियल लेन-देन या योजना से संबंधित है, जिसे आपराधिक रंग दिया जा रहा है. उन्होंने यह भी तर्क दिया कि घटना की कथित तिथि और एफआईआर दर्ज होने की तिथि के बीच अंतराल था तथा एससी/एसटी एक्ट के तहत कोई ऐसा कृत्य नहीं बनता है.
अपने बचाव में अपीलकर्ताओं के वकील ने इस कोर्ट की डिवीजन बेंच द्वारा 14.10.2025 को क्रिमिनल मिस. रिट पिटीशन नंबर 23272/2025 (मनोज गुप्ता और अन्य बनाम स्टेट ऑफ यू.पी. और अन्य) में पास किए गए अंतरिम ऑर्डर पर भरोसा जताया, जिसमें निर्देश दिया गया था कि अगली लिस्टिंग की तारीख तक पिटीशनर्स के खिलाफ कोई जबरदस्ती की कार्रवाई न की जाए. उन्होंने इस कोर्ट द्वारा क्रिमिनल अपील नंबर 233/2026 (हर्षित @ हनी बनाम स्टेट ऑफ यू.पी. और अन्य), में पास किए गए 24.02.2026 के जजमेंट पर भी भरोसा किया.
दोनों पक्षों के तर्कों को सुनने के बाद कोर्ट ने स्पष्ट किया कि वर्तमान मामले के तथ्य पूर्व के cited मामलों से पूरी तरह भिन्न हैं. अदालत ने अपने फैसले में रेखांकित किया कि इस मामले में शिकायतकर्ता को विधिवत रूप से Lucky Draw का विजेता घोषित किया गया था. पुरस्कार की घोषणा किये जाने के बाद विजेता का कार के साथ फोटो शूट कराया गया और उसका विज्ञापन भी कराया गया. लेकिन जब उसने Lucky Draw में जीता गया अपना वैध पुरस्कार मांगा तो उसे लगातार टरकाया जाता रहा और बाद में अपमानित भी किया गया.
उधर, पुलिस ने प्रथम सूचना रिपोर्ट दर्ज करने के बाद प्रकरण की गहन विवेचना की. तथ्यों का परखा और Lucky Draw में जीती गयी कार को विजेता को न सौंपने और मांगने पर उसे अपमानित किये जाने के तथ्यों को सही पाया तो कोर्ट में आरोपियों के खिलाफ चार्जशीट दाखिल की. इस चार्जशीट को ट्रायल कोर्ट ने संज्ञान लिया और आरोपियों को समन जारी किया. इसी समन आदेश को इलाहाबाद हाई कोर्ट में चुनौती देते हुए समन आदेश के साथ ही केस की प्रोसीडिंग रद करने की मांग की गयी थी.
इलाहाबाद उच्च न्यायालय ने अपने निर्णय में कहा कि निचली अदालत ने आदेश पारित करने में किसी भी प्रकार की कानूनी अवैधता या अनियमितता नहीं की है. साक्ष्यों और रिकॉर्ड पर उपलब्ध सामग्री से यह स्पष्ट होता है कि प्रथम दृष्टया आरोपियों के खिलाफ मामला बनता है. इसी आधार पर उच्च न्यायालय ने अपीलकर्ताओं की इस याचिका में दम न होने की बात कहते हुए इसे पूरी तरह खारिज कर दिया.