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किसी Question पर Expert Committee के निष्कर्षों के खिलाफ अदालतें अपीलिया प्राधिकारी के रूप में कार्य नहीं कर सकती हैं और न ही उत्तर पुस्तिकाओं का मूल्यांकन दोबारा करने का आदेश दे सकती हैं

इलाहाबाद हाई कोर्ट ने UGC-नेट परीक्षा के Question को लेकर दाखिल याचिका खारिज, याचिकाकर्ता ने खुद की मामले की पैरवी

किसी Question पर Expert Committee के निष्कर्षों के खिलाफ अदालतें अपीलिया प्राधिकारी के रूप में कार्य नहीं कर सकती हैं और न ही उत्तर पुस्तिकाओं का मूल्यांकन दोबारा करने का आदेश दे सकती हैं

इलाहाबाद हाई कोर्ट ने एक महत्वपूर्ण फैसले में कहा है कि किसी Question के जवाब पर Expert Committee के निष्कर्षों के खिलाफ अदालतें अपीलिया प्राधिकारी के रूप में कार्य नहीं कर सकती हैं और न ही न्यायिक समीक्षा के दायरे में उत्तर पुस्तिकाओं का मूल्यांकन दोबारा करने का आदेश दे सकती हैं.

यह फैसला जस्टिस सिद्धार्थ नंदन की बेंच ने यूजीसी-नेट (UGC-NET) परीक्षा के एक बहुविकल्पीय Question और उसके आंसर को लेकर दाखिल की गई एक याचिका को खारिज करते हुए सुनाया है. कोर्ट ने कहा कि प्रतियोगी परीक्षाओं के तकनीकी और विषय-विशेष से जुड़े Question पर Expert Committee के रुख को लेकर अदालतों का रुख बेहद संतुलित रहता है.

यह पूरा मामला [WRIT-C No. 36401 of 2026] रितिक श्रीवास्तव नामक याचिकाकर्ता द्वारा स्वयं अदालत में पैरवी (In Person) करते हुए दायर किया गया था, जिसमें उन्होंने परीक्षा में पूछे गए एक Question और उसके सही विकल्पों को लेकर कानूनी चुनौती दी थी. मामला यूजीसी-नेट परीक्षा के दौरान राजनीति विज्ञान या उससे जुड़े विधि व संविधान खंड से संबंधित एक प्रश्न संख्या 144 से जुड़ा हुआ है. यह प्रश्न निम्नलिखित था:

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Question. 144. निम्नलिखित में से कौन सा एक संघीय संविधान (Federal Constitution) की विशेषता नहीं है?

शक्तियों का पृथक्करण (Separation of Power)

शक्तियों का विभाजन (Division of Power)

लिखित और कठोर संविधान (Written and Rigid Constitution)

न्यायालय की सर्वोच्चता (Supremacy of the Court)

परीक्षा आयोजित करने वाले आयोग की ओर से गठित विशेषज्ञ समिति ने इस Question का सही उत्तर विकल्प (1) यानी “शक्तियों का पृथक्करण” (Separation of Power) को माना था.

याचिकाकर्ता रितिक श्रीवास्तव ने अदालत के समक्ष तर्क दिया कि यद्यपि विकल्प (1) सही है, लेकिन विकल्प (4) यानी “न्यायालय की सर्वोच्चता” को लेकर भी Question में अस्पष्टता (Ambiguity) है. उन्होंने प्रसिद्ध कानूनविद् आचार्य डॉ. डीडी बसु की पुस्तक “कमेंट्री ऑन द कॉन्स्टिट्यूशन ऑफ इंडिया” और सर्वोच्च न्यायालय के विभिन्न ऐतिहासिक निर्णयों (जैसे कानपुर विश्वविद्यालय बनाम समीर गुप्ता मामले) का हवाला देते हुए कहा कि संघीय संविधान की मुख्य विशेषता ‘संविधान की सर्वोच्चता’ (Supremacy of the Constitution) होती है, न कि ‘न्यायालय की सर्वोच्चता’.

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याचिकाकर्ता का यह तर्क था कि ‘न्यायालय की सर्वोच्चता’ और ‘संविधान की सर्वोच्चता’ दो अलग-अलग अवधारणाएं हैं. ऐसे में यदि विकल्प 4 को भी सही मान लिया जाए या Question को अस्पष्ट माना जाए, तो उन्हें इस प्रश्न के एवज में 2 अंक मिलने चाहिए, जिससे वे यूजीसी-नेट परीक्षा में उत्तीर्ण हो सकें.

प्रतिवादी आयोग की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता जीके सिंह ने अधिवक्ता फुजैल अहमद अंसारी के साथ पक्ष रखते हुए सर्वोच्च न्यायालय के कई प्रसिद्ध निर्णयों (हिमाचल प्रदेश लोक सेवा आयोग बनाम मुकेश ठाकुर और रण विजय सिंह बनाम उत्तर प्रदेश राज्य) का हवाला दिया. उन्होंने स्पष्ट किया कि उत्तर पुस्तिकाओं के मूल्यांकन और उत्तर कुंजियों की शुद्धता का निर्धारण विशेषज्ञों का काम है. यदि कोई सांविधिक नियम (Statutory Provision) न हो, तो उच्च न्यायालय Question की स्वयं जांच करके दोबारा मूल्यांकन का आदेश नहीं दे सकता.

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मामले की सुनवाई कर रहे जस्टिस सिद्धार्थ नंदन ने दोनों पक्षों की दलीलों को विस्तार से सुनने के बाद पाया कि विशेषज्ञ समिति की रिपोर्ट के अनुसार विकल्प (1) सही उत्तर है. इसके साथ ही, अदालत ने यह भी माना कि ‘न्यायालय की सर्वोच्चता’ (या न्यायालय का प्राधिकार) को संघीय व्यवस्था से पूरी तरह बाहर नहीं किया जा सकता, क्योंकि न्यायपालिका ही संविधान की व्याख्या करने और विभिन्न अंगों के बीच संतुलन बनाए रखने का कार्य करती है.

अदालत ने याचिकाकर्ता के विधिक तर्कों और स्वयं पैरवी करने के उनके प्रयासों की सराहना की, परंतु यह स्पष्ट किया कि इस आधार पर उत्तर कुंजी में बदलाव या किसी प्रकार की राहत दिया जाना संभव नहीं है. तदनुसार, अदालत ने इस रिट याचिका को खारिज (Consigned to records) कर दिया.

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न्यायालयों का मानना है कि परीक्षा के Question और उत्तरों की शुद्धता तय करने का कार्य शैक्षणिक विशेषज्ञों (Academicians and Experts) का है, और न्यायिक क्षेत्र के भीतर इन मामलों में हस्तक्षेप की एक सीमा तय है. याचिकाकर्ता ने भले ही अपने तर्कों से एक नया विधिक दृष्टिकोण सामने रखने का प्रयास किया, लेकिन कानून की स्थापित सीमाओं के चलते अदालत ने हस्तक्षेप करने से इनकार कर दिया.

परीक्षा नियामक प्राधिकारी के सचिव टीईटी परीक्षा की हार्ड डिस्क के साथ पेश होने का निर्देश

इलाहाबाद हाई कोर्ट ने यूपी टेट 2013 के आवेदन में संदेहास्पद सामग्री मिलने पर गंभीर रुख अपनाते हुए परीक्षा नियामक प्राधिकारी, प्रयागराज के सचिव को हार्ड डिस्क के साथ पेश होने का निर्देश दिया है. जस्टिस मंजू रानी चौहान ने अरूण कुमार की याचिका पर यह आदेश दिया.

दीपेन्द्र कुमार, रजिस्ट्रार, परीक्षा नियामक प्राधिकारी, प्रयागराज ने टेबुलेशन रजिस्टर व डाउनलोडेड आवेदन फॉर्म और  अरुण प्रताप सिंह, खंड शिक्षा अधिकारी, संत कबीर नगर ने चयन कार्यवाही के रिकॉर्ड कोर्ट में पेश किए. कोर्ट ने पाया कि इसमें संदेह पैदा करने वाली सामग्री है. कहा कि मामले में उचित जांच की आवश्यकता है, लेकिन जांच से पहले सचिव, परीक्षा नियामक प्राधिकारी, प्रयागराज को अगली तारीख पर यूपी टेट 2013 के फाइनल आवेदन वाली हार्ड डिस्क के साथ कोर्ट में उपस्थित रहने का निर्देश दिया और अगली सुनवाई की तिथि 4 नवंबर तय की.

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