मुजफ्फरनगर Double murder Case: 2 को फांसी की सजा उम्रकैद में तब्दील, दस्तावेजों में हेराफेरी करने वाले पुलिसकर्मियों के खिलाफ जांच के आदेश
कोर्ट का आदेश, जांच में कदाचार पाया जाय तो पुलिसकर्मियों के खिलाफ विभागीय और आपराधिक दोनों तरह की सख्त कार्रवाई करके तीन महीने में रिपोर्ट दें

कोर्ट ने पुलिस जांच में पाई गई गंभीर खामियों और आधिकारिक दस्तावेजों में हेरफेर किये जाने पर गहरी नाराजगी जताई है और डीजीपी उत्तर प्रदेश को इस मामले में शामिल पुलिसकर्मियों के खिलाफ उच्चस्तरीय जांच के आदेश दिए हैं.
यह मामला मुजफ्फरनगर जिले के छपार थाना क्षेत्र के अंतर्गत आने वाले बरला गांव का था. घटना 9 नवंबर 2011 की शाम करीब 5:00 बजे सामने आयी थी. अभियोजन पक्ष के अनुसार एफआईआर दर्ज कराने वाले मोहम्मद आलिम और अभियुक्त बारिक की जमीनें आपस में सटी हुई थीं. दोनों जमीनों के बीच की मेड़ पर पेड़ के पास खड़े थे. आरोप था कि बारिक और उसके बेटों ने मेड़ काटकर उन पेड़ों को अपने कब्जे में लेने की कोशिश की थी.
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इसी रंजिश के चलते 9 नवंबर की शाम को अभियुक्तों ने धारदार हथियारों के साथ हमला बोल दिया. इस हिंसक हमले में आलिम के बेटे आजाद (उर्फ राजा) और पिता रियासत (उर्फ मुखिया) की निर्मम हत्या (murder) कर दी गई. घटना में फजरुद्दीन और मुन्नवर (उर्फ मोनू) गंभीर रूप से घायल हो गए. हमलावरों ने क्रूरता की हद पार करते हुए murder के बाद मृतकों के हाथ तक कलाई से काट दिए थे.
Murder Case में सत्र न्यायालय ने फांसी की सजा सुनाई और मौत की सजा की पुष्टि के लिए हाईकोर्ट को डेथ रेफरेंस भेजा था

Murder Case की सुनवाई के बाद मुजफ्फरनगर के सत्र न्यायालय ने 23 मई 2017 को अभियुक्त बारिक और शाहबाद को दोषी करार देते हुए फांसी की सजा सुनाई थी और मौत की सजा की पुष्टि के लिए हाईकोर्ट को डेथ रेफरेंस भेजा था. इसके खिलाफ अभियुक्तों ने आपराधिक अपील दाखिल की थी. हाईकोर्ट ने डेथ रेफरेंस और अपील पर एक साथ सुनवाई की.
सुनवाई के बाद कोर्ट ने कहा कि हालांकि घायलों की गवाही और मेडिकल रिपोर्ट से अभियुक्तों की संलिप्तता और अपराध साबित होता है, लेकिन यह मामला ‘सबसे दुर्लभ से दुर्लभ’ श्रेणी के अंतर्गत नहीं आता है. कोर्ट ने कहा कि यह घटना (Double Murder) दो पड़ोसी परिवारों के बीच जमीन और सीमा के विवाद का हिंसक परिणाम थी न कि किसी पूर्व-नियोजित दुर्भावनापूर्ण अपराध का हिस्सा. इसलिए, बारिक और शाहबाद की मौत की सजा को उम्रकैद में बदल दिया जाना चाहिए. कोर्ट ने दोनों पर लगाए गए अन्य जुर्माने और सजा को बरकरार रखने का फैसला सुनाया.
हाईकोर्ट ने अभियोजन पक्ष द्वारा हथियारों की बरामदगी और उससे जुड़े आयुध अधिनियम के आरोपों को साबित करने में विफल रहने पर अभियुक्तों को इस आरोप से बरी कर दिया. कोर्ट ने माना कि पुलिस द्वारा बरामदगी की प्रक्रिया और प्रकटीकरण बयानों में गंभीर कानूनी कमियां थीं.
न्यायालय ने दंड प्रक्रिया संहिता (CrPC) की धारा 357(3) के तहत अभियुक्तों को निर्देश दिया कि वे प्रत्येक मृतक (आजाद और रियासत) के परिजनों को 1-1 लाख रुपये और प्रत्येक घायल (फजरुद्दीन और मुन्नवर) को 50-50 हजार रुपये का मुआवजा छह महीने के भीतर समान रूप से भुगतान करें. इसके अलावा जिला विधिक सेवा प्राधिकरण, मुजफ्फरनगर को भी पीड़ितों के लिए मुआवजे पर विचार करने का निर्देश दिया गया है.
इस फैसले का सबसे महत्वपूर्ण पहलू अदालत द्वारा पुलिस जांच में पाई गई भारी अनियमितताओं पर की गई सख्त टिप्पणी है. हाईकोर्ट ने पाया कि इस मामले में आधिकारिक रिकॉर्ड और दस्तावेजों के साथ छेड़छाड़ की गई थी:
- • एफआईआर और पंचनामा में हेरफेर: murder की एफआईआर दर्ज करने के समय, पंचनामा रिपोर्ट और जनरल डायरी प्रविष्टियों में बिना किसी स्पष्टीकरण के ओवरराइटिंग और समय में बदलाव किए गए थे.
- • दस्तावेजों में विसंगतियां: रियासत के पंचनामे में उसकी मौत का समय उस वक्त का दिखाया गया जब हमला चल ही रहा था और वह जीवित था.
इसे अत्यंत गंभीर मानते हुए हाईकोर्ट ने उत्तर प्रदेश के पुलिस महानिदेशक और वरिष्ठ पुलिस अधीक्षक, मुजफ्फरनगर को निर्देश दिया है कि वे एसएसआई भारत लाल शाह, एसआई देवेंद्र सिंह, एसआई अनिल कुमार सागर और अन्य जिम्मेदार पुलिस अधिकारियों की भूमिका की उच्चस्तरीय जांच कराएं.
कोर्ट ने कहा कि यदि जांच में कदाचार पाया जाता है, तो इन अधिकारियों के खिलाफ विभागीय और आपराधिक दोनों तरह की सख्त कार्रवाई की जाए और रिपोर्ट तीन महीने के भीतर हाईकोर्ट के रजिस्ट्रार जनरल के समक्ष प्रस्तुत की जाए.
पुलिस महानिदेशक सभी जिलों को ऐसे निर्देश जारी करने पर भी विचार करेंगे जिनसे यह सुनिश्चित हो सके कि सूचना मिलने का समय, एफआईआर दर्ज करने का समय और जाँच-पड़ताल का समय सही-सही और उसी समय दर्ज किया जाए, और ऐसे रिकॉर्ड में किसी भी सुधार का उचित कारण बताया जाए.
कोर्ट ने एफआईआर में नामजद दो अन्य जो शाहनवाज उर्फ काला और शाहनजर उर्फ मोनू, बारिक के बेटे हैं को नाबालिग पाया और उनके मामलों को बाकी आरोपियों के मामलों से अलग करके जुवेनाइल जस्टिस बोर्ड के पास भेज दिया.
फैसले में घटना में उनकी भूमिका का जिक्र इसलिए किया गया क्योंकि यह अभियोजन पक्ष के मामले और अपीलकर्ताओं के खिलाफ सबूतों का हिस्सा है. कोर्ट ने कहा कि वर्तमान फैसले में ऐसी कोई बात नहीं है जो उनके दोषी होने का निष्कर्ष हो या उनके खिलाफ मामले पर कोई राय जाहिर करती हो. इस पर जुवेनाइल जस्टिस बोर्ड अपने रिकॉर्ड के आधार पर फैसला करेगा.