First information report दर्ज कराने के लिए पुलिस के बजाय सीधे हाईकोर्ट आने की प्रवृत्ति चिंताजनक, हाई कोर्ट ने कहा मजिस्ट्रेट की अदालत में जाना वैकल्पिक उपचार
पत्रकार की एफआईआर दर्ज कराने की मांग में दाखिल याचिका इलाहाबाद हाईकोर्ट ने की खारिज

First information report दर्ज करने का पुलिस अफसरों को आदेश देने की मांग लेकर इलाहाबाद हाई कोर्ट पहुंचे पत्रकार अमित श्रीवास्तव को करारा झटका लगा है. इलाहाबाद हाईकोर्ट के जस्टिस चन्द्र धारी सिंह और जस्टिस तरुण सक्सेना ने याचिका खारिज कर दी है. याचिका में पत्रकार ने प्रयागराज के थाना झूंसी को First information report दर्ज कराने का निर्देश जारी करने की मांग की थी.
याचिकाकर्ता के अनुसार, 1 अगस्त 2025 को शाम करीब 7 बजे वे झूंसी क्षेत्र में बाढ़ की कवरेज कर घर लौट रहे थे, तभी रहीमापुर के पास दो मोटरसाइकिलों पर सवार चार अज्ञात लोगों ने उनकी कार पर फायरिंग कर दी. पत्रकार का दावा था कि गोलियां उनकी कार को लगीं और वे बाल-बाल बचे. उन्होंने आरोप लगाया कि यह हमला अतीक अहमद गिरोह से जुड़े कथित भूमाफियाओं ने करवाया, क्योंकि उन्होंने चैनल पर इनके खिलाफ रिपोर्टिंग की थी. शिकायत में उन्होंने प्रतिवादी संख्या 4 से 11 तक के लोगों को नामजद किया, लेकिन पुलिस ने First information report दर्ज नहीं की.
संज्ञेय अपराध की सूचना मिलने पर First information report दर्ज करना अनिवार्य
याचिकाकर्ता के वकील ने दलील दी कि थानाध्यक्ष जानबूझकर आरोपियों से मिले हुए हैं और ललिता कुमारी बनाम उत्तर प्रदेश राज्य (2014) मामले में सुप्रीम कोर्ट के निर्देशों के अनुसार, संज्ञेय अपराध की सूचना मिलने पर First information report दर्ज करना अनिवार्य है. अपर शासकीय अधिवक्ता ने याचिका को झूठी और मनगढ़ंत बताते हुए कड़ा विरोध किया. बताया गया कि एसएचओ झूंसी ने मौके की जांच की तो घटनास्थल पर ऐसी कोई वारदात होने के सबूत नहीं मिले. स्थानीय लोगों के बयान में भी फायरिंग की पुष्टि नहीं हुई

सीसीटीवी फुटेज जांच में पेट्रोल पंप पर याचिकाकर्ता और साथी सामान्य रूप से रुके, कोई हड़बड़ी नहीं दिखी. गाड़ी में मिले गोलों के निशान संदिग्ध पाए गए. एक डिग्गी में रजाई में फंसा मिला, दूसरा पिछली सीट में, जिससे फायरिंग की पुष्टि नहीं होती. सहायक पुलिस आयुक्त की स्वतंत्र जांच में भी आरोप झूठे पाए गए. जांच रिपोर्ट में यह भी सामने आया कि याचिकाकर्ता पहले भी सुरक्षा (गनर) पाने की मांग करते रहे हैं, और यह शिकायत सुरक्षा हासिल करने के मकसद से दर्ज कराई गई प्रतीत होती है.
कोर्ट ने कहा कि जहां तथ्यों को लेकर विवाद हो, वहां अनुच्छेद 226 के तहत First information report दर्ज कराने का सीधा आदेश देना उचित नहीं है. कोर्ट ने साकिरी वासु बनाम उत्तर प्रदेश राज्य (2008) और हाल के फैसले सुजल विश्वास अटावर बनाम महाराष्ट्र राज्य (2026) का हवाला देते हुए कहा कि पीड़ित व्यक्ति को पहले बीएनएसएस की धारा 173(4) के तहत वरिष्ठ पुलिस अधिकारियों से संपर्क करना चाहिए और उसके बाद धारा 175(3) बीएनएसएस के तहत मजिस्ट्रेट के समक्ष जाना चाहिए.
कोर्ट ने इसे “वैकल्पिक” नहीं बल्कि “प्राथमिक और वरीयता प्राप्त” उपाय बताया. कोर्ट ने यह भी टिप्पणी की कि हाईकोर्ट में सीधे एफआईआर दर्ज कराने की मांग लेकर पहुंचने वाले वादियों की बढ़ती प्रवृत्ति पर चिंता जताते हुए कहा कि यह विधायी मंशा और मजिस्ट्रेट की वैधानिक भूमिका को दरकिनार करता है.
जीएसटी अपीलीय ट्रिब्यूनल में 92 में से 63 पद अब भी खाली, केंद्र सरकार से मांगा भर्ती कार्यवाही का ब्योरा

उत्तर प्रदेश में जीएसटी अपीलीय ट्रिब्यूनल की पीठों में भारी संख्या में रिक्त पदों को लेकर इलाहाबाद हाईकोर्ट ने केंद्र सरकार को कड़ी नाराजगी जताई है. मामले की सुनवाई करते हुए जस्टिस पीयूष अग्रवाल की एकल पीठ ने केंद्र सरकार के हलफनामे को अपर्याप्त और अस्पष्ट करार दिया. कोर्ट के आदेश पर पहले वित्त मंत्रालय के संयुक्त सचिव ने हलफनामा दाखिल किया था, जिसमें दावा किया गया कि उत्तर प्रदेश में जीएसटी अपीलीय ट्रिब्यूनल पूरी तरह कार्यशील हैं. लेकिन कोर्ट ने कहा कि हलफनामे की सामग्री ही इस दावे का खंडन करती है.
दाखिल हलफनामे के मुताबिक उत्तर प्रदेश में जीएसटी अपीलीय ट्रिब्यूनल के विभिन्न स्तरों पर कुल 92 पद स्वीकृत हैं (86 पद 10 मई 2024 को और 6 अतिरिक्त पद 5 मई 2026 को मंजूर किए गए). इनमें से अब तक केवल 29 पद ही भरे जा सके हैं.मात्र 6 पदों पर भर्ती प्रक्रिया जारी होने की बात कही गई है. शेष 63 पद अब भी खाली हैं और इन्हें भरने की कोई ठोस समयबद्ध कार्ययोजना हलफनामे में नहीं दी गई.
कोर्ट ने यह भी नोट किया कि सितंबर 2025 के एक परिपत्र के तहत राज्य की विभिन्न बेंचों से जुड़े 44 पदों में से केवल 14 पद ही भरे जा सके और सरकार ने इसका कारण “पर्याप्त आवेदन न मिलना” बताया. इसके बाद अगस्त 2025 और जनवरी 2026 में और परिपत्र जारी किए गए, लेकिन कोर्ट ने कहा कि इन परिपत्रों के बाद क्या ठोस कार्रवाई हुई, आवेदन कितने आए, जांच कैसे हुई, इन सबका कोई ब्यौरा हलफनामे में नहीं है.
कोर्ट ने कहा कि केवल परिपत्र और विज्ञापन जारी कर देना कानूनी दायित्व की पूर्ति नहीं माना जा सकता. इसके लिए ठोस और प्रभावी कार्रवाई जरूरी है जो वाकई पदों की भर्ती में तब्दील हो. कोर्ट ने यह भी कहा कि अधिकारियों की ओर से प्रभावी अनुवर्ती कार्रवाई की कमी सरकार की मूल मंशा को ही विफल कर रही है, जिससे अंततः वादियों को प्रभावी अपीलीय उपाय से वंचित होना पड़ रहा है.
कोर्ट ने वित्त मंत्रालय, राजस्व विभाग के संयुक्त सचिव को अगली सुनवाई से पहले एक विस्तृत, विशिष्ट और ठोस हलफनामा दाखिल करने का निर्देश दिया है, जिसमें इन बातों का खुलासा अनिवार्य होगा कि सभी 92 पदों की पद-वार और पीठ-वार स्थिति, रिक्त पदों को भरने की प्रक्रिया का वर्तमान चरण, हर रिक्ति के लिए तिथिवार की गई कार्रवाई और जिम्मेदार प्राधिकारी, सितंबर 2025, अगस्त 2025 और जनवरी 2026 के परिपत्रों पर हुई कार्रवाई का पूरा विवरण, विज्ञापन/नोटिस कब और कैसे वेबसाइटों पर अपलोड या प्रसारित किए गए.
प्रत्येक पद के लिए प्राप्त आवेदनों की संख्या और चयन प्रक्रिया की स्थिति, जीएसटी अपीलीय ट्रिब्यूनल की प्रमुख पीठ व संबंधित बेंचों के साथ हुए पत्राचार का विवरण, रिक्तियां भरने के लिए स्पष्ट और समयबद्ध कार्यक्रम क्या है. कोर्ट ने साफ चेतावनी दी है कि यदि अगला हलफनामा भी संतोषजनक और समयबद्ध प्रगति नहीं दिखाता, तो कोर्ट जिम्मेदार अधिकारी को व्यक्तिगत रूप से तलब कर सकता है और आगे के आदेश पारित करने पर विचार करेगा. मामले की अगली सुनवाई 9 सितंबर 2026 को संबंधित मामले के साथ नियत की गई है.