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पहली शादी छुपाकर Second marriage रचाने वाले दोषी की सजा घटाकर की काटी गई अवधि तक सीमित, 39 साल पुराने मामले में हाईकोर्ट ने बरकरार रखी दोषसिद्धि

इलाहाबाद हाई कोर्ट ने 72 वर्षीय बुजुर्ग की उम्र और स्वास्थ्य को देखते हुए सजा में दी राहत

पहली शादी छुपाकर Second marriage रचाने वाले दोषी की सजा घटाकर की काटी गई अवधि तक सीमित, 39 साल पुराने मामले में हाईकोर्ट ने बरकरार रखी दोषसिद्धि

इलाहाबाद हाईकोर्ट ने First marriage की बात छुपाकर Second marriage करने और धोखे से शारीरिक संबंध बनाने के आरोप में दोषी ठहराए गए एक व्यक्ति की सजा में राहत दी है. हाईकोर्ट ने दोषसिद्धि को बरकरार रखते हुए भी 72 वर्षीय अपीलकर्ता बुलंदशहर के राधे श्याम की सजा घटाकर उतनी अवधि तक सीमित कर दी, जितनी वह पहले ही जेल में काट चुका है. जस्टिस तेज प्रताप तिवारी की एकल पीठ ने यह फैसला सुनाया.

यह मामला 1985 का है, जब बुलंदशहर की अतिरिक्त सत्र न्यायाधीश अदालत ने 7 फरवरी 1987 को राधे श्याम को भारतीय दंड संहिता की धारा 376 (बलात्कार), 420 (धोखाधड़ी) और 495 (पहली शादी छुपाकर Second marriage करना) के तहत दोषी करार देते हुए क्रमशः 4, 2 और 2 साल के कठोर कारावास की सजा सुनाई थी.

मामले में सह-आरोपी जय राम को भी धारा 420 और 495/109 के तहत 2-2 साल की सजा दी गई थी, लेकिन अपील के लंबित रहने के दौरान जय राम की मृत्यु हो जाने से उसके खिलाफ अपील समाप्त मान ली गई. अदालत ने केवल राधे श्याम के मामले पर सुनवाई की.

दूसरी शादी के लिए First marriage छिपाकर खुद को अविवाहित बताया

अभियोजन पक्ष के अनुसार, शिकायतकर्ता अपने बुजुर्ग दादा और चाचा की देखरेख में रहती थीं. जनवरी 1984 में आरोपी जय राम ने पीड़िता के चाचा से संपर्क कर बताया कि उसका भतीजा राधे श्याम अविवाहित (First marriage छुपाकर) है, मेरठ की एक बुनाई फैक्ट्री में 900 रूपये मासिक वेतन पर काम करता है और कई संपत्तियों का मालिक भी है.

इस भरोसे पर परिवार मेरठ गया, जहां राधे श्याम ने भी खुद को अविवाहित बताया. इसके बाद फरवरी 1984 में सगाई और लगन की रस्में हुईं, जिनमें दहेज के तौर पर नकदी, कपड़े और मिठाइयां दी गईं. 23/24 फरवरी 1984 की रात हिंदू रीति-रिवाज से विवाह (marriage) संपन्न हुआ.

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विवाह (marriage) के बाद मुन्नी देवी अपने ससुराल मेरठ गईं, जहां करीब चार दिन रहने के दौरान आरोपी ने उनसे शारीरिक संबंध बनाए. इसी दौरान उन्हें पता चला कि घर में रहने वाली एक अन्य महिला वास्तव में राधे श्याम की कानूनन विवाहित (marriage) पहली पत्नी थी. जब उन्होंने इस बारे में सवाल किया तो आरोपी ने सच्चाई उजागर करने पर जान से मारने की धमकी दी.

बुलंदशहर लौटने के बाद डर के कारण उन्होंने कुछ समय तक यह बात छुपाए रखी, लेकिन बाद में परिवार को पूरी बात बताई. दहेज का सामान लौटाने के प्रयास विफल रहने पर कानूनी नोटिस भेजा गया, जिस पर आरोपी ने माफी तो मांगी लेकिन न सामान लौटाया, न गलती सुधारी. शिकायतकर्ता पीड़िता, उनके चाचा नानक चंद, गवाह भगवती प्रसाद और दादा गंगा सरन. सभी ने प्राथमिकी में दर्ज घटनाक्रम की पुष्टि की.

आरोपी राधे श्याम ने अदालत में दिए बयान में दावा किया कि उसने भगवती प्रसाद और हसन अली को मेरठ में मुलाकात के दौरान अपनी पहली शादी (marriage) की जानकारी दे दी थी और तलाक का दस्तावेज भी दिखाया था. सगाई के समय भी उसने दोबारा यह बात बताई थी कि वह तलाकशुदा है.

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बचाव पक्ष ने गवाह मलखान को पेश किया, जिसने बताया कि 1976 में कृष्णा देवी और राधे लाल का विवाह (marriage) हुआ था, जो असफल रहा और एक साल बाद समझौते से खत्म हो गया. बचाव पक्ष ने यह भी दलील दी कि उनकी बिरादरी में आपसी सहमति से तलाक की प्रथा प्रचलित है.

अपीलकर्ता के वकील दुष्यंत कुमार ने दलील दी कि आरोपी को यह ईमानदार विश्वास था कि उसकी पहली शादी (marriage) पहले ही भंग हो चुकी है, इसलिए धारा 376 और 495 दोनों के तहत दोषी ठहराना गलत है. राज्य की ओर से अपर शासकीय अधिवक्ता हर्षिता रानी ने तर्क दिया कि नोटरी से बने तलाक के समझौते को कानूनी मान्यता नहीं मिल सकती और आरोपी ने पहली शादी (marriage) की जानकारी छुपाई थी.

हाईकोर्ट ने पाया कि आरोपी द्वारा पेश किया गया “तलाक विलेख” कानून की नजर में वैध तलाक की डिक्री नहीं माना जा सकता. अदालत ने यह भी नोट किया कि आरोपी ने खुद अपने बयान में स्वीकार किया था कि उसकी पहली शादी (marriage) भंग करने की कार्यवाही 1979 में विवादित रही थी, जिससे स्पष्ट है कि वह जानता था कि हिंदू विवाह को भंग करना कानूनी प्रक्रिया का विषय है. इसके बावजूद किसी सक्षम अदालत की डिक्री पेश नहीं की गई.

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अदालत ने कहा कि बिरादरी में तलाक की कथित प्रथा को साबित करने के लिए कोई ठोस या विश्वसनीय सबूत पेश नहीं किया गया. इस संदर्भ में अदालत ने राम कृपाल सिंह बनाम मध्य प्रदेश राज्य और मुंबई हाईकोर्ट के जतिना समीर शाह बनाम समीर मोहित शाह जैसे फैसलों का हवाला दिया, जिनमें कहा गया है कि केवल समझौते के आधार पर विवाह (marriage) भंग नहीं माना जा सकता, जब तक सक्षम अदालत से डिक्री न मिले या प्रथा को विधिवत साबित न किया जाए.

अदालत ने निष्कर्ष निकाला कि आरोपी को यह पता था कि उसकी पहली शादी (marriage) कानूनन भंग नहीं हुई थी, फिर भी उसने यह तथ्य छुपाकर दूसरी शादी (marriage) की और शारीरिक संबंध बनाए. इस आधार पर धारा 376 और 495 दोनों के तहत अपराध के तत्व संतुष्ट पाए गए. दोषसिद्धि बरकरार रखते हुए भी अदालत ने अपीलकर्ता की उम्र (करीब 72 वर्ष) और यह तथ्य ध्यान में रखा कि अपील पिछले 39 वर्षों से लंबित थी.

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अदालत ने कहा कि बिना किसी आपराधिक पृष्ठभूमि वाले 70 वर्ष से अधिक उम्र के व्यक्ति को, जो पहले ही कुछ समय जेल में बिता चुका है, दोबारा कारावास भेजना न्याय की दृष्टि से उचित नहीं होगा. इसी आधार पर अदालत ने सजा घटाकर उतनी अवधि तक सीमित कर दी, जितनी वह पहले ही काट चुका है. हाईकोर्ट ने अपील को आंशिक रूप से स्वीकार करते हुए बुलंदशहर की अतिरिक्त सत्र न्यायाधीश अदालत द्वारा 7 फरवरी 1987 को पारित दोषसिद्धि और सजा के आदेश में संशोधन किया.

Matrimonial Dispute: पत्नी की अर्जी पर हाईकोर्ट ने वाराणसी से रायबरेली स्थानांतरण मामले में जारी किया नोटिस, कार्यवाही पर लगाई रोक

इलाहाबाद हाईकोर्ट ने एक Matrimonial Dispute के मामले को वाराणसी की फैमिली कोर्ट से रायबरेली स्थानांतरित किए जाने की अर्जी पर सुनवाई करते हुए विपक्षी पक्ष को नोटिस जारी किया है और मामले की अगली सुनवाई तक निचली अदालत में चल रही कार्यवाही पर रोक लगा दी है. यह आदेश जस्टिस डॉ. योगेंद्र कुमार श्रीवास्तव की एकलपीठ ने पूजा खरे बनाम शिवम सिन्हा मामले में पारित किया.

पूजा खरे ने हिंदू विवाह अधिनियम, 1955 की धारा 9 के तहत प्रधान न्यायाधीश, फैमिली कोर्ट, वाराणसी में लंबित याचिका संख्या 2186/2025 को रायबरेली स्थानांतरित करने की मांग की है. अर्जी में बताया गया कि दोनों पक्षों का विवाह 19 नवंबर 2021 को हुआ था.

आवेदिका का आरोप है कि विवाह के बाद उसे प्रताड़ना और उत्पीड़न झेलना पड़ा, Matrimonial Dispute के चलते नवंबर 2023 में उसे ससुराल छोड़ना पड़ा. तब से वह अपनी बुआ-फूफा के संरक्षण में रायबरेली में रह रही है. याचिकाकर्ता का यह भी कहना है कि उसके पास आय का कोई स्वतंत्र स्रोत नहीं है, ऐसे में वाराणसी में Matrimonial Dispute मुकदमे की पैरवी करना उसके लिए भारी कठिनाई का कारण बनेगा.

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कोर्ट ने मामले को विचारणीय मानते हुए विपक्षी पक्ष को नोटिस जारी किया है, जिसका जवाब 27 अगस्त 2026 तक देना होगा. साथ ही अगली सुनवाई तक वाराणसी फैमिली कोर्ट में चल रही Matrimonial Dispute कार्यवाही पर रोक लगा दी गई है. आवेदिका की ओर से अधिवक्ता निर्विकल्प पांडेय और प्रारब्ध पांडेय ने पैरवी की.

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