हाईकोर्ट ने हत्या के 2 accused की उम्रकैद की सजा रद, किया बरी, कहा: सबूत बगैर पुलिस ने गढ़ी थी झूठी कहानी

इलाहाबाद हाईकोर्ट ने मैनपुरी में 2007मे हुईं हत्या केस में दो accused दिलीप और सुनील को बरी कर दिया है. दोनों accused को 2020 में विशेष न्यायाधीश (ई.सी. एक्ट), मैनपुरी की अदालत ने धारा 302/34 आईपीसी के तहत उम्रकैद की सजा सुनाई थी. 3 अक्टूबर 2007 को मोहम्मद जावेद को उसके घर के गेट पर गोली मारकर हत्या कर दी गई थी. तीन मोटरसाइकिल सवार बदमाश वारदात को अंजाम देकर फरार हो गए थे. घटना के करीब दो महीने बाद पुलिस ने दो accused दिलीप और सुनील को हथियारों सहित गिरफ्तार किया और उन पर हत्या का आरोप लगाया.
जस्टिस जेजे मुनीर और जस्टिस विनय कुमार द्विवेदी की खंडपीठ ने पाया कि- मृतक के भाई, जो कथित चश्मदीद गवाह थे, वास्तव में घटना के समय मौके पर मौजूद नहीं थे. गोली की आवाज सुनकर वे बाहर आए थे, इसलिए वे केवल घटना के तुरंत बाद के गवाह माने गए, न कि प्रत्यक्षदर्शी. Accused पहले से गवाहों को नहीं जानते थे, ऐसे में बिना पहचान परेड के अदालत में पहचान संदिग्ध मानी गई. जिस गवाह (नीरज गुप्ता उर्फ लल्लैया) के बयान पर accused का नाम जोड़ा गया, वह मुकदमे में मुकर गया और पुलिस ने उसका पुराना बयान साबित करने की कोशिश तक नहीं की.

अभियोजन ने हत्या के दो अलग-अलग मकसद बताए-पहले लूट का प्रयास, फिर सुपारी देकर हत्या कराने की कहानी जो एक-दूसरे से मेल नहीं खाते और गवाहों की गवाही सुनी-सुनाई पाई गई. कथित साजिशकर्ता हबीब अहमद और रफीक अहमद को कभी accused ही नहीं बनाया गया. Accused की निशानदेही पर हथियार या कोई अन्य ठोस सबूत बरामद नहीं हुआ.
कोर्ट ने टिप्पणी की कि पूरा मामला अनुमान और गढ़ी गई कहानी पर आधारित था और अभियोजन accused के खिलाफ आरोप संदेह से परे साबित करने में पूरी तरह विफल रहा. हाईकोर्ट ने निचली अदालत का 28 जनवरी 2020 का दोषसिद्धि आदेश और 30 जनवरी 2020 का सजा आदेश रद्द करते हुए दोनों accused अपीलकर्ताओं को बरी कर दिया.
बिना आधार बतायें की गई accused की गिरफ्तारी असंवैधानिक करार, रिमांड आदेश रद्द

इलाहाबाद हाई कोर्ट के जस्टिस जेजे मुनीर और जस्टिस तरुण सक्सेना की खंडपीठ ने संभल जिले के गुन्नौर थाना क्षेत्र से जुड़े एक मामले में याची राकेश की गिरफ्तारी अवैध करार दिया है और रिमांड आदेश 20 अप्रैल 2025 को रद्द कर दिया है. कोर्ट ने कहा गिरफ्तारी से पहले आधार न बताना असंवैधानिक है.
उमर अहमद ने 18 अप्रैल 2025 को एफआईआर दर्ज कराई थी कि उसकी पत्नी को राकेश बहला-फुसलाकर ले गया है. राकेश को भी बीएनएस की धारा 87, 127(4), 64(1) और 143(2) के तहत 20 अप्रैल 2025 को गिरफ्तार किया गया. इसके खिलाफ तर्क दिया गया कि संविधान के अनुच्छेद 22(1) के तहत गिरफ्तार व्यक्ति को गिरफ्तारी के आधार बताना अनिवार्य है , यह महज औपचारिकता नहीं, मौलिक अधिकार है.
कोर्ट ने पाया कि गिरफ्तारी मेमो में केवल “गिरफ्तारी के कारण” दर्ज थे, जबकि विशिष्ट “आधार” कहीं दर्ज नहीं थे जो कि सुप्रीम कोर्ट के फैसलों का उल्लघंन है. जनरल डायरी में एंट्री नंबर 27 में भी सिर्फ धाराओं का उल्लेख था, ठोस आधार नहीं. रिमांड मजिस्ट्रेट ने भी बिना अनुच्छेद 22(1) के अनुपालन की जांच किए, एक प्रिंटेड प्रोफार्मा पर यांत्रिक ढंग से रिमांड दे दिया.
राज्य ने आरोपों की गंभीरता (दुष्कर्म व मानव तस्करी) का हवाला दिया और कहा कि याचिकाकर्ता (accused) पहले जमानत याचिका में असफल हो चुका है, इसलिए अब गिरफ्तारी को चुनौती नहीं दे सकता. कोर्ट ने इसे कुसुम साहू मामले से अलग बताते हुए खारिज किया, क्योंकि यहां मुद्दा गिरफ्तारी की वैधता का था, न कि मुकदमे के गुण-दोष का.
कोर्ट ने रिमांड आदेश रद्द करते हुए याचिकाकर्ता (accused) को बॉन्ड भरने पर रिहा करने का निर्देश दिया. साथ ही सत्र न्यायाधीश, संभल को निर्देश दिया कि अधीनस्थ मजिस्ट्रेट बिना गिरफ्तारी आधार की लिखित पुष्टि के रटा-रटाया रिमांड न दें. कोर्ट ने स्पष्ट किया कि इस आदेश का मुकदमे की सुनवाई या आरोपों की गंभीरता पर कोई असर नहीं पड़ेगा.