Teenage में दर्ज मुकदमे के आधार पर नौकरी से निकाला गया सीआरपीएफ जवान 22 साल बाद सेवा में वापस लौटेगा
इलाहाबाद हाई कोर्ट ने रद्द किया बर्खास्तगी, अपील और रिवीजन आदेश, 25 फीसदी बैक वेजेज के भी भुगतान का आदेश

Teenage में थाने में क्रिमिनल केस दर्ज होने जैसे महत्वपूर्ण तथ्य को छिपाने के चलते 22 साल पहले सीआरपीएफ की सेवा से बर्खास्त कर दिये गये आरक्षी को इलाहाबाद हाई कोर्ट से बड़ी राहत मिल गयी है. जस्टिस अनीस कुमार गुप्ता की बेंच ने तथ्यों को परखने के बाद माना कि Teenage में थाने में क्रिमिनल केस दर्ज होने जैसे कानून के अनुसार जिस तथ्य का जिक्र किसी भी फोरम पर किया ही नहीं जा सकता और जिसका ब्यौरा सात साल बाद नष्ट कर दिये जाने का कानून मौजूद है, वहां आरक्षी को बर्खास्त करने जैसा फैसला सुना दिया गया.
उसकी अपील और रिवीजन भी खारिज कर दिया गया. हाई कोर्ट ने इन सभी आदेशों को रद कर करते हुए आरक्षी को सेवा में बहाल करने का आदेश दिया है. कोर्ट ने यह आदेश भी दिया है कि आरक्षी को बर्खास्तगी की 22 साल की अवधि के सम्पूर्ण वेतन के 25 फीसदी हिस्से का भुगतान किया जाय.
याची चंद्रेश्वर प्रसाद यादव को 2003 में सीआरपीएफ में आरक्षी के पद पर भर्ती किया गया था. भर्ती के बाद प्रशिक्षण के दौरान चरित्र सत्यापन में यह सामने आया कि उसके खिलाफ आजमगढ़ में वर्ष 2001 में (Teenage) आईपीसी की धारा 427, 323, 504 और 506 के तहत एक आपराधिक केस दर्ज था. इलाहाबाद और फिर हैदराबाद में वेरीफिकेशन फॉर्म भरते समय उसने आपराधिक केस का कालम ब्लैंक छोड़ दिया था.
सत्यापन के दौरान आजमगढ़ के जिला मजिस्ट्रेट ने सीआरपीएफ को रिपोर्ट भेजी, जिससे उसके खिलाफ आपराधिक मामला दर्ज होने का खुलासा हुआ. इस रिपोर्ट के आधार पर 23 जून 2004 को जब वह जम्मू कश्मीर के श्रीनगर में ट्रेनिंग ले रहा था उसे एक नोटिस सर्व की गयी. नोटिस में उसे जानकारी दी गयी थी कि एक महीने के भीतर उसे सेवा से बर्खास्त कर दिया जायेगा.
जिस वक्त एफआईआर दर्ज की गयी है उस समय वह माइनर (Teenage) था

याची ने इस पर आपत्ति दर्ज कराते हुए आवेदन देकर बताया कि जिस एफआईआर के आधार पर उसकी सेवाएं बर्खास्त की जाने वाली हैं, उसमें नामजद व्यक्ति का नाम चन्द्रभान उर्फ चन्द्रशेखर दर्ज था जबकि याची का नाम चन्द्रेश्वर था. जिस वक्त एफआईआर दर्ज की गयी है उस समय वह माइनर (Teenage) था. याची के आवेदन पर अफसरों ने कोई जवाब नहीं दिया और 5 अगस्त 2004 को उसकी सेवाएं समाप्त कर दी गई थीं.
आदेश के खिलाफ याची ने विभाग में अपील दाखिल की. इस पर कोई सुनवाई नहीं हुई तो उसने हाई कोर्ट का रुख किया. हाई कोर्ट के आदेश के बाद उसकी अपील निस्तारित की गयी. इसके बाद उसने पुनरीक्षण अर्जी दाखिल की. तब तक वह मुदकमा समाप्त हो चुका था जिसके आधार पर उसे सेवा से बर्खास्त किया गया था. इसकी प्रति भी उसने रिवीजनल अथॉरिटी के सामने पेश किया इसके बाद भी इस तथ्य पर ध्यान नहीं दिया गया और रिवीजन भी खारिज कर दिया गया. इसके बाद उसने हाई कोर्ट में रिट दाखिल की.
याची के अधिवक्ता श्याम शरण श्रीवास्तव ने अदालत के समक्ष दलील दी कि जब सितंबर 2001 में एफआईआर दर्ज हुई थी, तब याची नाबालिग (Teenage) था. ऐसे में किशोर (Teenage) न्याय (बालकों की देखभाल एवं संरक्षण) अधिनियम, 2000 की धारा 19 और 21 के तहत किशोरावस्था (Teenage) में दर्ज आपराधिक केस का असर उसकी सरकारी नौकरी पर नहीं पड़ना चाहिए. इसके समर्थन में शिवम मौर्य बनाम उत्तर प्रदेश राज्य सहित कई पूर्व फैसलों का हवाला दिया गया.
केंद्र सरकार के अधिवक्ता रवि प्रकाश सिंह ने तथ्य छिपाने के आधार पर याचिका खारिज करने की मांग की. उन्होंने सुनवाई के क्षेत्राधिकार पर भी सवाल उठाया. जस्टिस अनीस कुमार गुप्ता की एकलपीठ ने पाया कि याची की नियुक्ति इलाहाबाद में ही हुई थी और उसे ट्रेनिंग के लिए हैदराबाद भेजा गया था. इसके आधार पर कोर्ट ने याचिका का क्षेत्राधिकार के दायरे में बताया. कोर्ट ने कहा कि 28 फरवरी 2005 को आपराधिक केस में मुख्य न्यायिक मजिस्ट्रेट द्वारा बरी/उन्मोचित किया जा चुका था और यह तथ्य पुनरीक्षण प्राधिकारी के समक्ष रखा भी गया था, लेकिन प्राधिकारी ने इस पर विचार नहीं किया.
अदालत ने कहा कि किशोरावस्था (Teenage) में दर्ज आपराधिक मामला चाहे उसमें दोषसिद्धि ही क्यों न हुई हो, किशोर (Teenage) के वयस्क होने के बाद सरकारी नौकरी में बाधा नहीं बन सकता. कोर्ट ने सुप्रीम कोर्ट के अवतार सिंह बनाम भारत संघ (2016) 8 एससीसी 471 के दिशा-निर्देशों का भी हवाला दिया.
जिनमें तथ्य छिपाने के मामलों में नियोक्ता को नियुक्ति रद्द करने से पहले सभी परिस्थितियों पर विचार करने को कहा गया है. इस दौरान शिवम मौर्या केस में इलाहाबाद हाई कोर्ट की डबल बेंच द्वारा सुनाये गये फैसले और उसमें कंसीडर किये गये फैक्टस को कोर्ट ने इस केस में मिलता हुआ पाया. इसके आधार पर कोर्ट ने याचिका में दम पाया.
अदालत ने 23 जून 2004 का नोटिस, 5 अगस्त 2004 का बर्खास्तगी आदेश, अपीलीय आदेश (27 फरवरी 2006) और पुनरीक्षण आदेश (27 अप्रैल 2006) सभी को रद्द कर दिया. याचिका स्वीकार करते हुए कोर्ट ने कहा कि चूंकि याचिकाकर्ता करीब 20 वर्षों से नौकरी से बाहर रहा और मामला अदालत में लंबित रहा, इसलिए उसे केवल 25 प्रतिशत बकाया वेतन देने का आदेश दिया गया है.