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सेक्स ट्वॉय के चलते Sexual Harassment के केस में आईआईटी कानपुर के प्रोफेसर को हाई कोर्ट से राहत बरकरार

सेक्स ट्वॉय के चलते Sexual Harassment के केस में आईआईटी कानपुर के प्रोफेसर को हाई कोर्ट से राहत बरकरार

इलाहाबाद हाईकोर्ट ने “सेक्स ट्वॉय” उपलब्ध कराने के चलते Sexual Harassment के आरोप से घिरे आईआईटी कानपुर के प्रोफेसर वेंकटेश के. सुब्रमण्यन को पहले से दी गयी राहत बरकरार रखी है. एक इंटर्न को “सेक्स ट्वॉय” उपलब्ध कराने के चलते Sexual Harassment आरोप के जांच में राहत की मांग में हाई कोर्ट पहुंचे प्रो. सुब्रमण्यन ने सिंगल बेंच के फैसले को चैलेंज किया गया है. प्रकरण की सुनवाई करते हुए जस्टिस सौमित्र दयाल सिंह और जस्टिस स्वरूपमा चतुर्वेदी ने आईआईटी कानपुर व अन्य द्वारा दायर स्पेशल अपील पर विपक्षियों से जवाब मांगा है.

कोर्ट ने एकलपीठ द्वारा जांच की अनुमति देने के आदेश पर रोक लगा दी है.  स्पेशल अपील में दिये गये तथ्यों के अनुसार दरअसल यह वस्तु “आर्म-बैंड वाइब्रेशन कम्युनिकेशन गैजेट” नामक शोध परियोजना का हिस्सा थी, जो सशस्त्र बलों व साइलेंट ऑपरेशंस के लिए गैर-मौखिक संचार पर आधारित थी. संस्थान की तरफ से कहा गया कि इंटर्न की तरफ से Sexual Harassment की शिकायत मिलने के बाद जांच के लिए कमेटी बनायी गयी थी.

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उस कमेटी ने प्रो. सुब्रमण्यन को सुनवाई का पूरा अवसर दिया गया था. Sexual Harassment  के आरोप में जांच को प्रो. सुब्रमण्यन ने इलाहाबाद हाई कोर्ट की सिंगल बेंच के सामने चैलेंज गया था. सिंगल बेंच ने सुनवाई के बाद Sexual Harassment के आरोपों की जांच की अनुमति प्रदान कर दी थी. सिंगल बेंच के इस फैसले को प्रो. सुब्रमण्यन ने स्पेशल अपील में चैलेंज किया.

पहले हो चुकी सुनवाई के दौरान दो जजों की बेंच एकलपीठ के उस आदेश को पलट चुकी है, जिसमें नियमों को अल्ट्रा वायरस घोषित किया गया था. कोर्ट को जानकारी दी गयी कि यह मामला अभी सुप्रीम कोर्ट में भी लंबित है, जहां कोई अंतरिम राहत नहीं दी गई है.

प्रोफेसर की तरफ से कहा गया कि Sexual Harassment Act, 2013 की धारा 2(एन) के तहत आवश्यक तत्व, शारीरिक संपर्क, यौन अनुग्रह की मांग, यौन टिप्पणी या अश्लील सामग्री  मौजूद नहीं हैं. व्हाट्सएप चैट में भी कोई आपत्तिजनक संकेत नहीं मिला. यह भी तर्क दिया गया कि गैजेट को “सेक्स टॉय” नहीं कहा जाना चाहिए था, हालांकि किसी वस्तु के वैकल्पिक उपयोग की संभावना से Sexual Harassment का निर्णय प्रभावित नहीं होना चाहिए.

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कोर्ट ने कहा कि मामले पर गहन विचार आवश्यक है. दोनों पक्षों को अतिरिक्त हलफनामे दाखिल करने की अनुमति दी गई और मामले को आगे सूचीबद्ध करने का निर्देश दिया गया. अगले आदेश तक, 5 जनवरी 2026 के उस निर्णय पर रोक जारी रहेगी, जिसके तहत आगे की जांच की अनुमति दी गई थी.

युवती को भगा ले जाने और Sexual Harassment के दो आरोपियों को मिली राहत

इलाहाबाद हाईकोर्ट के जस्टिस अब्दुल शाहिद ने बहला फुसलाकर भगा ले जाने और Sexual Harassment के चलते दर्ज पॉक्सो एक्ट के एक मामले में दो अपीलकर्ताओं अफजल और फिरोज उर्फ मोदी को जमानत पर रिहा करने का आदेश दिया है.

अपीलार्थी अधिवक्ता का कहना था कि हापुड़ की अपर जिला एवं सत्र न्यायाधीश/विशेष न्यायाधीश (पॉक्सो एक्ट) की अदालत ने 5 जुलाई 2022 को फैसला सुनाया था, जिसके खिलाफ दोनों ने हाईकोर्ट में अपील दाखिल की है. अफजल पर आईपीसी की धारा 363, 376डी (Sexual Harassment), 328 और पॉक्सो एक्ट की धारा 5/6 के तहत आरोप है, जबकि फिरोज पर पॉक्सो एक्ट की धारा 6 के तहत आरोप है.

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अपीलकर्ताओं के अधिवक्ता ने अदालत में तर्क दिया कि घटना की तारीख 1 अप्रैल 2018 बताई गई, जबकि प्राथमिकी 23 अप्रैल 2018 को यानी 22 दिन की देरी से दर्ज कराई गई. सह-आरोपी भूरी को इसी मामले से जुड़ी एक अन्य अपील में हाईकोर्ट की एक अन्य पीठ पहले ही जमानत दे चुकी है. अदालत को यह भी बताया गया कि दोनों अपीलकर्ताओं को कुल 20 वर्ष की सजा सुनाई गई थी, जिसमें से फिरोज नौ वर्ष एक माह सात दिन तथा अफजल पांच वर्ष जेल में बिता चुके हैं.

अदालत ने पीड़िता के पिता तथा स्वयं पीड़िता के धारा 161 व 164 सीआरपीसी के बयानों और अदालत में दी गई गवाही के बीच कई असंगतियों का उल्लेख किया. पिता ने बताया कि उन्होंने अफजल का नाम फिरोज के कहने पर शामिल किया था और मामले में समझौते की बातचीत भी हुई थी. पीड़िता के अलग-अलग बयानों में घटनाक्रम को लेकर भिन्नता पाई गई. चिकित्सीय परीक्षण में यौन उत्पीड़न के निशान नहीं मिले, तथा ऑसिफिकेशन टेस्ट के अनुसार उसकी अनुमानित आयु 17 वर्ष आंकी गई, जिसमें त्रुटि की संभावना बनी रहती है.

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अदालत ने कहा कि इस स्तर पर साक्ष्यों का अंतिम मूल्यांकन उचित नहीं होगा, लेकिन मामले के तथ्यों, परिस्थितियों और अपीलकर्ताओं द्वारा भुगती गई कारावास अवधि को देखते हुए वे जमानत के हकदार हैं. अदालत ने दोनों अपीलकर्ताओं को संबंधित अदालत की संतुष्टि के अधीन जमानत बॉन्ड व दो-दो जमानतदारों की शर्त पर रिहा करने का आदेश दिया. साथ ही निर्देश दिया गया कि रिहाई की तारीख से 30 दिन के भीतर अपीलकर्ता जुर्माने की पूरी राशि जमा करें. मामले की अगली सुनवाई फरवरी 2027 के दूसरे सप्ताह में निर्धारित की गई है.

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