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Married हो जाने मात्र से कोई पुत्री अपने माता-पिता के प्रति कर्तव्यों और आश्रित होने के संवैधानिक अधिकारों से वंचित नहीं हो सकती

इलाहाबाद हाई कोर्ट ने Married Daughter के अनुकंपा अधिकार पर लगायी मुहर

Married हो जाने मात्र से कोई पुत्री अपने माता-पिता के प्रति कर्तव्यों और आश्रित होने के संवैधानिक अधिकारों से वंचित नहीं हो सकती

इलाहाबाद हाई कोर्ट ने एक महत्वपूर्ण फैसले में कहा है कि केवल Married हो जाने मात्र से कोई पुत्री अपने माता-पिता के प्रति कर्तव्यों और आश्रित होने के संवैधानिक अधिकारों से वंचित नहीं हो सकती. इस कमेंट के साथ जस्टिस मंजू रानी चौहान की बेंच ने प्रशासनिक अधिकारियों के उस आदेश को पूरी तरह खारिज कर दिया, जिसमें मृत कर्मचारी की Married Daughter के कारण नौकरी देने से इनकार कर दिया गया था.

यह पूरा मामला उत्तर प्रदेश के एक प्राथमिक विद्यालय में सहायक अध्यापक के रूप में सेवारत रहे स्वर्गीय धर्मवीर सिंह के परिवार से जुड़ा है. 14 मई 2015 को अचानक उनका निधन हो गया था, जिससे उनके परिवार पर दुखों का पहाड़ टूट पड़ा. परिवार के भरण-पोषण और भविष्य की अनिश्चितता को देखते हुए, उनकी बेटी मनीषा त्यागी ने सभी आवश्यक औपचारिकताओं को पूरा करते हुए 17 मई 2016 को जिला बेसिक शिक्षा अधिकारी के समक्ष ‘मृतक आश्रित कोटे’ के अंतर्गत अनुकंपा नियुक्ति के लिए विधिवत आवेदन किया.

Married Daughter मनीषा ने पूरी उम्मीद के साथ अपने पिता की जगह जिम्मेदारी संभालने का यह कदम उठाया था, लेकिन सिस्टम की कागजी दीवारों ने उसके रास्ते में रुकावटें खड़ी कर दीं. 5 सितंबर 2016 को जिला बेसिक शिक्षा अधिकारी ने मनीषा के आवेदन को यह कहकर खारिज कर दिया कि वह एक Married Daughter हैं. इसके साथ ही, अधिकारी ने उस समय यह तर्क भी दिया कि उनके पास प्राथमिक स्तर के शिक्षण के लिए आवश्यक अहर्ताएं उस रूप में पूरी नहीं हैं.

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इस एक झटके ने मनीषा को हिलाकर रख दिया, लेकिन उसने अन्याय के आगे घुटने टेकने से इंकार कर दिया. उसने वर्ष 2019 में इलाहाबाद उच्च न्यायालय में एक रिट याचिका दायर कर इस आदेश को चुनौती दी. कानूनी लड़ाई के दौरान, मनीषा की ओर से यह तर्क दिया गया कि उत्तर प्रदेश सरकार के ‘मृतक आश्रित नियमावली, 1974’ के नियम 2(c)(iii) के तहत Married Daughter को बाहर रखना असंवैधानिक है.

मृत कर्मचारियों की बेटियों को केवल उनकी शादी (Married) के आधार पर ‘परिवार’ की परिभाषा से बाहर करना संविधान के अनुच्छेद 14 और 15 का उल्लंघन

इस संदर्भ में अदालत ने प्रसिद्ध ‘विमला श्रीवास्तव बनाम उत्तर प्रदेश राज्य’ मामले का विशेष रूप से संज्ञान लिया, जिसमें उच्च न्यायालय की खंडपीठ ने स्पष्ट किया था कि मृत कर्मचारियों की बेटियों को केवल उनकी शादी (Married) के आधार पर ‘परिवार’ की परिभाषा से बाहर करना संविधान के अनुच्छेद 14 और 15 का सीधा उल्लंघन है.

इस अदालती फैसले के बाद, उत्तर प्रदेश सरकार ने स्वयं नवंबर 2021 में नियमों में संशोधन करते हुए ‘अविवाहित’ (Married) शब्द को हटा दिया था. इसके बावजूद, स्थानीय प्रशासन ने तकनीकी और तथाकथित समय-सीमा (विलंब) का हवाला देकर 14 नवंबर 2024 को एक बार फिर मनीषा के दावे को खारिज कर दिया.

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मामला जब दोबारा इलाहाबाद उच्च न्यायालय की जस्टिस मंजू रानी चौहान के समक्ष पहुँचा, तो अदालत ने प्रशासन की दलीलों को आड़े हाथों लिया. अदालत ने अपने ताजा फैसले में कहा कि प्रशासनिक विभागों की खुद की देरी और सुस्ती का खामियाजा प्रार्थी को नहीं भुगतना चाहिए. मनीषा ने 17 मई 2016 को ही अपना आवेदन समय पर दाखिल कर दिया था, इसलिए इसे विलंबित नहीं माना जा सकता.

जस्टिस ने 14 नवंबर 2024 के नियुक्ति देने से इंकार करने वाले आदेश को पूरी तरह से रद्द कर दिया. साथ ही, जिला बेसिक शिक्षा अधिकारी को यह सख्त निर्देश दिया कि वह मनीषा त्यागी के आवेदन पर उसके मूल आवेदन की तिथि और ‘विमला श्रीवास्तव’ मामले में तय किए गए कानूनी सिद्धांतों के तहत नए सिरे से विचार करे. अदालत ने स्पष्ट किया कि प्राधिकारी उसके आवेदन की योग्यता, पारिवारिक वित्तीय स्थिति और अन्य प्रासंगिक नियमों के आधार पर आठ सप्ताह के भीतर गुण-दोष के आधार पर निर्णय लें.

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यह फैसला सिर्फ मनीषा त्यागी की व्यक्तिगत कानूनी जीत नहीं है, बल्कि यह उन तमाम बेटियों के लिए एक मजबूत संबल है जो पितृसत्तात्मक सोच और दफ्तरों की लालफीताशाही के बीच अपने अधिकारों की लड़ाई लड़ रही हैं. यह निर्णय समाज को यह याद दिलाता है कि माता-पिता के प्रति प्रेम, कर्तव्य और दायित्व विवाह की सीमाओं में बंधे नहीं होते. इलाहाबाद उच्च न्यायालय का यह फैसला भारतीय न्यायपालिका के इतिहास में लैंगिक समानता की दिशा में एक और स्वर्ण अक्षरों में लिखा जाने वाला कदम साबित हुआ है.

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