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Criminal Proceeding को केवल इस आधार पर खारिज नहीं किया जा सकता कि पक्षों के बीच दीवानी उपाय या मध्यस्थता का प्रावधान मौजूद

आर्थिक अपराधों पर इलाहाबाद हाईकोर्ट का सख्त रुख: विजय जिंदल और अन्य की अग्रिम जमानत याचिका खारिज

Criminal Proceeding को केवल इस आधार पर खारिज नहीं किया जा सकता कि पक्षों के बीच दीवानी उपाय या मध्यस्थता का प्रावधान मौजूद
Vivek k. singh J.

इलाहाबाद हाईकोर्ट ने एक महत्वपूर्ण फैसले में कहा है कि केवल इस आधार पर Criminal Proceeding को खारिज नहीं किया जा सकता कि पक्षों के बीच दीवानी उपाय या मध्यस्थता का प्रावधान मौजूद है. इस कमेंट के साथ इलाहाबाद हाई कोर्ट के जस्टिस विवेक कुमार सिंह की बेंच ने विजय जिंदल और 3 अन्य की अग्रिम जमानत याचिका को खारिज कर दिया है.

यह Criminal मामला गाजियाबाद के वेव सिटी पुलिस स्टेशन में दर्ज केस क्राइम नंबर 346/2025 से जुड़ा है, जिसमें भारतीय न्याय संहिता की विभिन्न गंभीर धाराओं के तहत आपराधिक धोखाधड़ी और आर्थिक अपराध के आरोप लगाए गए हैं. यह पूरा विवाद ‘फ्रेंड्स लैंड डेवलपर्स’ नाम की एक साझेदारी फर्म से जुड़ा है, जिसकी शुरुआत 17 अप्रैल 2002 को राकेश गर्ग और अतुल गर्ग द्वारा की गई थी.

इस फर्म ने टाटा ऑयल मिल लिमिटेड से लगभग 22.438 एकड़ जमीन खरीदी थी. इसके बाद 5 नवंबर 2005 को विजय कुमार जिंदल और एसवीपी बिल्डर्स (इंडिया) लिमिटेड को इस फर्म में नए साझेदार के रूप में शामिल किया गया, ताकि इस भूमि पर एक ग्रीन हाउसिंग प्रोजेक्ट विकसित किया जा सके.

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गाजियाबाद विकास प्राधिकरण ने 2 जून 2006 को इस प्रोजेक्ट का नक्शा पास करने के एवज में बाहरी विकास शुल्क के रूप में 16,80,88,109 रुपये जमा करने की शर्त रखी. इस अवैध मांग के खिलाफ राकेश गर्ग ने हाईकोर्ट में रिट याचिका दाखिल की थी, जिसके बाद हाईकोर्ट के आदेश पर राकेश और अतुल गर्ग ने व्यक्तिगत खातों से यह राशि ‘अंडर प्रोटेस्ट’ जमा कर नक्शा प्राप्त किया था. 1 जुलाई 2010 को हाईकोर्ट ने यह याचिका राकेश गर्ग के पक्ष में मंजूर कर ली और जीडीए को यह पैसा वापस करने का निर्देश दिया था.

मामले के अनुसार, 26 जुलाई 2006 को राकेश गर्ग और अतुल गर्ग फर्म से सेवानिवृत्त हो गए थे. समझौते के तहत, जब भी जीडीए से यह पैसा वापस मिलता, तो इसे सेवानिवृत्त साझेदारों को लौटाया जाना था. आरोप है कि वर्तमान साझेदार विजय कुमार जिंदल और अन्य ने इस राशि को वापस करने के बजाय, जीडीए में एक आवेदन देकर इस धन को अपने अनाधिकृत निर्माणों को नियमित कराने के लिए ‘कंपाउंडिंग फीस’ में समायोजित करवा लिया.

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जब 2018 में इस बात का खुलासा हुआ, तो पीड़ितों ने राज्य सरकार के समक्ष पुनरीक्षण याचिका दाखिल की, जहां से धोखाधड़ी का यह पूरा मामला सामने आया. इसके बाद 7 सितंबर 2025 को शिकायतकर्ता को धमकी दी गई, जिसके आधार पर 19 नवंबर 2025 को वेव सिटी थाने में Criminal एफआईआर दर्ज कराई गई.

पीड़ितों के निजी पैसों का इस्तेमाल अपने अवैध निर्माणों के जुर्माने को भरने के लिए किया, जो सीधे तौर पर Criminal विश्वासघात और धोखाधड़ी के दायरे में

सुनवाई के दौरान, आवेदकों (विजय जिंदल आदि) के वकीलों ने तर्क दिया कि यह विशुद्ध रूप से दीवानी प्रकृति का विवाद है और इसके समाधान के लिए मध्यस्थता की कार्यवाही पहले ही शुरू की जा चुकी है, इसलिए इसमें Criminal मामला नहीं बनता. अपर महाधिवक्ता और शिकायतकर्ता के वरिष्ठ वकीलों ने कड़ा विरोध करते हुए कहा कि अभियुक्तों ने पीड़ितों के निजी पैसों का इस्तेमाल अपने अवैध निर्माणों के जुर्माने को भरने के लिए किया, जो सीधे तौर पर Criminal विश्वासघात और धोखाधड़ी के दायरे में आता है.

जस्टिस विवेक कुमार सिंह ने सुप्रीम कोर्ट के कई ऐतिहासिक फैसलों (प्रीति सराफ बनाम दिल्ली राज्य और सीरियस फ्रॉड इन्वेस्टिगेशन ऑफिस बनाम आदित्य सारदा) का हवाला देते हुए स्पष्ट किया कि केवल इस आधार पर Criminal Proceeding को खारिज नहीं किया जा सकता कि पक्षों के बीच दीवानी उपाय या मध्यस्थता का प्रावधान मौजूद है.

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कोर्ट ने कहा कि आर्थिक अपराध समाज के आर्थिक ताने-बाने को गहराई से प्रभावित करते हैं और ऐसे मामलों में अग्रिम जमानत एक अपवाद होना चाहिए, नियम नहीं. अभियुक्तों का आचरण और 8 जनवरी 2026 को उनके द्वारा निष्पादित पूरक समझौते से यह साबित होता है कि उन्होंने पूर्व में अदालत को गुमराह किया था और धन के दुरुपयोग का प्रथम दृष्टया मामला बनता है.

अदालत ने यह माना कि प्रारंभिक जांच और उपलब्ध दस्तावेजों से अभियुक्तों के खिलाफ गंभीर आरोप सिद्ध होते हैं और Criminal मामले की सच्चाई सामने लाने तथा फंड ट्रेल का पता लगाने के लिए अभियुक्तों से कस्टोडियल इंटरोगेशन (हिरासत में पूछताछ) जरूरी है. हाई कोर्ट ने विजय जिंदल और अन्य की अग्रिम जमानत याचिका को पूरी तरह खारिज कर दिया. साथ ही, संबंधित ट्रायल कोर्ट को निर्देश दिया गया कि वह इस आदेश की प्रति प्राप्त होते ही जांच अधिकारी को नियमानुसार आगे की कानूनी कार्रवाई करने का निर्देश दे.

CRIMINAL MISC. ANTICIPATORY BAIL APPLICATION No. 10794 of 2025 Vijay Jindal And 3 Others V/s State of U.P.

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