‘अपराध के किसी भी कृत्य के लिए कंपनी या फर्म के बोर्ड ऑफ Director ही जिम्मेदार’
फर्म द्वारा वायु और जल प्रदूषण के मामले में डायरेक्टर्स की तरफ से दाखिल याचिका हाई कोर्ट ने की खारिज, केस कार्यवाही रद करने से इंकार

जस्टिस बृजराज सिंह की बेंच दो मामलों पर एक साथ सुनवाई कर रही थी. यह मामले राजीव मुद्रा और बिट्ठल दास मुद्रा की ओर से दाखिल किये गये थे. दोनों आवेदन, शिकायत मामला संख्या 101/2021 (उत्तर प्रदेश प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड बनाम मेसर्स सिम्प्लेक्स इंफ्रास्ट्रक्चर्स लिमिटेड) की संपूर्ण कार्यवाही को रद्द करने की मांग करते हुए दायर किए गए थे. यह मामला वायु प्रदूषण निवारण और नियंत्रण अधिनियम, 1981 की धारा 37 के तहत दर्ज है.
याचिका में विशेष न्यायिक मजिस्ट्रेट (प्रदूषण/CBI), लखनऊ द्वारा 14.03.2022 को पारित समन आदेश को भी रद्द करने की मांग की गई थी. दोनों मेसर्स सिम्प्लेक्स इंफ्रास्ट्रक्चर्स लिमिटेड के Directors थे. दोनों याचिकाएं सिमिलर होने के चलते कोर्ट ने इस पर एक साथ सुनवाई की और अपना फैसला सुनाया. याचिका दाखिल करने वाले आवेदकों (Director) का कहना था कि वह पूरी तरह से निर्दोष हैं और उन्हें इस मामले में झूठा फंसाया गया है.
केस के तथ्यों के अनुसार यूपी राज्य विद्युत उत्पादन निगम लिमिटेड ने पनकी थर्मल पावर स्टेशन प्लांट का विस्तार करने के उद्देश्य से 1 x 660 मेगावाट क्षमता का एक थर्मल पावर प्लांट स्थापित करना शुरू किया. पावर प्लांट के निर्माण का ठेका भारत हेवी इलेक्ट्रिकल्स लिमिटेड को दिया गया. परियोजना के लिए भारत सरकार के पर्यावरण वन और जलवायु परिवर्तन मंत्रालय ने मंजूरी प्रदान करते हुए’अनापत्ति प्रमाण पत्र’ जारी कर दिया. इसके बाद यूपी प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड ने भी उक्त परियोजना को मंजूरी प्रदान कर दी तो थर्मल पावर प्लांट के विस्तार का निर्माण कार्य शुरू कर दिया गया.
भारत हेवी इलेक्ट्रिकल्स लिमिटेड ने प्रोजेक्ट के सिविल काम करने हेतु अपना कॉन्ट्रैक्ट कुछ कंपनियों को सब-लेट कर दिया. इन कंपनियों में से एक मेसर्स सिम्प्लेक्स इंफास्ट्रक्चर लि. भी थी. कहा गया है कि चूंकि पूरे प्रोजेक्ट को केंद्र सरकार और राज्य बोर्ड से पर्यावरण मंज़ूरी मिल चुकी थी, इसलिए भारत हेवी इलेक्ट्रिकल्स लिमिटेड के तहत काम करने वाली छोटी कंपनियों को अधिनियम की धारा 21 के तहत राज्य बोर्ड से आगे कोई मंजूरी लेने की आवश्यकता नहीं थी.
कोई जाँच-पड़ताल नहीं की, जिससे यह पता चलता कि आवेदक कंपनी के Directors नहीं थे
शिकायतकर्ता ने ऐसी कोई जाँच-पड़ताल नहीं की, जिससे यह पता चलता कि आवेदक कंपनी के Directors नहीं रहे थे. विपक्षी ने इस बात की पुष्टि नहीं की कि क्या आवेदक कंपनी के कामकाज के संचालन के लिए प्रभारी थे और कंपनी के प्रति जिम्मेदार थे. मजिस्ट्रेट ने इन तथ्यों पर विचार किए बिना ही आवेदकों को समन जारी कर दिया.
आवेदकों के वकील ने दलील दी कि आवेदन काम आवंटन के समय कंपनी के Directors नहीं थे. वास्तव में पनकी में उक्त प्रोजेक्ट शुरू होने से काफी पहले ही वे Directors पद से हट चुके थे. यह भी कहा कि शिकायत में ऐसा कोई आरोप नहीं है कि आवेदकों का उस समय कंपनी पर रोजमर्रा का नियंत्रण था या उन्होंने अपनी ड्यूटी आधिकारिक क्षमता में निभाई थी. ऐसी स्थिति में आवेदकों (Director) के खिलाफ पूरी शिकायत ही दोषपूर्ण हो जाती है.

इसके जवाब में, यूपी प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड की ओर से पेश वकील ने तर्क दिया कि शिकायत में आवेदकों (Director) को कंपनी के निदेशकों के रूप में नामित किया गया है. चूंकि उक्त कंपनी द्वारा अपराध किया जा रहा है और ‘जल (प्रदूषण निवारण और नियंत्रण) अधिनियम’ तथा ‘वायु (प्रदूषण निवारण और नियंत्रण) अधिनियम’ के तहत निर्धारित कोई सहमति प्राप्त नहीं की.
जिसके परिणामस्वरूप पर्यावरणीय मानदंडों का पालन नहीं किया जा रहा था. ऐसे में आवेदक इस अपराध के लिए परोक्ष रूप से जिम्मेदार हैं और उन पर मुकदमा चलाया जाना चाहिए. जल अधिनियम की धारा 25 के प्रावधानों को देखते हुए फर्म मेसर्स सिम्प्लेक्स इंफास्ट्रक्चर लि. “व्यक्ति” शब्द के दायरे में आता है. इस बात से कोई खास फर्क नहीं पड़ता कि वह किसी समझौते के तहत काम कर रहा है. वास्तव में वह वायु अधिनियम की धारा 2(k) के तहत परिभाषित “औद्योगिक संयंत्र” का संचालन कर रहा है.
तर्क दिया कि शिकायत दर्ज करने से पहले भारत सरकार के कॉरपोरेट मामलों के मंत्रालय की वेबसाइट पर ऑनलाइन पूछताछ करके आवेदकों के उद्योग के संबंध में पूरी तरह से जानकारी हासिल कर ली थी. आवेदक (Director) ही कंपनी के प्रभारी हैं और “सहमति” प्राप्त करना संबंधित उद्योग की नीति का ही एक हिस्सा है.
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यह अपराध वर्ष 2020 से संबंधित है और शिकायत दर्ज करते समय—कॉरपोरेट मामलों के मंत्रालय की वेबसाइट के माध्यम से प्रासंगिक दस्तावेज प्राप्त किए गए थे, जिनसे यह पता चलता है कि उस समय आवेदक ही कंपनी के निदेशक (Director) थे. निरीक्षण रिपोर्ट भी उसी वर्ष से संबंधित है और यदि वेबसाइट यह दर्शाती है कि आवेदक ही निदेशक थे तो बोर्ड ने उन्हें पक्षकार बनाकर बिल्कुल सही किया है.
बेंच ने कहा कि जहाँ तक विद्वान ट्रायल कोर्ट द्वारा पारित संज्ञान और समन आदेश का संबंध है, संज्ञान लेने के चरण पर, ट्रायल कोर्ट केवल इस बारे में एक राय बना सकता है कि क्या मामला संज्ञान लेने और उसे ट्रायल के लिए भेजने के योग्य है या नहीं.
वर्तमान मामले में विद्वान ट्रायल कोर्ट ने स्पष्ट रूप से अपनी राय व्यक्त की कि उसने सभी रिकॉर्ड की जाँच की है और स्पष्ट रूप से संकेत दिया है कि उसके समक्ष रखी गई सामग्री मामले को आगे बढ़ाने के लिए पर्याप्त है. विद्वान ट्रायल कोर्ट ने हर पहलू पर विचार किया है. इसलिए, संज्ञान और समन आदेश पूरी तरह से कानूनी है और इसे रद्द करने का कोई अवसर नहीं है.
APPLICATION U/S 482 No. – 22 of 2023; Rajiv Mundhra Versus State Of U.P. Thru. Prin. Secy. Govt. Deptt. Home, Lko. And Another
Application U/s 482 No. 9058 of 2022: Bithal Das Mundhra and another Versus State of UP Thru. Prin. to the Deptt. of Home Civil Lko and another