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इलाहाबाद हाई कोर्ट ने कहा, सरकारी कार्यालय को अधिकारियों द्वारा Bribe लेकर आदेश बेचने की खुली दुकान नहीं बनने दे सकते 

इलाहाबाद हाई कोर्ट ने कहा, सरकारी कार्यालय को अधिकारियों द्वारा Bribe लेकर आदेश बेचने की खुली दुकान नहीं बनने दे सकते 

अधिकारी पर गैर कानूनी तरीके से रिश्वत (Bribe) लेने जैसा गंभीर आरोप लगाया गया हो और इसके समर्थन में साक्ष्य भी मौजूद हों. किसी कर्मचारी के आत्महत्या करने के तार भी गैर कानूनी तरीके से रिश्वत (Bribe) लिये जाने से जुड़े होने का संदेह है तो इस आरोप की गंभीरता को नकारा नहीं जा सकता. सरकारी कार्यालय को अधिकारियों द्वारा रिश्वत (Bribe) लेकर आदेश बेचने की खुली दूकान नहीं बनने दिया जा सकता.

सुप्रीम कोर्ट द्वारा की गयी ऐसी टिप्पणी को कोट कराते हुए इलाहाबाद हाई कोर्ट के जस्टिस विक्रम डी चौहान से देवरिया की जिला बेसिक शिक्षा अधिकारी सहलिनी श्रीवास्तव को अग्रिम जमानत देने से इंकार कर दिया है. गोरखपुर जिले के गुलरिहा थाने में 22 फरवरी 2026 को मृतक कृष्ण मोहन सिंह की पत्नी गुड़िया सिंह ने प्रथम सूचना रिपोर्ट दर्ज करायी. उनके पति कृष्ण मोहन सिंह, देवरिया के कृषक लघु माध्यमिक विद्यालय मंदरसन गौरी बाजार में 2016 से सहायक अध्यापक के पद पर तैनात थे.

Bribe की इस रकम का भुगतान करने के लिए तीनों शिक्षकों को परिवार के सदस्यों के गहने गिरवी रखने पड़े

आरोप है कि बीएसए और उनके कार्यालय के लिपिक संजीव सिंह ने हाई कोर्ट के आदेश का पालन कराने के बदले तीन शिक्षकों कृष्ण मोहन सिंह, ओमकार सिंह और अपर्णा तिवारी से रूपये 16-16 लाख यानी कुल रूपये 48 लाख की रिश्वत (Bribe) मांगी. रिश्वत (Bribe) की इस रकम का भुगतान करने के लिए तीनों शिक्षकों को परिवार के सदस्यों के गहने गिरवी रखने पड़े, जमीन गिरवी रखकर कर्ज लेना पड़ा. इसके बाद वह मांगी गई रिश्वत (Bribe) की रकम का भुगतान कर पाये.

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20 फरवरी 2026 को कृष्ण मोहन सिंह को भी बीएसए कार्यालय बुलाकर अपमानित और प्रताड़ित किया गया तथा और Bribe की मांग की गई. इस प्रकरण से वह व्यथित हो गये. 20-21 फरवरी के बीच उन्होंने पंखे से फांसी लगाकर आत्महत्या कर ली. मृतक की जेब से 4 पन्नों का सुसाइड नोट बरामद हुआ, जिसमें उन्होंने बीएसए और क्लर्क संजीव सिंह को अपनी मौत का जिम्मेदार ठहराया और सीबीआई जांच की मांग की.

इसके अलावा पुलिस को मृतक के वीडियो और ऑडियो क्लिप भी मिले, जिनमें उन्होंने रिश्वत (Bribe) लिए जाने की बात खुद कही है. सीसीटीवी फुटेज में भी कृष्ण मोहन सिंह का 20 फरवरी को भी बीएसए दफ्तर जाना दर्ज है. कोर्ट ने कहा कि आरोप बेहद गंभीर हैं और साक्ष्य सुसाइड नोट, गवाह ओमकार सिंह का बयान, वीडियो-ऑडियो क्लिप सभी अभियोजन पक्ष की कहानी  (Bribe मांगने) की पुष्टि करते हैं. कोर्ट ने स्पष्ट किया कि सरकारी दफ्तर को आदेश बेचने की दुकान नहीं बनने दिया जा सकता.

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कोर्ट ने कहा कि भ्रष्टाचार जैसे गंभीर मामलों में अग्रिम जमानत केवल असाधारण परिस्थितियों में दी जा सकती है. बीएसए सहलिनी श्रीवास्तव पहले से निलंबित हैं. उन पर बीएनएस की धारा 108, 351(3), 61(2) और भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम की धारा 7/12 के तहत मामला दर्ज है.

आदेश से छवि प्रभावित होती है तो सुनवाई जरूरी, एक माह में निर्णय लेने का निर्देश

इलाहाबाद हाई कोर्ट ने उत्तर मध्य रेलवे द्वारा एटीवीएम फैसिलिटेटर रोहित सोनी का चयन निरस्त किए जाने के मामले में अहम टिप्पणी करते हुए कहा है कि यदि किसी आदेश से संबंधित व्यक्ति की छवि पर धब्बा लगता है तो उसके खिलाफ आदेश पारित करने से पहले सुनवाई का अवसर देना आवश्यक है. यह आदेश जस्टिस सरल श्रीवास्तव और जस्टिस गरिमा प्रसाद की खंडपीठ ने  रोहित सोनी  की याचिका को निस्तारित करते हुए दिया है.

याची की ओर से अधिवक्ता नीतीश कुमार सोनी ने अदालत को बताया कि 27 अप्रैल 2026 को सहायक वाणिज्य प्रबंधक/कोचिंग, नॉर्थ सेंट्रल रेलवे ने रोहित सोनी का एटीवीएम फैसिलिटेटर के रूप में अनुबंध बिना कारण बताओ नोटिस और बिना सुनवाई के तत्काल प्रभाव से निरस्त कर दिया. साथ ही 50 हजार रुपये की सुरक्षा धनराशि भी जब्त कर ली गई.

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याचिका में आरोप लगाया गया कि रेलवे प्रशासन ने एकतरफा और दुर्भावनापूर्ण कार्रवाई करते हुए प्राकृतिक न्याय के सिद्धांतों का उल्लंघन किया है. वहीं रेलवे प्रशासन की ओर से अदालत में कहा गया कि मामले में सक्षम अधिकारी को याची की शिकायत पर विचार करने का निर्देश दिया जा सकता है. रिकॉर्ड का अवलोकन करने के बाद हाईकोर्ट ने माना कि विवादित आदेश याची के खिलाफ “कलंक” उत्पन्न करता है, इसलिए आदेश पारित करने से पहले सुनवाई का अवसर दिया जाना चाहिए था.

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अदालत ने मामले के गुण-दोष पर कोई टिप्पणी किए बिना याचिका का निस्तारण करते हुए याची को एक माह के भीतर सहायक वाणिज्य प्रबंधक, उत्तर मध्य रेलवे, प्रयागराज के समक्ष नया प्रत्यावेदन देने की अनुमति दी. साथ ही निर्देश दिया कि सक्षम अधिकारी याची को व्यक्तिगत सुनवाई का अवसर देकर एक माह के भीतर कानून के अनुसार निर्णय लें.

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