Family Court के आदेश की समीक्षा नहीं कर सकता ग्राम न्यायालय
इलाहाबाद हाई कोर्ट ने कहा, उच्चतर न्यायिक सेवा संवर्ग के अधिकारी द्वारा पारित आदेश की समीक्षा सिविल जज स्तर के अधिकारी से कराना न्यायिक मर्यादा के प्रतिकूल

इलाहाबाद हाईकोर्ट ने कहा है कि यदि किसी मामले में Family Court (पारिवारिक न्यायालय) द्वारा पक्षकारों के अधिकारों का निर्धारण करते हुए कोई आदेश पारित कर दिया गया है, तो उस मामले को बाद में सुनवाई या समीक्षा के लिए ग्राम न्यायालय को स्थानांतरित नहीं किया जा सकता. न्यायालय ने कहा कि उच्चतर न्यायिक सेवा संवर्ग के अधिकारी द्वारा पारित आदेश की समीक्षा सिविल जज (जूनियर डिवीजन) स्तर के अधिकारी द्वारा संचालित ग्राम न्यायालय नहीं कर सकता, क्योंकि यह न्यायिक मर्यादा और पदानुक्रम के प्रतिकूल है.
यह निर्णय जस्टिस हरवीर सिंह की एकल पीठ ने अमित कुमार राणा द्वारा दायर एक याचिका पर सुनवाई करते हुए दिया है. मामले के अनुसार, याचिकाकर्ता की पत्नी विपक्षी को वर्ष 2019 में प्रधान न्यायाधीश, Family Court, बिजनौर द्वारा 3,000 रुपये मासिक भरण-पोषण देने का आदेश दिया गया था.
बाद में, पत्नी के पुनर्विवाह के आधार पर याचिकाकर्ता ने धारा 127 दंड प्रक्रिया संहिता के तहत भरण-पोषण आदेश को वापस लेने के लिए एक आवेदन दायर किया. इसी बीच, प्रशासनिक आदेशों के तहत यह मामला जिला न्यायालय से ग्राम न्यायालय, धामपुर स्थानांतरित कर दिया गया. ग्राम न्यायालय ने 25 मार्च 2025 और 1 अक्टूबर 2024 को आदेश पारित करते हुए याचिकाकर्ता के खिलाफ रिकवरी वारंट जारी कर दिया, जिसे हाईकोर्ट में चुनौती दी गई थी.
ग्राम न्यायालय और Family Court के बीच दंड प्रक्रिया संहिता के अध्याय IX (भरण-पोषण) को लेकर समवर्ती क्षेत्राधिकार होने से विसंगति पैदा हो रही है
सुनवाई के दौरान याचिकाकर्ता के वकील ने तर्क दिया कि ग्राम न्यायालय और Family Court के बीच दंड प्रक्रिया संहिता के अध्याय IX (भरण-पोषण) को लेकर समवर्ती क्षेत्राधिकार होने से विसंगति पैदा हो रही है. उन्होंने तर्क दिया कि Family Court एक्ट, 1984 की धारा 8(बी) स्पष्ट रूप से मजिस्ट्रेट के क्षेत्राधिकार को वर्जित करती है जहाँ Family Court स्थापित है. दूसरी ओर, ग्राम न्यायालय अधिनियम, 2008 की पहली अनुसूची के भाग II के तहत ग्राम न्यायालयों को भी भरण-पोषण के मामलों में राहत देने का अधिकार दिया गया है.
अदालत ने अपने विस्तृत फैसले में माना कि ग्राम न्यायालय अधिनियम, 2008 और Family Court एक्ट, 1984 के बीच क्षेत्राधिकार का ओवरलैपिंग (अतिव्याप्ति) होना न केवल विसंगतिपूर्ण है, बल्कि इससे न्यायिक अनुचितता भी पैदा होती है. कोर्ट ने स्पष्ट किया कि भरण-पोषण का विषय विशेष रूप से परिवार न्यायालयों की योजना से संबंधित है और इसे ग्राम न्यायालयों के दायरे में लाना एक प्रकार से अनावश्यक है.
हाईकोर्ट ने ग्राम न्यायालय द्वारा पारित दोनों विवादित आदेशों को रद्द कर दिया और यह व्यवस्था दी कि परिवार न्यायालयों में लंबित ऐसे मामले, जिनमें पक्षकारों के अधिकारों का निर्णय पहले ही हो चुका है , उन्हें ग्राम न्यायालय को नहीं भेजा जाना चाहिए. विशेष रूप से, दंड प्रक्रिया संहिता की धाराओं 126(2), 127 और 128 (जो अब भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता की धारा 145(2), 146 और 147 हैं) के तहत लंबित मामलों को ग्राम न्यायालय में स्थानांतरित करने पर पूरी तरह रोक लगा दी गई है.
हालांकि, अदालत ने यह भी साफ किया कि ग्राम न्यायालयों में सीधे नए मामले दायर करने पर कोई कानूनी रोक नहीं है. याचिकाकर्ता को छूट दी गई है कि वह पुनर्विवाह के आधार पर भरण-पोषण रोकने का अपना मामला पुनः सक्षम परिवार न्यायालय के समक्ष उठा सकता है.