चोट लगी या नहीं यह Facts तब प्रासंगिक नहीं होता जब किसी आरोपी को IPC की धारा 149 की मदद से दोषी ठहराने की कोशिश की जा रही हो
इलाहाबाद हाई कोर्ट ने रद किया स्पेशल जज ओरई का सजा का आदेश, आरोपित बरी

किसी को चोट लगी है या नहीं यह Facts तब प्रासंगिक नहीं होता जब किसी आरोपी को आईपीसी की धारा 149 की मदद से दोषी ठहराने की कोशिश की जा रही हो. अदालत के लिए जांच का मुख्य बिंदु यह होता है कि क्या आरोपी किसी गैर-कानूनी जमावड़े का सदस्य था न कि यह कि उसने वास्तव में अपराध में सक्रिय रूप से हिस्सा लिया था या नहीं. धारा 201 आईपीसी के तहत आरोप के लिए यह साबित करना जरूरी है कि आरोपी ने अपराध के सबूतों को मिटाया है. अगर आरोपी को सीधे तौर पर हत्या से जोड़ने वाला कोई भरोसेमंद सबूत न हो, तो धारा 201 के तहत दोषसिद्धि अपने आप में कायम नहीं रह सकती.
यह निष्कर्ष स्पष्ट करने के साथ इलाहाबाद हाई कोर्ट के जस्टिस देवेन्द्र सिंह और चन्द्रधारी सिंह की बेंच ने स्पेशल जज (E.C. Act)/अपर सत्र न्यायाधीश, जालौन (ओरई) द्वारा सत्र विचारण संख्या 29/1989 में 17.10.1989 को पारित निर्णय और आदेश को रद्द कर दिया है. कोर्ट ने आरोपी राम प्रकाश, रमेश, जगदीश और राम सजीवन को धारा सभी आरोपों से बरी कर दिया है. उनकी जमानत बांड रद्द करते हुए जमानतदारों को मुक्त कर दिया है.
कोर्ट ने दोनों पक्षों के तर्कों को सुनने के बाद अपने फैसले में माना कि परिस्थितियों (Facts) की कड़ी अधूरी है. अभियोजन पक्ष अपना मामला उचित संदेह से परे साबित करने में असफल रहा है. रिकॉर्ड पर मौजूद सबूत (Facts) संदेह पैदा करते हैं, लेकिन अपराध को निर्णायक रूप से साबित नहीं करते. आपराधिक न्यायशास्त्र का यह एक मूल सिद्धांत है कि संदेह का लाभ आरोपी को ही मिलना चाहिए.
यह आपराधिक अपील अभियुक्त राम प्रकाश, रमेश, जगदीश, मट्टी, राम सजीवन, तुलसी राम और दल चंद द्वारा विशेष न्यायाधीश (E.C. Act) / अपर सत्र न्यायाधीश, जालौन (ओरई) द्वारा 17.10.1989 को पारित निर्णय और आदेश के विरुद्ध दाखिल की गयी थी.
इस केस में प्रत्येक अपीलकर्ता को भारतीय दंड संहिता की धारा 147, 302/149 और 201 के तहत अपराधों के लिए दोषी ठहराते हुए उन्हें IPC की धारा 302 (धारा 149 के साथ पठित) के तहत अपराध के लिए आजीवन कारावास, धारा 201 के तहत अपराध के लिए सात वर्ष का कठोर कारावास और धारा 147 के तहत अपराध के लिए दो वर्ष का कठोर कारावास की सजा सुनायी थी.
Facts यह थे कि 19.09.1988 को ग्राम भदरेखी के निवासी घनश्याम अहिरवार के पुत्र हरि राम द्वारा एक लिखित रिपोर्ट दर्ज कराई गई थी
अभियोजन पक्ष के अनुसार मामले के तथ्य (Facts) यह थे कि 19.09.1988 को ग्राम भदरेखी के निवासी घनश्याम अहिरवार के पुत्र हरि राम द्वारा एक लिखित रिपोर्ट दर्ज कराई गई थी. रिपोर्ट के अनुसार 17.09.1988 को खेत में पशु चराने को लेकर राम प्रकाश, रमेश, जगदीश, मट्टी, दल चंद, राम सजीवन और तुलसी राम और शिकायतकर्ता तथा उसके पुत्र के बीच झगड़ा हुआ था. इसके बाद अभियुक्तों ने शिकायतकर्ता और उसके पुत्र को दो-तीन दिनों के भीतर गंभीर परिणाम भुगतने की धमकी दी थी.
Facts के अनुसार 19.09.1988 को सुबह शिकायतकर्ता का पोता जिसका नाम लक्ष्मी था जो घर से खत जाने के लिए निकला था रहस्यमय तरीके से गायब हो गया. गाँव और जंगल दोनों जगहों पर अच्छी तरह से तलाश करने के बावजूद लक्ष्मी का कोई सुराग नहीं मिला. शिकायतकर्ता को शक हुआ कि आरोपियों ने लक्ष्मी को जान से मारने के इरादे से उसका अपहरण कर लिया है. तहरीर के आधार पर पुलिस थाना आटा जिला जालौन में केस क्राइम संख्या 347/1988 धारा 364 के तहत प्रथम सूचना रिपोर्ट (Facts) दर्ज की गयी.

इसके बाद पुलिस ने आरोपियों को गिरफ्तार कर लिया गया. आरोपियों से गवाहों, यानी राज बहादुर सिंह और भारत सिंह की मौजूदगी में पूछताछ की गई. इसके बाद, वह आरोपियों और गवाहों के साथ उस घटना स्थल पर पहुँचे, जहाँ मृतक लक्ष्मी की हत्या की गई थी. अपराध स्थल पर कंकड़ों और मिट्टी पर खून के धब्बे पाए गए (Facts) घटनास्थल से खून लगी मिट्टी और सादी मिट्टी इकट्ठा का सैंपल लिया या.
घटनास्थल से अगवा किए गए लड़के लक्ष्मी का शव मिला, जिसे नाले के अंदर (Facts) मिट्टी और घास से छिपाकर रखा गया था. एक खुरपी, एक हँसिया और एक फावड़ा (Fact) भी नाले से लगभग 10 कदम आगे से बरामद किया गया जिन पर खून के धब्बे लगे थे.
जाँच पूरी होने के बाद 07.10.1988 को आरोप पत्र प्रस्तुत किया. चूंकि यह मामला विशेष रूप से सेशन कोर्ट द्वारा विचारणीय था इसलिए मजिस्ट्रेट ने मामले को सेशन कोर्ट में भेज दिया, जहाँ मामला सेशन ट्रायल नंबर 29/1989 के रूप में दर्ज किया गया. विशेष न्यायाधीश (E.C. Act)/अपर सेशन न्यायाधीश, जालौन (ओरई) ने दिनांक 05.04.1989 के आदेश के माध्यम से आरोपी अपीलकर्ताओं के विरुद्ध भारतीय दंड संहिता की धारा 147, 302/149 और 201 के तहत अपराधों के लिए आरोप तय किए.
अभियोजन पक्ष ने कुल आठ गवाहों की गवाही दर्ज कराई. अभियोजन पक्ष के साक्ष्य समाप्त होने के बाद, आरोपी अपीलकर्ताओं राम प्रकाश, रमेश, जगदीश, मत्ती, राम सजीवन, तुलसी राम और दल चंद के बयान दर्ज किए गए. इन सभी ने अपने ऊपर लगाए गए आरोपों से इनकार किया. विशेष न्यायाधीश (E.C. Act)/अपर सत्र न्यायाधीश, जालौन ने दोनों पक्षों के विद्वान वकीलों की दलीलें सुनने के बाद, और रिकॉर्ड पर मौजूद साक्ष्यों का आकलन, मूल्यांकन और गहन परीक्षण करने के उपरांत, आरोपी-अपीलकर्ताओं को दोषी ठहराया और सजा सुनाई.
इस फैसले को हाई कोर्ट में चुनौती दी गयी. जीवित अपीलकर्ताओं राम प्रकाश, रमेश, जगदीश और राम सजीवन की ओर से पेश हुए वरिष्ठ अधिवक्ता ने ट्रायल कोर्ट द्वारा पारित किए गए विवादित निर्णय और आदेश को इस आधार पर चुनौती दी कि अभियोजन पक्ष द्वारा प्रस्तुत परिस्थितिजन्य साक्ष्य, परिस्थितियों की श्रृंखला (Facts) को पूरा करने के लिए अपर्याप्त है. तर्क दिया कि आरोपी-अपीलकर्ताओं पर लगाया गया कथित मकसद न तो इतना मजबूत है और न ही इतना विश्वसनीय कि वह उन्हें इतना गंभीर और जघन्य अपराध करने के लिए विवश कर सके.
यह भली-भांति स्थापित सिद्धांत है कि जब कोई मामला परिस्थितिजन्य साक्ष्य (Facts)पर आधारित होता है, तो मकसद का महत्व बहुत बढ़ जाता है. वर्तमान मामले में, कथित मकसद परिस्थितियों की श्रृंखला में एक विश्वसनीय कड़ी बनाने के लिए अपर्याप्त प्रतीत होता है. किसी ठोस और विश्वसनीय मकसद के अभाव में, आरोपी-अपीलकर्ताओं को कथित अपराध से जोड़ने का प्रयास अत्यधिक संदिग्ध हो जाता है और कानून की दृष्टि से टिकने योग्य नहीं रहता.
इसके विपरीत अपर शासकीय अधिवक्ता ने तर्क दिया कि विचारण न्यायालय द्वारा दर्ज की गई दोषसिद्धि सुविचारित और ठोस साक्ष्यों पर आधारित है. एक स्पष्ट उद्देश्य स्थापित हो गया है और परिस्थितियों की श्रृंखला पूर्ण है.
दोनों पक्षों के तर्कों को सुनने के बाद कोर्ट ने विचारण के लिए निम्न प्वाइंट तय किये:
(i) क्या अभियोजन पक्ष परिस्थितियों की एक ऐसी पूर्ण श्रृंखला (Facts) स्थापित करने में सक्षम रहा है जो निर्विवाद रूप से अभियुक्त-अपीलकर्ताओं के अपराध की ओर संकेत करती हो?
(ii) क्या अपीलकर्ताओं की धारा 147, 302/149 और 201 I.P.C. के तहत दोषसिद्धि (Facts) कानून की नजर में सही है?
बेंच ने कहा कि यह कानून का एक स्थापित सिद्धांत है कि जो मामले पूरी तरह से परिस्थितिजन्य साक्ष्यों (Fact) पर आधारित होते हैं, उनमें अभियोजन पक्ष को परिस्थितियों (Fact) की एक पूरी श्रृंखला स्थापित करनी होती है, जो केवल आरोपी के दोषी होने की परिकल्पना के अनुरूप हो और किसी भी अन्य परिकल्पना के विपरीत हो. परिस्थितियाँ निर्णायक प्रकृति और प्रवृत्ति की होनी चाहिए.

सर्वोच्च न्यायालय ने *शरद बिरदीचंद सारडा बनाम महाराष्ट्र राज्य* मामले में परिस्थितिजन्य साक्ष्यों (Fact) पर आधारित मामलों को नियंत्रित करने वाले पाँच सिद्धांत निर्धारित किए हैं, जिनके अनुसार:
(a) परिस्थितियाँ पूरी तरह से स्थापित होनी चाहिए;
(b) इस प्रकार स्थापित तथ्य केवल दोषी होने की परिकल्पना के अनुरूप होने चाहिए;
(c) परिस्थितियाँ निर्णायक होनी चाहिए;
(d) उन्हें साबित की जाने वाली परिकल्पना के अलावा हर संभव परिकल्पना को खारिज कर देना चाहिए; और
(e) साक्ष्यों की एक पूरी श्रृंखला होनी चाहिए.
*उत्तर प्रदेश राज्य बनाम अशोक कुमार श्रीवास्तव* मामले में, यह बताया गया था कि परिस्थितिजन्य साक्ष्यों (Fact) का मूल्यांकन करते समय बहुत सावधानी बरती जानी चाहिए और यदि जिन साक्ष्यों पर भरोसा किया गया है उनसे यथोचित रूप से दो निष्कर्ष निकाले जा सकते हैं तो उनमें से वह निष्कर्ष स्वीकार किया जाना चाहिए जो आरोपी के पक्ष में हो.
यह भी बताया गया कि जिन परिस्थितियों पर भरोसा किया गया है, उनका पूरी तरह से स्थापित होना जरूरी है और इस प्रकार स्थापित सभी तथ्यों का सामूहिक प्रभाव केवल दोषसिद्धि की परिकल्पना के ही अनुरूप होना चाहिए.
हनुमंत गोविंद नरगुंडकर बनाम मध्य प्रदेश राज्य के मामले में, माननीय सर्वोच्च न्यायालय ने निम्नलिखित टिप्पणी की: “यह याद रखना उचित है कि जिन मामलों में साक्ष्य परिस्थितिजन्य प्रकृति का होता है, उन मामलों में जिन परिस्थितियों से दोषसिद्धि का निष्कर्ष निकाला जाना है, उन्हें सर्वप्रथम पूर्ण रूप से स्थापित किया जाना चाहिए, और इस प्रकार स्थापित सभी तथ्य केवल अभियुक्त के दोष की परिकल्पना के अनुरूप ही होने चाहिए.
पुनः, परिस्थितियाँ (Facts) निर्णायक प्रकृति और प्रवृत्ति की होनी चाहिए, और वे ऐसी होनी चाहिए जो सिद्ध की जाने वाली परिकल्पना के अलावा अन्य सभी परिकल्पनाओं को खारिज कर दें. दूसरे शब्दों में, साक्ष्य की एक ऐसी Fact श्रृंखला होनी चाहिए जो इतनी पूर्ण हो कि अभियुक्त की निर्दोषता के अनुरूप किसी निष्कर्ष के लिए कोई उचित आधार न छोड़े और यह ऐसी होनी चाहिए जिससे यह प्रदर्शित हो कि सभी मानवीय संभावनाओं के भीतर, वह कृत्य अवश्य ही अभियुक्त द्वारा किया गया होगा.
CRIMINAL APPEAL No. – 2055 of 1989 Ram Prakash and 6 others V/s State of U.P