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Concealing Material Facts विशेष परिस्थिति में नियुक्ति रद करने का कारण लेकिन इसे किताबी ढंग से लागू नहीं किया जा सकता: HC

इलाहाबाद हाई कोर्ट ने बेसिक शिक्षा अधिकारी मऊ का आदेश रद किया, सहायक अध्यापक को ड्यूटी ज्वाइन कराने का आदेश

Concealing Material Facts विशेष परिस्थिति में नियुक्ति रद करने का कारण लेकिन इसे किताबी ढंग से लागू नहीं किया जा सकता: HC

यह तथ्य भली-भांति स्थापित है कि किसी महत्वपूर्ण तथ्य को छिपाना (Concealing Material Facts), कुछ विशेष परिस्थितियों में किसी नियुक्ति को रद्द करने का कारण बन सकता है. इस सिद्धांत को यांत्रिक या केवल किताबी ढंग से लागू नहीं किया जा सकता. आनुपातिकता का सिद्धांत और किसी भी प्रकार के पूर्वाग्रह से मुक्ति की आवश्यकता ही न्यायिक समीक्षा के प्रयोग का मार्गदर्शन करनी चाहिए.

जहाँ विसंगति न तो जानबूझकर कोई अनुचित लाभ प्राप्त करने के उद्देश्य से की गई हो और न ही उसके परिणामस्वरूप चयन प्रक्रिया में कोई विकृति उत्पन्न हुई हो वहाँ Concealing Material Facts के बेस पर नियुक्ति को रद्द करने जैसा कठोर परिणाम पूर्णतः असंगत होगा. इस कमेंट के साथ इलाहाबाद हाई कोर्ट के जस्टिस मंजू रानी चौहान की बेंच ने बीएसए मउ के उस आदेश को रद कर दिया है जिसमें उन्होंने सहायक अध्यापक को सेवा से बर्खास्त कर दिया था.

कोर्ट ने कहा कि  याचिकाकर्ता द्वारा अपने पिछले प्रमाण पत्र का विवरण न देना (Concealing Material Facts) यद्यपि प्रशंसनीय कृत्य नहीं है तथापि यह उस स्तर का कोई ‘दोषपूर्ण तथ्य-गोपन’ नहीं है जिसके आधार पर उसकी नियुक्ति को अवैध घोषित किया जा सके. विशेष रूप से तब, जब उसे इस कृत्य (Concealing Material Facts) से कोई ठोस लाभ प्राप्त न हुआ हो और चयन प्रक्रिया भी अप्रभावित रही हो. ऐसी परिस्थितियों में याचिकाकर्ता को सेवा-समाप्ति जैसे कठोर परिणाम का भागी बनाना अन्यायपूर्ण और अनुचित होगा.

Concealing Material Facts से कोई ठोस लाभ प्राप्त हुआ नहीं

कोर्ट ने प्रतिवादियों को निर्देश दिया है कि वे पिटीशनर को तुरंत अपनी ड्यूटी फिर से शुरू करने/जॉइन करने की इजाजत दें. कोर्ट ने यह साफ कर दिया है कि चूंकि रिट पिटीशन के पेंडिंग रहने के दौरान पिटीशनर के पक्ष में कोई अंतरिम ऑर्डर लागू नहीं था इसलिए “नो वर्क, नो पे” के तय सिद्धांत के अनुसार पिटीशनर उस समय के लिए सैलरी का दावा करने का हकदार नहीं होगा.

यह भी कहा गया है कि अगर कोई भी डॉक्यूमेंट जिसके आधार पर पिटीशनर ने अपना दावा बनाए रखने की कोशिश की है, बाद में झूठा, बनावटी या असली नहीं (Concealing Material Facts) पाया जाता है तो रेस्पोंडेंट्स को पिटीशनर के खिलाफ कानून के मुताबिक सही कार्रवाई शुरू करने का अधिकार होगा.

यह याचिका मऊ जिले के बेसिक शिक्षा विभाग में सहायक अध्यापक के पद से हटाये गये विजय कुमार यादव की तरफ से दाखिल की गयी थी. याचिका में उन्होंने बेसिक शिक्षा अधिकारी मऊ द्वारा 27 जून 2019 को दिये गये आदेश को रद करने, उसके खिलाफ विवादित आदेश के आधार पर किसी कार्रवाई से प्रतिवादियों को रोकने की मांग की गयी थी.

याचिकाकर्ता के अधिवक्ता की तरफ से कोर्ट में रखे गये तथ्यों के अनुसार उसने वर्ष 2001 में संपूर्णानंद संस्कृत विश्वविद्यालय, वाराणसी से ‘पूर्व मध्यमा’, यूपी माध्यमिक संस्कृत शिक्षा बोर्ड, लखनऊ द्वारा आयोजित ‘उत्तर मध्यमा’ परीक्षा उत्तीर्ण की. वर्ष 2009 में संपूर्णानंद संस्कृत विश्वविद्यालय से ‘शास्त्री’ की उपाधि प्राप्त की. वर्ष 2010 में ‘बेसिक ट्रेनिंग सर्टिफिकेट’ पाठ्यक्रम में प्रवेश दिया गया था.

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याचिकाकर्ता ने प्राथमिक स्तर के लिए शिक्षक पात्रता परीक्षा 2013 में उत्तीर्ण की. निर्धारित मानदंडों के अनुसार विधिवत योग्य और पूरी तरह से पात्र होने के नाते वर्ष 2013 में शुरू की गई चयन प्रक्रिया के तहत सहायक शिक्षक के पद पर नियुक्ति के लिए विचार किए जाने हेतु आवेदन किया था.

याचिकाकर्ता की उम्मीदवारी पर, उक्त भर्ती प्रक्रिया को नियंत्रित करने वाले लागू नियमों और प्रक्रियाओं के अनुसार, विधिवत विचार किया गया था. परिणामस्वरूप, याचिकाकर्ता को बेसिक शिक्षा अधिकारी, मऊ द्वारा 08.08.2014 के नियुक्ति आदेश के माध्यम से, सहायक शिक्षक के पद पर विधिवत चयनित और नियुक्त किया गया था.

कोर्ट को बताया गया कि  राजेश यादव नामक एक व्यक्ति ने 18.10.2018 को बेसिक शिक्षा अधिकारी, मऊ के समक्ष एक आवेदन प्रस्तुत किया था, जो कथित तौर पर सूचना का अधिकार अधिनियम, 2005 के तहत था. इसमें उसने याचिकाकर्ता के उन शैक्षिक योग्यता प्रमाण पत्रों और अंक-पत्रों की प्रतियां उपलब्ध कराने की मांग की थी, जिनके आधार पर उसे नियुक्ति प्रदान की गई थी.

इस तथ्य के बावजूद कि उक्त आवेदन कानूनन स्वीकार्य नहीं था, अपर शिक्षा निदेशक (बेसिक) के आदेश पर याचिकाकर्ता के शैक्षिक योग्यता के प्रमाण पत्रों की प्रतियां राजेश यादव को उपलब्ध करा दी गयीं. अपर शिक्षा निदेशक (बेसिक) के आदेश पर याचिकाकर्ता ने 30.05.2019 के एक कवरिंग लेटर के साथ, अपने सभी शैक्षिक प्रमाण पत्रों की स्व-प्रमाणित प्रतियां विधिवत प्रस्तुत कर दीं.

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इसके बाद बेसिक शिक्षा अधिकारी, मऊ ने एक नोटिस जारी किया, जिसमें याचिकाकर्ता को व्यक्तिगत सुनवाई के लिए उपस्थित होने को कहा गया. यह सुनवाई याचिकाकर्ता द्वारा प्रस्तुत किए गए प्रमाण पत्रों और अंक-पत्रों में कथित विसंगतियों (Concealing Material Facts) के संबंध में थी.

नोटिस के अनुपालन (Concealing Material Facts) में याचिकाकर्ता ने विस्तृत जवाब विधिवत प्रस्तुत किया. इसके बाद बेसिक शिक्षा अधिकारी, मऊ द्वारा एक और आदेश पारित किया गया, जिसके द्वारा याचिकाकर्ता को कथित तौर पर सेवा से बर्खास्त कर दिया गया और साथ ही उसके विरुद्ध प्रथम सूचना रिपोर्ट दर्ज करने का निर्देश भी दिया गया.

याचिकाकर्ता के अधिवक्ता ने तर्क दिया कि उसके द्वारा पेश किये गये प्रमाण पत्रों या अंक-पत्रों में से किसी के भी जाली, मनगढ़ंत होने, या किसी भी प्रकार की विसंगति से दूषित होने (Concealing Material Facts) का आरोप कभी नहीं लगाया गया है. यहाँ तक कि विवादित आदेश भी इस संबंध में पूरी तरह से मौन है और इन मूलभूत योग्यताओं की प्रामाणिकता के संबंध में कोई भी प्रतिकूल निष्कर्ष दर्ज नहीं करता है.

ऐसी परिस्थितियों में, याचिकाकर्ता की पात्रता और BTC प्रशिक्षण पाठ्यक्रम में उसके प्रवेश का मूल आधार पूरी तरह से निर्विवाद बना हुआ है और उक्त योग्यताओं (Concealing Material Facts) को अमान्य ठहराने वाले किसी भी निष्कर्ष के अभाव में विवादित कार्रवाई कानून की दृष्टि से दोषपूर्ण है और उसे रद्द किया जाना चाहिए.

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याचिकाकर्ता की ओर से कहा गया कि विवादित आदेश गलत और पूरी तरह से भ्रामक आधार पर आधारित है, जिसमें वर्ष 1998 के हाई स्कूल प्रमाण पत्र में दर्ज जन्म तिथि में कथित विसंगति (Concealing Material Facts) पर भरोसा किया गया है. इस प्रमाण पत्र में जन्म तिथि 02.07.1984 अंकित है, जबकि ‘पूर्व मध्यमा’ प्रमाण पत्र में यह तिथि 07.07.1987 दर्ज है.

तर्क दिया गया कि उपर्युक्त हाई स्कूल प्रमाण पत्र पर न तो कभी भरोसा किया गया है और न ही याचिकाकर्ता द्वारा किसी भी चरण पर इसे कभी प्रस्तुत किया गया है. इसका उपयोग BTC Training Course, 2010 में प्रवेश प्राप्त करने के लिए नहीं किया गया था, और न ही इसे नियुक्ति के समय प्रस्तुत किया गया था. याचिकाकर्ता द्वारा किसी भी समय, उक्त प्रमाण पत्र के आधार पर किसी भी प्रकार का कोई लाभ प्राप्त नहीं किया गया है.

याचिकाकर्ता के अधिवक्ता ने ‘कविता कुरिल बनाम उत्तर प्रदेश राज्य और अन्य’ (2023 (12) ADJ 571 में रिपोर्टेड), ‘शेवराज सिंह बनाम उत्तर प्रदेश राज्य और अन्य’ (रिट-ए संख्या 35397/2012, 27.08.2012 को निर्णित) और ‘कमला कांत यादव बनाम उत्तर प्रदेश राज्य’ मामलों में दिए गए फैसलों के जरिए यह तर्क देने का प्रयास किया है कि उन मामलों में भी, जहाँ दो हाई स्कूल मार्कशीट में दर्ज जन्मतिथि में कोई विसंगति मौजूद है, ऐसी विसंगति (Concealing Material Facts) अपने आप में नियुक्ति को अमान्य नहीं कर देगी; बशर्ते कि नियुक्ति प्राप्त करने के लिए जिस प्रमाण पत्र पर भरोसा किया गया है, वह वास्तविक हो और उसमें किसी प्रकार की धोखाधड़ी या जालसाजी न हो.

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प्रतिवादी–जिला बेसिक शिक्षा अधिकारी की ओर से उपस्थित अधिवक्ता ने तर्क दिया कि एक शिकायत (Concealing Material Facts) के अनुसरण में एक जांच शुरू की गई थी जिसका परिणाम जांच अधिकारी द्वारा प्रस्तुत एक रिपोर्ट के रूप में सामने आया. उक्त रिपोर्ट के अनुसार, कक्षा VIII से संबंधित स्कॉलर रजिस्टर (छात्र पंजी), जिसका पंजीकरण संख्या 1994-95 सत्र का 2188 है, यह दर्ज करता है कि याचिकाकर्ता ने वर्ष 1996 में कक्षा VIII उत्तीर्ण की थी, जिसमें जन्म तिथि 02.07.1984 दर्ज है.

इसके अतिरिक्त, नेशनल इंटर कॉलेज में कक्षा IX में प्रवेश के लिए याचिकाकर्ता द्वारा प्रस्तुत आवेदन पत्र में भी जन्म तिथि 02.07.1984 ही दर्शाई गई है. हाई स्कूल के रिकॉर्ड, जिसमें संबंधित राजपत्र अधिसूचना भी शामिल है, इसी प्रकार याचिकाकर्ता की जन्म तिथि 02.07.1984 ही इंगित करते हैं.

उपर्युक्त सामग्री के आधार पर तर्क दिया गया कि याचिकाकर्ता अपनी पहले से दर्ज जन्म तिथि (Concealing Material Facts) से पूरी तरह अवगत था, फिर भी उसने जानबूझकर उक्त जानकारी को छिपाए रखा और इसके बजाय ‘पूर्व मध्यमा’ प्रमाण पत्र पर भरोसा किया, जिसमें एक अलग जन्म तिथि दर्शाई गई थी. प्रतिवादियों के अनुसार, इस प्रकार की जानकारी को छिपाना मात्र कोई विसंगति नहीं है, बल्कि यह महत्वपूर्ण तथ्यों को जानबूझकर दबाना (Concealing Material Facts) है, जो इस मामले की जड़ तक जाता है.

याचिकाकर्ता का, जन्म की अलग तारीख दर्शाने वाले प्रमाण पत्र के आधार पर नियुक्ति मांगने का कार्य स्पष्ट रूप से कदाचार माना जाएगा. ऐसे में विवादित आदेश जो विधिवत की गई जांच के आधार पर पारित किए गए हैं और दस्तावेजी साक्ष्यों द्वारा समर्थित हैं, उनमें कोई ऐसी अवैधता या त्रुटि नहीं है जिसके लिए इस न्यायालय के हस्तक्षेप की आवश्यकता हो.

प्रतिवादी के अधिवक्ता ने तर्क दिया कि यह कानून का स्थापित सिद्धांत है कि जिन मामलों में महत्वपूर्ण तथ्यों को छिपाया गया हो या धोखाधड़ी (Concealing Material Facts) शामिल हो, वहां विस्तृत जांच करने या सुनवाई का विस्तृत अवसर प्रदान करने की आवश्यकता काफी हद तक कम हो जाती है. जहां मूल तथ्य निर्विवाद दस्तावेजी साक्ष्यों से सिद्ध होते हैं, वहां नैसर्गिक न्याय के सिद्धांतों को इस हद तक नहीं बढ़ाया जा सकता कि वे न्याय के उद्देश्यों को ही विफल कर दें. उपर्युक्त कानूनी स्थिति के बावजूद, याचिकाकर्ता को वास्तव में अपना पक्ष स्पष्ट करने के पर्याप्त अवसर प्रदान किए गए थे.

यह न्यायालय यह टिप्पणी करने के लिए बाध्य है कि प्रत्यर्थियों के मामले का संपूर्ण आधार (इमारत) केवल एक ही परिस्थिति पर टिका है और वह है याचिकाकर्ता के विभिन्न शैक्षिक अभिलेखों में अंकित जन्म तिथियों में पाया जाने वाला अंतर (Concealing Material Facts). मात्र एक विसंगति जिसमें किसी भी प्रकार के कपट का तत्व विद्यमान न हो को किसी भी न्यायिक रूप से स्वीकृत मापदंड के आधार पर ‘कपट’ अथवा ‘जानबूझकर किए गए मिथ्या-कथन’ की श्रेणी में नहीं रखा जा सकता.
बेंच ने की टिप्पणी

कपट की धारणा स्वतः नहीं की जा सकती. इसका विशिष्ट रूप से अभिकथन किया जाना तथा ठोस एवं निर्विवाद साक्ष्यों द्वारा इसे सिद्ध किया जाना अनिवार्य है. प्रस्तुत मामले के अभिलेख में ऐसी कोई भी सामग्री स्पष्ट रूप से उपलब्ध नहीं है, जिससे यह परिलक्षित होता हो कि याचिकाकर्ता ने किसी विशिष्ट जन्म तिथि को प्रस्तुत करके (Concealing Material Facts) कोई अनुचित अथवा अवांछित लाभ प्राप्त करने का कोई जानबूझकर किया गया षड्यंत्र रचा था.

याचिकाकर्ता द्वारा जिन प्रमाणपत्रों पर भरोसा किया गया है, उन पर जाली, मनगढ़ंत अथवा कूट-रचित होने का कोई आरोप नहीं है. वे सक्षम प्राधिकारियों द्वारा जारी किए गए ऐसे दस्तावेज हैं, जिनका विधिक अस्तित्व आज भी यथावत बना हुआ है.
बेंच ने तथ्यों को परखने के बाद माना

आरोप का मूल सार यह है कि याचिकाकर्ता ने कुछ ऐसे पूर्ववर्ती प्रमाणपत्रों का खुलासा नहीं किया, जिनमें उसकी जन्म तिथि भिन्न अंकित थी. किसी ‘तथ्य को छिपाने’ की क्रिया को ‘दुराचरण’ की श्रेणी में रखे जाने हेतु यह सिद्ध किया जाना अनिवार्य है कि वह क्रिया किसी विशिष्ट उद्देश्य से, सुनियोजित ढंग से तथा कपट करने के स्पष्ट आशय से प्रेरित थी. ऐसे ‘दुराशय’ के अभाव में, उक्त चूक अधिक से अधिक मात्र एक ‘अनियमितता’ ही मानी जाएगी. इसे कोई ऐसा ‘दोषपूर्ण कृत्य’ नहीं माना जा सकता, जिसके परिणामस्वरूप नियुक्ति को रद्द करने जैसा कठोर दंड दिया जाना उचित हो.
कोर्ट ने स्पष्ट किया

प्रत्यर्थियों के मामले को और अधिक कमजोर करने वाला एक अन्य निर्विवाद तथ्य यह है कि भले ही हाई स्कूल प्रमाणपत्र में अंकित जन्म तिथि को ही सत्य मान लिया जाए तब भी याचिकाकर्ता, प्रश्नगत पद पर नियुक्ति हेतु निर्धारित पात्रता की परिधि के भीतर ही बना रहता है. ‘लाभ’ अथवा ‘फायदा’ प्राप्त करने की वह मूलभूत अपेक्षा जो कि ‘कपट’ का एक अनिवार्य एवं अभिन्न अंग मानी जाती है प्रस्तुत मामले में पूर्णतः अनुपस्थित है. इसलिए जन्म तिथि संबंधी इस कथित विसंगति के कारण न तो नियोक्ता को और न ही अन्य प्रतिस्पर्धी अभ्यर्थियों को किसी भी प्रकार की क्षति अथवा पूर्वाग्रह का सामना करना पड़ा है.
फैसले के अंश

यहाँ मुद्दा केवल जन्म तिथि में विसंगति का नहीं है बल्कि उस दस्तावेज की प्रकृति (Concealing Material Facts) का है जिस पर भरोसा किया गया है. इसमें धोखाधड़ी के इरादे की उपस्थिति या अनुपस्थिति और यह प्रश्न भी शामिल है कि क्या कोई अनुचित लाभ प्राप्त किया गया है. इन कारकों के उत्तर ही अंततः उपर्युक्त निर्णयों में प्रतिपादित कानून की प्रयोज्यता को निर्धारित करेंगे.

न्यायालय का यह भी समान रूप से दायित्व है कि वह इस बात की जाँच करे कि क्या ऐसी चूक के परिणामस्वरूप वास्तव में नियोक्ता को कोई हानि हुई है अथवा क्या इससे याचिकाकर्ता को Concealing Material Facts से कोई अनुचित लाभ प्राप्त हुआ है. वर्तमान मामले में, इस बात पर कोई विवाद नहीं है कि दोनों पक्षों द्वारा जिन प्रमाणपत्रों पर भरोसा किया गया है वे वास्तविक हैं और सक्षम प्राधिकारियों द्वारा ही जारी किए गए हैं.

उनमें किसी भी प्रकार की जालसाजी या हेर-फेर नहीं है. इससे भी महत्वपूर्ण बात यह है कि जन्म की तारीखों में जो अंतर दिखाई देता है, Concealing Material Facts से याचिकाकर्ता को पात्रता, आयु में छूट या किसी अन्य रूप में कोई लाभ मिला हो ऐसा प्रदर्शित नहीं किया गया है.

‘कविता कुरिल बनाम उत्तर प्रदेश राज्य व अन्य, 2023 (12) ADJ 571’ नामक वाद में दिए गए निर्णय का ‘मुख्य सिद्धांत’ यह है कि हाई स्कूल प्रमाण पत्र में अंकित जन्म तिथि को ही आयु का प्राथमिक और निर्णायक प्रमाण माना जाना चाहिए. विशेष रूप से तब, जब सेवा अभिलेखों के प्रयोजनार्थ संबंधित प्राधिकारियों द्वारा उसी जन्म तिथि पर निरंतर भरोसा किया जाता रहा हो.

उक्त वाद में, न्यायालय ने यह अभिनिर्धारित किया था कि एक बार जब किसी व्यक्ति की जन्म तिथि ऐसे आधारभूत दस्तावेज के आधार पर, उसकी सेवा पुस्तिका  में विधिवत अंकित कर दी जाती है और यदि उसमें किसी प्रकार के कपट, मिथ्या-वर्णन अथवा कूटरचना का कोई आरोप न हो तो अन्य शैक्षिक प्रमाण पत्रों में पाई गई विसंगतियों के आधार पर उस जन्म तिथि को सरलतापूर्वक परिवर्तित अथवा उपेक्षित नहीं किया जा सकता.

उपर्युक्त सिद्धांत को वर्तमान वाद के तथ्यों पर लागू करने पर, यह न्यायालय इस निष्कर्ष पर पहुँचता है कि याचिकाकर्ता द्वारा उक्त निर्णय पर व्यक्त किया गया भरोसा केवल सीमित सीमा तक ही सहायक सिद्ध होता है. इन दोनों मामलों के मध्य का मुख्य अंतर न संबंधित प्रमाण पत्रों की प्रकृति में निहित है. इस मामले में, याचिकाकर्ता हाई स्कूल सर्टिफिकेट को नहीं, बल्कि वर्ष 2001 की मध्यमा और पूर्व मध्यमा की मार्कशीट को ज़्यादा महत्व देना चाहता है, ताकि वह अपनी जन्मतिथि 07.07.1987 साबित कर सके.

यह एक स्थापित तथ्य है कि हाई स्कूल सर्टिफिकेट, जो किसी मान्यता प्राप्त बोर्ड द्वारा जारी किया गया सबसे पहला सार्वजनिक दस्तावेज होता है, आमतौर पर जन्मतिथि तय करने में ज्यादा प्रमाणिक महत्व रखता है. कविता कुरिल (उपर्युक्त) मामले का सिद्धांत इसी आधार पर आधारित है.

जहाँ बुनियादी दस्तावेज़ों में ही कोई विसंगति (Concealing Material Facts) या अंतर हो, वहाँ मामला एक अलग ही रूप ले लेता है. ऐसी स्थिति में, उपर्युक्त फैसले में बताए गए सिद्धांत का लाभ यांत्रिक तरीके से नहीं दिया जा सकता, खासकर तब जब याचिकाकर्ता द्वारा जिस दस्तावेज पर भरोसा किया गया है, उसकी प्रामाणिकता और महत्व पर ही सवाल उठ रहे हों. इस न्यायालय की सुविचारित राय है कि कविता कुरील मामले का फैसला, भले ही वह एक स्थापित सिद्धांत हो, इस मामले के तथ्यों पर पूरी तरह से लागू नहीं होता, और याचिकाकर्ता उससे कोई ठोस लाभ नहीं उठा सकता.

उपर्युक्त सिद्धांतों की कसौटी पर परखने पर, प्रतिवादियों की विवादित कार्रवाई ठोस सबूतों के बजाय संदेह पर ज़्यादा आधारित प्रतीत होती है. धोखाधड़ी का निष्कर्ष जिसके गंभीर नागरिक परिणाम होते हैं केवल अस्पष्ट परिस्थितियों या रिकॉर्ड में मामूली विसंगतियों के आधार पर नहीं निकाला जा सकता, भले ही वे कितनी भी असुविधाजनक क्यों न लगें.

WRIT – A No. – 10432 of 2019;  Vijai Kumar Yadav V/s State of U.P. and 3 others

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