जमीन के विवाद तय करते समय Due Diligence और सिविल प्रक्रिया संहिता के आदेश 47 नियम 1 की शर्तों का पालन अनिवार्य
इलाहाबाद हाईकोर्ट ने की पुनरीक्षण और Due Diligence के नियमों पर बड़ी टिप्पणी

इलाहाबाद हाई कोर्ट ने कहा है कि जमीन के विवाद तय करते समय Due Diligence’ और सिविल प्रक्रिया संहिता के आदेश 47 नियम 1 (Order XLVII Rule 1) की अनिवार्य शर्तों का पालन अनिवार्य है. इस कमेंट के साथ जस्टिस अरुण कुमार की बेंच ने कमिश्नर, इलाहाबाद डिवीजन द्वारा 16 जुलाई 2024 को समीक्षा आवेदन स्वीकार करने और पुराने आदेशों को रद्द करने वाले आदेश को रद्द कर दिया है. कोर्ट ने समीक्षा आवेदन को कमिश्नर के पास पुनः विचार के लिए भेज दिया है.
कोर्ट ने कमिश्नर को निर्देश दिया है कि वह ‘Due Diligence’ और सिविल प्रक्रिया संहिता के आदेश 47 नियम 1 (Order XLVII Rule 1) की अनिवार्य शर्तों का पालन करते हुए दोनों पक्षों को सुनकर तीन महीने के भीतर नए सिरे से एक तर्कसंगत आदेश पारित करें. कोर्ट ने 24 अक्टूबर 2025 का निर्णय और डिक्री आदेश परिणामी आदेश होने के कारण निरस्त कर दिया और राजस्व बोर्ड द्वारा 20 अप्रैल 2026 को रिवीजन को निष्फल मानकर खारिज करने का आदेश भी निरस्त कर दिया है.
यह विवाद उत्तर प्रदेश जमींदारी विनाश और भूमि सुधार अधिनियम, 1950 (U.P. Zamindari Abolition and Land Reforms Act, 1950) की धारा 229-B के तहत भूमि स्वामित्व को लेकर था. यह मामला प्रयागराज (पूर्व में इलाहाबाद) जिले के परगना सदर स्थित ग्राम उमरपुर निवां के गाटा संख्या 293 (क्षेत्रफल 0.068 हेक्टेयर) की भूमि के मालिकाना हक से जुड़ा हुआ था. सुनवाई के बाद कोर्ट ने पुनरीक्षण की शक्तियों, Due Diligence (सतर्कता) के सिद्धांतों और उसके आधार पर पारित आदेशों की कानूनी वैधता पर विस्तार से प्रकाश डाला.

तथ्यों के अनुसार मूल भूमि स्वामी महादेव और उनके भाई सुंदर लाल ने 15 जनवरी 1993 को मोहम्मद सामी के पक्ष में एक पावर ऑफ अटॉर्नी निष्पादित की थी. इसी आधार पर 15 अप्रैल 1996 को विवादित भूमि का एक पंजीकृत विक्रय पत्र वादी के पक्ष में निष्पादित किया गया. वादी का नाम राजस्व अभिलेखों में दर्ज कर लिया गया था, लेकिन वादी महादेव के आवेदन पर बाद में इसे हटा दिया गया, जिसके बाद विवाद उत्पन्न हुआ.
महादेव ने पावर ऑफ अटॉर्नी और विक्रय पत्र को चुनौती देते हुए मूल वाद (Original Suit No. 978 of 1998) दायर किया, जो विचाराधीन रहा. इस बीच, प्रतिवादी संख्या 3 ने उत्तर प्रदेश जमींदारी विनाश और भूमि सुधार अधिनियम की धारा 229-B के तहत घोषणात्मक वाद दायर किया. डिप्टी डिस्ट्रिक्ट मजिस्ट्रेट (सदर), इलाहाबाद ने 11 अगस्त 2011 को दीवानी वाद के लंबित होने के आधार पर वादी के वाद को खारिज कर दिया. इसके खिलाफ कमिश्नर, इलाहाबाद डिवीजन के समक्ष दायर अपील भी 16 अक्टूबर 2021 को खारिज कर दी गई.
कमिश्नर के आदेश के खिलाफ प्रतिवादी संख्या 3 ने एक पुनरीक्षण/समीक्षा आवेदन (Review Application) दाखिल किया, जिसे 16 जुलाई 2024 को स्वीकार कर लिया गया. कमिश्नर ने पुराने आदेशों को रद्द कर दिया और मामले को नए सिरे से निर्णय के लिए बहाल कर दिया. इसके बाद, अपर उप जिलाधिकारी (सदर), प्रयागराज ने 24 अक्टूबर 2025 को वाद को वादी के पक्ष में डिग्री कर दिया.
इस प्रक्रिया के खिलाफ याचिकाकर्ताओं ने राजस्व बोर्ड में रिवीजन दायर किया, जिसे बोर्ड ने 20 अप्रैल 2026 को यह कहते हुए खारिज कर दिया कि चूंकि वाद पर नए सिरे से निर्णय हो चुका है, इसलिए रिवीजन निष्फल हो गया है. इन सभी आदेशों को चुनौती देते हुए याचिकाकर्ताओं ने इलाहाबाद उच्च न्यायालय में यह रिट याचिका (Writ-B No. 3885 of 2026) दायर की.
मामले की सुनवाई के दौरान दोनों पक्षों की ओर से कई महत्वपूर्ण विधिक प्रश्न उठाए गए:
पुनरीक्षण की अधिकारिता: याचिकाकर्ताओं का तर्क था कि कमिश्नर या अपर कमिश्नर के पास अपने ही आदेश की समीक्षा करने की कोई अंतर्निहित शक्ति नहीं है, क्योंकि अधिनियम के तहत ऐसी कोई स्पष्ट शक्ति प्रदत्त नहीं है. दूसरी ओर, प्रतिवादी पक्ष का तर्क था कि नियम 339 (U.P. Zamindari Abolition and Land Reforms Rules, 1952) और यूपी टेनेंसी एक्ट की धारा 274 के साथ पठित धारा 341 के तहत पुनरीक्षण की शक्ति वैधानिक रूप से उपलब्ध है.
Due Diligence का सिद्धांत:
कोर्ट ने इस बात पर जोर दिया कि ऑर्डर XLVII रूल 1 (Order XLVII Rule 1 of CPC) के तहत समीक्षा याचिका तभी स्वीकार की जा सकती है जब कोई नई और महत्वपूर्ण सामग्री या साक्ष्य सामने आए, जिसे उचित सावधानी (Due Diligence) बरतने के बावजूद पहले पेश नहीं किया जा सका था. केवल यह दावा कर देना पर्याप्त नहीं है कि पूर्व में तथ्य की जानकारी नहीं थी.
कोर्ट ने सभी पक्षों की दलीलों को सुनने और कानूनी प्रावधानों का बारीकी से अध्ययन करने के बाद निम्नलिखित निर्देश पारित किए:
समीक्षा की अधिकारिता पर स्थिति स्पष्ट: न्यायालय ने स्पष्ट किया कि नियम 339 और यूपी टेनेंसी एक्ट, 1939 की धारा 274 के तहत राजस्व अदालतों (कमिश्नर स्तर पर भी) को वैधानिक रूप से समीक्षा करने की अधिकारिता प्राप्त है, बशर्ते वह कानून की निर्धारित सीमाओं के भीतर हो. इसलिए कमिश्नर द्वारा समीक्षा याचिका पर विचार करने की अधिकारिता अपने आप में अवैध नहीं थी.
समीक्षा के आदेश में कमियां: न्यायालय ने पाया कि 16 जुलाई 2024 का आदेश पारित करते समय कमिश्नर ने Due Diligence और ऑर्डर XLVII रूल 1 की अनिवार्य शर्तों का उचित परीक्षण नहीं किया था. अतः उस आदेश को कानूनी रूप से टिकाऊ नहीं माना जा सकता.
परिणामी आदेशों (Consequential Orders) का रद्द होना: चूँकि मूल वाद को बहाल करने वाला आदेश ही रद्द कर दिया गया है, इसलिए उसके आधार पर अपर उप जिलाधिकारी द्वारा 24 अक्टूबर 2025 को पारित किया गया डिक्री आदेश भी स्वतः ही प्रभावहीन हो गया. इसके अलावा, राजस्व बोर्ड द्वारा रिवीजन को निष्फल मानकर खारिज करने का 20 अप्रैल 2026 का आदेश भी निरस्त कर दिया.
रिट-बी संख्या 3885 / 2026 (माधव और तीन अन्य बनाम उत्तर प्रदेश सरकार व दो अन्य)