यौन उत्पीड़न का शिकार Teenager को 29 सप्ताह का गर्भ गिराने की इलाहाबाद हाई कोर्ट ने दी अनुमति

Teenager का गर्भपात कराने पर आने वाला समस्त खर्च सरकार द्वारा वहन किया जायेगा. यह मामला यौन उत्पीड़न का शिकार 13 साल की Teenager की प्रेग्नेंसी खत्म करने से जुड़ा था. Teenager की तरफ से दाखिल याचिका के तथ्यों के अनुसार मेडिकल तरीके से प्रेग्नेंसी खत्म करने के लिए 24 सप्ताह का समय पहले ही निकल चुका था. मेडिकल टर्मिनेशन ऑफ प्रेग्नेंसी एक्ट, 1971 की धारा 3(2B) के तहत, प्रयागराज के एडिशनल सेशंस जज / स्पेशल जज (पाक्सो एक्ट) के आदेश पर एक मेडिकल बोर्ड बनाया गया था, जिसे 14.09.2026 तक रिपोर्ट देनी थी, लेकिन कोई रिपोर्ट नहीं दी गई थी.
16 सितंबर को सुनवाई के दौरान कोर्ट ने प्रयागराज के चीफ मेडिकल ऑफिसर को निर्देश दिया था कि वे प्रयागराज के एडिशनल सेशंस जज/स्पेशल जज, पाक्सो एक्ट के 11 सितंबर 2026 के आदेश के मुताबिक, 48 घंटों के अंदर प्रयागराज के चीफ ज्यूडिशियल मजिस्ट्रेट के सामने रिपोर्ट पेश करें.
इसके बाद, प्रयागराज के चीफ ज्यूडिशियल मजिस्ट्रेट, सुप्रीम कोर्ट के ‘X Teenager बनाम प्रिंसिपल सेक्रेटरी हेल्थ एंड फैमिली वेलफेयर डिपार्टमेंट, गवर्नमेंट ऑफ NCT ऑफ दिल्ली और अन्य’ (2023) 9 SCC 433 और ‘X बनाम यूनियन ऑफ इंडिया और अन्य’ 2023 SCC ऑनलाइन SC 1338 मामलों में दिए गए फैसलों और एक्ट, 1971 के प्रावधानों को ध्यान में रखते हुए, मेडिकल तरीके से प्रेग्नेंसी खत्म करने की संभावना पर रिपोर्ट के आधार पर आदेश दें और प्रयागराज के चीफ ज्यूडिशियल मजिस्ट्रेट अगली तय तारीख पर या उससे पहले हमारे सामने रिपोर्ट पेश करें.
कोर्ट ने याचिकाकर्ता Teenager को निर्देश दिया के कि वह 18 सितंबर को प्रयागराज के चीफ ज्यूडिशियल मजिस्ट्रेट के सामने पेश हो. यह निर्देश देने के साथ ही कोर्ट ने सुनवाई के लिए 21 सितंबर को लिस्ट किया था. सोमवार को सुनवाई के दौरान आदेश के पालन में राज्य के कानूनी अधिकारी ने प्रयागराज के मुख्य न्यायिक मजिस्ट्रेट द्वारा सौंपी गई 18 सितंबर की तारीख वाली रिपोर्ट पेश की.
मेडिकल बोर्ड ने Teenager की गर्भावस्था को खत्म करने के पक्ष या विपक्ष में कोई स्पष्ट राय नहीं दी

रिपोर्ट को पढ़ने के बाद कोर्ट ने पाया कि मेडिकल बोर्ड ने Teenager की गर्भावस्था को खत्म करने के पक्ष या विपक्ष में कोई स्पष्ट राय नहीं दी. उसने दर्ज किया है कि भ्रूण जीवन-क्षम होने की अवस्था को पार कर चुका है और चूंकि यह गर्भावस्था उच्च-जोखिम वाली है, इसलिए इसे जारी रखने और खत्म करने दोनों में ही मेडिकल जोखिम शामिल हैं. अदालत को परिस्थितियों पर समग्र रूप से विचार करते हुए कोई निर्णय लेना होगा, जिसमें नाबालिग की कम उम्र और यह तथ्य शामिल है कि गर्भावस्था कथित तौर पर यौन उत्पीड़न का परिणाम है.
रिपोर्ट में गर्भावस्था की अवधि लगभग 29 सप्ताह और 2 दिन बताई गई. नाबालिग का शरीर सामान्य बनावट का बताया गया. उसके आधार कार्ड के अनुसार उसकी उम्र लगभग 13 साल बताई गई है, लेकिन रेडियोलॉजिकल जांच से उसकी उम्र लगभग 16 साल, लेकिन 17 साल से कम होने का संकेत मिलता है.
उसकी मानसिक स्थिति के बारे में, रिपोर्ट में कहा गया था कि नाबालिग गर्भावस्था खत्म करने की प्रक्रिया और उसके नतीजों को समझती है. उसने गर्भावस्था को आगे न बढ़ाने की इच्छा जताई है और कहा है कि इसे जारी रखने से उसके मानसिक स्वास्थ्य को और नुकसान होगा. कोर्ट ने कहा कि गर्भवती Teenager की प्रजनन संबंधी पसंद, शारीरिक स्वायत्तता, गरिमा और मानसिक स्वास्थ्य ‘मेडिकल टर्मिनेशन ऑफ प्रेग्नेंसी एक्ट, 1971’ के तहत महत्वपूर्ण विचारणीय हैं.
सुप्रीम कोर्ट ने ‘X बनाम प्रिंसिपल सेक्रेटरी, हेल्थ एंड फैमिली वेलफेयर डिपार्टमेंट, गवर्नमेंट ऑफ एनसीटी ऑफ दिल्ली और अन्य’ (केस नंबर (2023) 9 SCC 433) मामले में ‘मानसिक स्वास्थ्य’ शब्द का व्यापक अर्थ बताया था. Teenager की उम्र, जिन हालात में गर्भावस्था हुई, उसकी शारीरिक और मानसिक स्थिति और उसके तथा उसके प्राकृतिक अभिभावकों द्वारा स्पष्ट रूप से जताई गई इच्छाओं को ध्यान में रखते हुए कोर्ट इस नतीजे पर पहुंचा कि गर्भावस्था खत्म करने की इजाजत देने से उसका भला होगा.
इसके बाद कोर्ट ने चीफ मेडिकल सुपरिटेंडेंट, एसआरएन हॉस्पिटल, प्रयागराज, उत्तर प्रदेश को निर्देश दिया कि वे नाबालिग याचिकाकर्ता को भर्ती करें और मंगलवार 22 सितंबर को सबसे सुरक्षित और चिकित्सकीय रूप से मान्य प्रक्रिया से गर्भावस्था खत्म करें. राज्य सरकार उसके आने-जाने, इलाज और प्रक्रिया के बाद की देखभाल का सारा खर्च उठाएगी. एसआरएन के सीएमएस अनुपालन रिपोर्ट जमा करेंगे, जिसे अगली तय तारीख से पहले इस कोर्ट में दाखिल किया जाएगा और रिकॉर्ड पर रखा जाएगा. इसके बाद कोर्ट ने सुनवाई की तिथि 29 सितंबर तय की है.