+91-9839333301

legalbulletin@legalbulletin.in

| Register

राहुल गांधी के विदेश में दिए गए Statement पर आपराधिक मुकदमा दर्ज करने की मांग इलाहाबाद हाई कोर्ट ने की खारिज

राहुल गांधी के विदेश में दिए गए Statement पर आपराधिक मुकदमा दर्ज करने की मांग इलाहाबाद हाई कोर्ट ने की खारिज

इलाहाबाद हाई कोर्ट ने लोकसभा में नेता प्रतिपक्ष राहुल गांधी के खिलाफ विदेश में दिए गए एक Statement को लेकर प्रथम सूचना रिपोर्ट दर्ज करने की मांग वाली याचिका को खारिज कर दिया है. अदालत ने स्पष्ट किया है कि किसी जन प्रतिनिधि द्वारा Statement में उठाए गए मुद्दों या सार्वजनिक चिंताओं को केवल इस आधार पर अपराध नहीं माना जा सकता कि उससे कुछ लोग असहमत हैं. जस्टिस विक्रम डी. चौहान की एकल पीठ ने यह महत्वपूर्ण फैसला नागेश्वर मिश्रा और एक अन्य द्वारा दाखिल आवेदन पर सुनवाई करते हुए दिया.  

यह पूरा विवाद राहुल गांधी द्वारा विदेश यात्रा के दौरान सिख समुदाय की सुरक्षा और उनकी धार्मिक स्वतंत्रता (जैसे पगड़ी पहनने और गुरुद्वारे जाने) को लेकर दिए गए एक Statement से जुड़ा है. याचिकाकर्ताओं का आरोप था कि इस प्रकार के Statement से देश की संप्रभुता, एकता और अखंडता को खतरा पैदा होता है तथा इससे अलगाववादी ताकतों को बढ़ावा मिलता है.

इसे भी पढ़ें… गैंगस्टर एक्ट के तहत सिर्फ Gang Chart में मामले होने से अपराध साबित नहीं होता, इलाहाबाद हाईकोर्ट ने रद्द की 24 साल पुरानी कार्यवाही

इस Statement को लेकर वाराणसी की निचली अदालत और पुनरीक्षण न्यायालय में याचिकाएं दायर की गई थीं, जिन्हें पूर्व में खारिज कर दिया गया था. निचली अदालत के आदेश के खिलाफ याचिकाकर्ताओं ने उच्च न्यायालय का दरवाजा खटखटाया था.  

Statement पर आपराधिक मुकदमा दर्ज करने की मांग पर अदालत की टिप्पणियां और कानूनी विश्लेषण:

अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का दायरा: न्यायाधीश ने संविधान के अनुच्छेद 19(1)(ए) के तहत प्रदत्त भाषण (Statement) और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के महत्व पर जोर दिया. कोर्ट ने कहा कि एक स्वस्थ और जीवंत लोकतंत्र में विचारों का स्वतंत्र आदान-प्रदान बेहद जरूरी है. असहमति जताना लोकतंत्र का हिस्सा है, लेकिन केवल विचारों से असंतुष्ट होने के कारण किसी के खिलाफ आपराधिक मुकदमा दर्ज नहीं किया जा सकता. 

इसे भी पढ़ें… Auction में सबसे ऊंची बोली आने के बाद, केवल इस उम्मीद में नीलामी रद्द करना कि भविष्य में इससे अधिक कीमत मिल सकती है, कानून की नजर में अवैध

भारतीय न्याय संहिता (BNS) की धारा 152 पर स्पष्टीकरण: याचिकाकर्ताओं ने इस मामले में BNS की धारा 152 (भारत की संप्रभुता, एकता और अखंडता को खतरे में डालने वाले कृत्य) के तहत कार्रवाई की मांग की थी. इस पर अदालत ने कहा कि धारा 152 के तहत किसी भी अपराध को साबित करने के लिए यह दिखाना आवश्यक है कि कृत्य जानबूझकर और सचेत रूप से देश में अलगाव, सशस्त्र विद्रोह या विध्वंसक गतिविधियों को भड़काने के उद्देश्य से किया गया हो. राहुल गांधी के Statement से ऐसा कोई प्रत्यक्ष परिणाम सामने नहीं आया है.  

जन प्रतिनिधियों की भूमिका: अदालत ने यह भी माना कि एक निर्वाचित सांसद और जन प्रतिनिधि होने के नाते समाज के किसी वर्ग विशेष की चिंताओं को उठाना उनका कर्तव्य है. सार्वजनिक मंचों पर इस प्रकार के विचार रखना सरकार की जवाबदेही तय करने और स्वस्थ संसदीय लोकतंत्र को बनाए रखने में मदद करता है. यदि कोई तीसरा पक्ष ऐसे Statement का अपने राजनीतिक या अन्य स्वार्थों के लिए गलत अर्थ निकालता है, तो उसके कृत्यों के लिए वक्ता को सीधे तौर पर जिम्मेदार नहीं ठहराया जा सकता.

इसे भी पढ़ें… System-generated जीएसटी नोटिस असंवैधानिक, जीएसटी पंजीकरण रद्द करने का आदेश और कारण बताओ नोटिस रद्द

इलाहाबाद हाईकोर्ट ने वाराणसी की अदालत और पुनरीक्षण न्यायालय के उन आदेशों को पूरी तरह से सही ठहराया, जिनमें प्रथम दृष्टया कोई संज्ञेय अपराध न बनते हुए FIR दर्ज करने की मांग को खारिज कर दिया गया था. अदालत ने यह भी टिप्पणी की कि केवल संदेह या वैचारिक असहमति को आपराधिक अभियोजन का आधार नहीं बनाया जा सकता. इन सभी कानूनी पहलुओं और संवैधानिक प्रावधानों को ध्यान में रखते हुए हाई कोर्ट ने धारा 528 बीएनएसएस (पूर्व में CrPC की धारा 482 के समकक्ष) के तहत दाखिल इस याचिका को खारिज कर दिया.

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *