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रेलवे के Casual laborer की 1978 में बर्खास्तगी को चुनौती देने वाली याचिका खारिज, श्रमिक को सेवा में वापस लेने का आदेश बरकरार

रेलवे के Casual laborer की 1978 में बर्खास्तगी को चुनौती देने वाली याचिका खारिज, श्रमिक को सेवा में वापस लेने का आदेश बरकरार

इलाहाबाद हाई कोर्ट ने भारतीय रेलवे प्रशासन को एक बड़े झटके में Casual laborer की बर्खास्तगी से जुड़े मामले में अहम फैसला सुनाया है. जस्टिस इरशाद अली की एकल पीठ ने रेलवे प्रशासन द्वारा दाखिल की गई रिट याचिका को पूरी तरह से खारिज कर दिया है. इसके साथ ही, केंद्रीय सरकार औद्योगिक न्यायाधिकरण-सह-श्रम न्यायालय (कानपुर) द्वारा दिए गए उस पंचाट (Award) को पूरी तरह से बहाल और सही ठहराया है, जिसमें Casual laborer को सेवा में वापस लेने का आदेश दिया गया था.

अदालत के इस फैसले से रेलवे के उस Casual laborer को बड़ी राहत मिली है, जो पिछले कई दशकों से न्याय के लिए संघर्ष कर रहा था. इस कानूनी विवाद की जड़ें काफी पुरानी हैं. विपक्षी पक्ष संख्या-1 (कर्मचारी नसरुद्दीन) को पहली बार 7 दिसंबर 1975 को एक Casual laborer के रूप में नियुक्त किया गया था. वह विभिन्न प्रकार के कार्यों को पूरा करने के लिए जारी किए गए अलग-अलग प्रतिबंधों के तहत टूटे हुए अंतरालों में 27 फरवरी 1978 तक Casual laborer क्षमता में काम करता रहा.

रेलवे का मुख्य तर्क यह था कि कर्मचारी ने किसी भी कैलेंडर वर्ष में 240 दिन की निरंतर सेवा पूरी नहीं की थी, इसलिए वह औद्योगिक विवाद अधिनियम, 1947 की धारा 25-F के तहत मिलने वाले वैधानिक संरक्षण या मुआवजे का हकदार नहीं था. रेलवे की ओर से यह भी दलील दी गई कि कर्मचारी को विशिष्ट प्रकार के कार्यों के लिए सीमित अवधि हेतु रखा गया था और कार्य की समाप्ति के साथ ही उसकी सेवा स्वतः समाप्त हो गई थी.

रेलवे ने यह भी तर्क दिया कि Casual laborer लगभग आठ वर्षों तक बिना किसी सूचना के अनुपस्थित रहा

इसके अलावा, रेलवे ने यह भी तर्क दिया कि Casual laborer लगभग आठ वर्षों तक बिना किसी सूचना के अनुपस्थित रहा, जिससे यह प्रतीत होता है कि उसने या तो नौकरी छोड़ दी थी या कहीं अन्यत्र रोजगार पा लिया था. रेलवे के नियमों और लेखा संहिता के अनुसार भुगतान वाउचर और मस्टर रोल को केवल पांच साल तक सुरक्षित रखने का प्रावधान है, इसलिए लंबे अंतराल के बाद पुराने रिकॉर्ड उपलब्ध नहीं कराए जा सके.

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मामले की सुनवाई के दौरान रेलवे प्रशासन के अधिवक्ता ने न्यायालय के समक्ष जोर देकर कहा कि श्रम न्यायालय ने आठ साल की अत्यधिक और अस्पष्ट देरी को नजरअंदाज करके गंभीर कानूनी भूल की है. उन्होंने ‘सहायक अभियंता, राजस्थान राज्य कृषि विपणन बोर्ड बनाम मोहन लाल’ तथा अन्य महत्वपूर्ण मामलों का हवाला देते हुए कहा कि अत्यधिक विलंब से उठाए गए विवाद में बहाली का आदेश देना न्यायसंगत नहीं है.

दूसरी ओर, कर्मचारी के अधिवक्ता ने इसका कड़ा विरोध किया. उन्होंने तर्क दिया कि Casual laborer ने 22 दिसंबर 1975 से 21 दिसंबर 1976 के बीच लगातार काम करके एक कैलेंडर वर्ष में 240 दिनों से अधिक की सेवा सफलतापूर्वक पूरी कर ली थी. प्रबंधन के अपने गवाह ने भी श्रम न्यायालय के समक्ष रिकॉर्ड के आधार पर यह स्वीकार किया था कि Casual laborer ने 240 दिन पूरे किए थे.

इसके बावजूद रेलवे ने बिना किसी पूर्व नोटिस या वैधानिक retrenchment compensation के 28 फरवरी 1978 को उसकी सेवाएं मौखिक रूप से समाप्त कर दी थीं, जो पूरी तरह से अवैध और मनमानी थीं. कोर्ट ने दोनों पक्षों की दलीलों को विस्तार से सुनने और पत्रावलियों का बारीकी से अध्ययन करने के बाद पाया कि केवल Casual laborer’ या ‘दैनिक वेतन भोगी’ कह देने मात्र से किसी कर्मचारी को औद्योगिक विवाद अधिनियम के सुरक्षात्मक प्रावधानों से वंचित नहीं किया जा सकता.

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अदालत ने स्पष्ट किया कि प्रबंधन यह साबित करने में पूरी तरह विफल रहा कि यह मामला अधिनियम की धारा 2(oo)(bb) के अंतर्गत किसी निश्चित अवधि के अनुबंध के तहत आता था. अदालत ने सुप्रीम कोर्ट के प्रसिद्ध फैसले ‘अजैब सिंह बनाम सरहिंद कोऑपरेटिव मार्केटिंग कम प्रोसेसिंग सर्विस सोसाइटी लिमिटेड’ का हवाला देते हुए रेखांकित किया कि औद्योगिक विवाद अधिनियम के तहत कार्यवाही पर सीधे तौर पर सीमा अधिनियम लागू नहीं होता है.

केवल देरी के आधार पर किसी वैध Casual laborer के अधिकारों को पूरी तरह से नकारा नहीं जा सकता, जब तक कि नियोक्ता द्वारा यह साबित न किया जाए कि उस देरी से उसे कोई वास्तविक और अपूरणीय पूर्वाग्रह हुआ है. इलाहाबाद उच्च न्यायालय ने अपने निर्णय में स्पष्ट किया कि श्रम न्यायालय द्वारा साक्ष्यों के आधार पर निकाले गए निष्कर्षों में किसी भी प्रकार की विकृति, अवैधता या अधिकार क्षेत्र की त्रुटि नहीं पाई गई.

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रेलवे प्रशासन यह साबित करने में असफल रहा कि श्रम न्यायालय का पंचाट कानून की नजर में टिकने योग्य नहीं था. उच्च न्यायालय ने रेलवे की याचिका को पूरी तरह से खारिज कर दिया और केंद्रीय सरकार औद्योगिक न्यायाधिकरण-सह-श्रम न्यायालय, कानपुर द्वारा पारित पंचाट की पुष्टि कर दी.

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