यदि Victim है बालिग और आचरण से उसकी सहमति स्पष्ट है, तो बलात्कार या अपहरण के आरोप में सजा कायम नहीं रखा जा सकता
22 साल पुराने अपहरण के मुकदमे के सभी जीवित आरोपित इलाहाबाद हाई कोर्ट से बरी

इलाहाबाद हाई कोर्ट ने एक महत्वपूर्ण फैसले में कहा है कि किसी मुकदमे में यदि Victim बालिग है और उसकी गतिविधियों व आचरण से उसकी सहमति स्पष्ट होती है, तो बलात्कार या अपहरण के आरोपों में सजा को कायम नहीं रखा जा सकता. वर्ष 2004 की आपराधिक अपील पर सुनवाई करते हुए निचली अदालत के उस फैसले को खारिज कर दिया है जिसके तहत आरोपियों को सजा सुनाई गई थी.
जस्टिस अब्दुल शाहिद ने इस मामले में दोनों आपराधिक अपीलों को स्वीकार करते हुए सभी जीवित अपीलकर्ताओं को उनके ऊपर लगे तमाम आरोपों से दोषमुक्त कर दिया है. यह पूरा मामला अलीगढ़ जिले के गभाना थाने से जुड़ा हुआ है. वर्ष 2002 में सत्र वाद संख्या 65/2002 (राज्य बनाम महेंद्र सिंह व अन्य) के तहत भारतीय दंड संहिता (IPC) की धारा 366 और 376 के अंतर्गत मामला दर्ज किया गया था.
इस मामले में निचली अदालत (विशेष न्यायाधीश/अपर सत्र न्यायाधीश, अलीगढ़) ने 15 जनवरी 2004 को अपना फैसला सुनाया था, जिसके खिलाफ उच्च न्यायालय में आपराधिक अपील संख्या 307/2004 और आपराधिक अपील संख्या 648/2004 दाखिल की गई थीं. चूंकि दोनों अपीलें एक ही सत्र वाद के एक ही निर्णय और आदेश से उत्पन्न हुई थीं, इसलिए उच्च न्यायालय ने दोनों मामलों की एक साथ संयुक्त सुनवाई की.
आपराधिक अपील संख्या 307/2004: यह अपील पांच अपीलकर्ताओं (1) श्रीमती गुद्दी, (2) श्रीमती राज कुमारी उर्फ गुलकंदी, (3) महेंद्र सिंह, (4) जयपाल सिंह और (5) ऋषिपाल—द्वारा दायर की गई थी. विचारणाधीन अपील के दौरान मुख्य अपीलकर्ता महेंद्र सिंह का निधन हो चुका है, जिसके कारण 19 सितंबर 2025 को उनके खिलाफ कार्यवाही पहले ही उपशमित हो चुकी थी.
आपराधिक अपील संख्या 648/2004: यह अपील दो सगे भाइयों—(1) राजू और (2) महेश—द्वारा दायर की गई थी. इनमें से अपीलकर्ता राजू का भी अपील लंबित रहने के दौरान निधन हो गया, जिसके चलते 6 अक्टूबर 2026 को उनके विरुद्ध कार्यवाही भी उपशमित हो चुकी थी. इन सबके पश्चात, यह मामला केवल पांच बचे हुए जीवित अपीलकर्ताओं श्रीमती गुद्दी, श्रीमती राज कुमारी उर्फ गुलकंदी, जयपाल सिंह, ऋषिपाल और महेश तक सीमित रह गया था.
न्यायालय ने अभियोजन पक्ष के साक्ष्यों, चिकित्सीय परीक्षण (मेडिकल और ऑसिफिकेशन टेस्ट) तथा Victim के बयानों का बारीकी से अध्ययन किया. अदालत ने अपने फैसले में निम्नलिखित प्रमुख बिंदुओं को रेखांकित किया:
घटना के समय Victim की आयु लगभग 19 वर्ष से अधिक थी, यानी Victim बालिग थी
Victim की आयु और सहमति: चिकित्सीय ऑसिफिकेशन टेस्ट और अन्य साक्ष्यों के आधार पर यह साबित हुआ कि घटना के समय Victim की आयु लगभग 19 वर्ष से अधिक थी, यानी Victim बालिग थी. अदालत ने माना कि Victim अपनी आयु और कृत्यों की प्रकृति को भली-भांति समझने में सक्षम थी.
चोटों का अभाव: मेडिकल रिपोर्ट के अनुसार Victim के शरीर पर बाहरी या आंतरिक रूप से किसी भी प्रकार की चोट के निशान नहीं पाए गए थे.
परिस्थितियों और बयानों में विरोधाभास: Victim और अन्य गवाहों के बयानों में कई अंतर्विरोध पाए गए. घटना रात्रि करीब 2 बजे की बताई गई, जिसमें Victim का अपनी मर्जी से घर से बाहर जाना, लगभग तीन दिनों तक आरोपियों के साथ रहना और सार्वजनिक स्थान से बरामदगी के दौरान किसी प्रकार का विरोध या शोर न मचाना, सहमति की संभावना को पूरी तरह बल देता है.
कानूनी दृष्टांत: न्यायालय ने उच्चतम न्यायालय के कई पूर्व निर्णयों का हवाला दिया, जिनमें यह स्पष्ट किया गया है कि यदि Victim बालिग है और Victim की गतिविधियों व आचरण से उसकी सहमति स्पष्ट होती है, तो बलात्कार या अपहरण के आरोपों में सजा को कायम नहीं रखा जा सकता.
जस्टिस अब्दुल शाहिद ने साक्ष्यों के अभाव और अभियोजन पक्ष द्वारा आरोपों को संदेह से परे साबित करने में असफल रहने पर निचली अदालत के फैसले को ‘अवैध और विकृत’ करार दिया. अदालत ने दिनांक 15 जनवरी 2004 के उस आदेश को पूरी तरह से रद्द कर दिया और सभी जीवित अपीलकर्ताओं को सभी आरोपों से बरी कर दिया.
न्यायालय ने निर्देश दिया कि अपीलकर्ता जमानत पर हैं, इसलिए दंड प्रक्रिया संहिता (CrPC) की धारा 437ए के अनुपालन के तहत उनके जमानत बांड रद्द कर दिए. इसके साथ ही निचली अदालत के रिकॉर्ड को आवश्यक अनुपालन के लिए वापस भेज दिया गया है.