अवैध संबंध बनाए रखने के लिए तीन बच्चों की हत्या में सजा-ए-मौत (Death penalty) पाने वाली मां और उसका प्रेमी हाई कोर्ट से बरी
इलाहाबाद हाई कोर्ट ने कहा, बाल गवाह के बयान का मुख्य हिस्सा विरोधाभासों से भरा हो तो ऐसे सबूत को अविश्वसनीय मानकर खारिज कर दिया जाना चाहिए

अपने ही तीन मासूम बच्चों को मौत के घाट उतार देने के आरोप में फांसी की सजा (Death penalty) पाने वाली महिला को इलाहाबाद हाई कोर्ट ने सम्मान बरी कर दिया है. कोर्ट ने महिला और उसके प्रेमी दोनों को बरी करने का आदेश दिया है. ट्रायल कोर्ट ने महिला को फांसी (Death penalty) और उसके प्रेमी को उम्र कैद की सजा उसके ही 12 साल के बेटे की गवाही पर सुनायी थी जिसे कोर्ट ने सिखाया-पढ़ाया गया और विरोधाभासों करार दिया.
यह फैसला इलाहाबाद हाई कोर्ट के जस्टिस सिद्धार्थ वर्मा और जस्टिस जय कृष्ण उपाध्याय की बेंच ने आरोपी प्रियंका की ओर से दायर क्रिमिनल (कैपिटल) अपील और आरोपी-अपीलकर्ता आशीष उर्फ डैनी की ओर से दायर जेल अपील को मंजूर करते हुए सुनाया है.
यह कैपिटल केस, औरैया के एडिशनल डिस्ट्रिक्ट एंड सेशंस जज द्वारा दिए गए फैसले और आदेश के खिलाफ दायर किया गया था. अपीलकर्ताओं प्रियंका और आशीष उर्फ डैनी को ट्रायल कोर्ट ने IPC की धारा 302 और धारा 120-B के तहत दोषी ठहराया था और उन्हें उम्रकैद की सजा के साथ 1,00,000 रुपये का जुर्माना लगाया गया था. आरोपी प्रियंका को हत्या के अपराध के लिए मौत की सजा (Death penalty) के साथ एक लाख रुपये का जुर्माना लगाया गया था.
घटना 27.06.2024 को सुबह 5 बजे सामने आयी थी. मामला तीन बच्चों माधव उर्फ गूंगा, आदित्य उर्फ टिल्ला और मंगल की हत्या का था. उनकी मौत की जानकारी पुलिस को ग्राम प्रधान जितेंद्र भूषण ने दी थी. ग्राम प्रधान द्वारा दी गई जानकारी को थाना कोतवाली की G.D. में दर्ज किया गया लेकिन एफआईआर दर्ज नहीं की गयी. पुलिस ने सूचना मिलने पर कार्रवाई शुरू कर दी और पुलिस सेंगुर नदी पुल पहुंच गयी. वहाँ से तीन बच्चों के शव बरामद हुए. पुलिस ने पंचनामा भरने के बाद शवों को पोस्टमार्टम के लिए भेज दिया.
इसी दिन शाम को मारे गए बच्चों के चाचा मनीष की तहरीर पर कोतवाली पुलिस ने एफआईआर दर्ज की. तहरीर में आरोप लगाया गया था कि प्रियंका अपने पति के छोटे भाई आशीष उर्फ डैनी के साथ मिलकर अपने चार बेटों – सोनू, आदित्य, माधव और मंगल को सेंगुर नदी पर बने तालेपुर पुल पर ले जाकर मारने की कोशिश की.
सोनू किसी तरह अपनी माँ और चाचा की कोशिश से बच निकला और वहाँ से भाग गया. बाकी तीन की मौत हो गई. तहरीर में हत्या का कारण अवैध संबंध बताया गया था. तहरीर के अनुसार प्रियंका के पति अवनीश की दो साल पहले मौत हो चुकी थी. वह आशीष उर्फ डैनी से प्यार करती थी. दोनों साथ रहना चाहते थे लेकिन बच्चों से छुटकारा पाना चाहते थे. मनीष के अनुसार यह सारी जानकारी उसे हमले में बचे गये नौ साल के सोनू ने दी थी.
ट्रायल कोर्ट ने महिला अरोपी को Death penalty और उसके प्रेमी को उम्र कैद की सजा सुनाई
रिपोर्ट दर्ज होने के बाद पुलिस ने दोनों आरोपितों को गिरफ्तार कर लिया गया. इसके बाद जांच पूरी करके विवेचना अधिकारी ने कोर्ट में दोनों के खिलाफ चार्जशीट दाखिल की दी. ट्रायल कोर्ट ने इसे संज्ञान लिया और प्रियंका और आशीष उर्फ डैनी के खिलाफ IPC की धारा 302, 307 और 120-B के तहत आरोप तय किए. अभियोजन पक्ष की ओर से कुल 7 गवाहों से पूछताछ की गई. सुनवाई के बाद ट्रायल कोर्ट ने महिला अरोपी को Death penalty और उसके प्रेमी को उम्र कैद की सजा सुनाई. इस Death penalty और उम्र कैद की सजा को इलाहाबाद हाई कोर्ट में चुनौती दी गयी थी.
अपीलकर्ताओं के वकील ने तर्क दिया कि असल में पूरा केस एक बच्चे की गवाही पर टिका हुआ था और भरोसेमंद गवाह नहीं था. बच्चे की घटना स्थल पर मौजूदगी ही संदिग्ध थी. तर्क दिया कि अगर बच्चा घटना स्थल पर होता, तो वह तुरंत अपने चाचा को पूरी घटना बताता और वह मौके पर पहुंच जाते जबकि ऐसा नहीं हुआ.

विवेचना अधिकारी ने कोर्ट में गवाही दी थी कि उन्हें असल में प्रधान जितेंद्र भूषण ने सूचना दी थी. उनका कहना था कि घटनास्थल पर परिवार का कोई सदस्य मौजूद नहीं था. तर्क दिया कि अगर आरोपी माँ ने अपने प्रेमी के साथ मिलकर बच्चों को मारने की योजना बनाई होती, तो वे कभी भी ऐसा गवाह जिंदा नहीं छोड़ते जो बाद में उनके लिए खतरा बन सकता था.
उन्होंने तर्क दिया कि ट्रायल कोर्ट द्वारा विवादित फैसले और आदेश में दर्ज निष्कर्ष गलत और तर्कहीन हैं. किसी ने भी अपीलकर्ताओं को मारे गए बच्चों के साथ नहीं देखा. यह पूरी तरह से आरोपी-अपीलकर्ताओं के खिलाफ बिना किसी सबूत वाला मामला है. यह मामला ‘सबसे दुर्लभ मामलों’ की श्रेणी में नहीं आता है. ट्रायल कोर्ट ने अपीलकर्ता प्रियंका को गलत तरीके से Death penalty सुनाई है.
इसके विपरीत राज्य के अधिवक्ता ने तर्क दिया कि तीनों बच्चों की बेरहमी से हत्या की गई थी. मृतकों के साथ की गई क्रूरता से यह मामला स्पष्ट रूप से ‘दुर्लभतम से दुर्लभ मामले’ की श्रेणी में आता है. आरोपी प्रियंका द्वारा जिस तरह से तीनों बच्चों की हत्या की गई, उससे उसका आचरण, रवैया और तरीका पता चलता है कि अपीलकर्ता समाज के लिए खतरा है और यदि उसे Death penalty नहीं दी जाती है, तो समाज के सदस्य भी सुरक्षित नहीं रह सकते हैं.
दोनों पक्षों के तर्कों को सुनने के बाद कोर्ट ने सबसे पहले बाल गवाह की गवाही पर विचार किया. कोर्ट ने कहा कि भारतीय साक्ष्य अधिनियम, 1872 की धारा 118 गवाहों की योग्यता के संबंध में सामान्य नियम निर्धारित करती है. इसमें प्रावधान है कि सभी व्यक्ति गवाही देने के योग्य होंगे, जब तक कि अदालत यह न माने कि वे कम उम्र, अत्यधिक बुढ़ापे, बीमारी, या इसी तरह के किसी अन्य कारण से उनसे पूछे गए सवालों को समझने या उन सवालों के तर्कसंगत जवाब देने में असमर्थ हैं.
बच्चे के गवाह के तौर पर काबिलियत और उसके मूल्यांकन से जुड़े कानून को सुप्रीम कोर्ट की संविधान पीठ ने ‘रामेश्वर बनाम राजस्थान राज्य’ (AIR 1952 SC 54) मामले में अधिकारिक तौर पर स्पष्ट किया था.
“हर गवाह गवाही देने के लिए काबिल होता है, जब तक कि कोर्ट यह न माने कि कम उम्र, बहुत ज्यादा बुढ़ापे, शरीर या मन की बीमारी या इसी तरह के किसी और कारण से वह उससे पूछे गए सवाल को समझने या समझदारी भरे जवाब देने में असमर्थ है. असल में काबिलियत हमेशा मानी जाती है, जब तक कि कोर्ट कुछ और न माने… यह जरूरी है कि जज और मजिस्ट्रेट हमेशा अपनी राय दर्ज करें कि बच्चा सच बोलने की जिम्मेदारी को समझता है और बताएं कि वे ऐसा क्यों सोचते हैं; वरना गवाह की विश्वसनीयता पर गंभीर असर पड़ सकता है, इतना ज्यादा कि कुछ मामलों में गवाही को पूरी तरह से खारिज करना पड़ सकता है.”
कोर्ट ने अपने फैसले में कई अन्य न्यायिक उदाहरणों के सिद्धांतों का जिक्र किया. बेंच ने कहा कि 8 साल के बच्चे के गवाह की अकेली गवाही में ऐसी विरोधाभासी बातें हैं जिन्हें सुधारा नहीं जा सकता और उसमें सिखाए-पढ़ाए जाने के स्पष्ट संकेत हैं, जिससे इसे सजा का एकमात्र आधार बनाना पूरी तरह से असुरक्षित है. बेंच ने कहा कि अगर प्रधान को पेश किया जाता और उनसे जिरह की जाती, तो उनकी गवाही अभियोजन पक्ष की कहानी का समर्थन नहीं करती या घटना की असली शुरुआत का खुलासा करती जो पुलिस द्वारा बताई गई कहानी से बिल्कुल अलग हो सकती थी.
यह एक स्वीकृत बात है कि जांच में हर छोटी-मोटी चूक का फ़ायदा आरोपी को नहीं मिलता, लेकिन जांच में बड़ी खामियों को केवल प्रशासनिक अनियमितता कहकर नजरअंदाज नहीं किया जा सकता. मौजूदा मामले में, जांच अधिकारी द्वारा की गई चूकें इतनी बुनियादी और व्यापक प्रकृति की हैं कि वे अभियोजन पक्ष के मामले की जड़ पर ही प्रहार करती हैं. विरोधाभासी बयान, प्रधान द्वारा दी गई अर्जी पर FIR दर्ज न करना अभियोजन पक्ष के मामले की जड़ को हिला देती हैं और इसकी विश्वसनीयता पर संदेह पैदा करती हैं.
बेंच ने जजमेंट में कोट कराया
तथ्यों और परिस्थितियों के आलोक में अदालत इस पक्के निष्कर्ष पर पहुँचती है कि अभियोजन पक्ष दोनों आरोपी-अपीलकर्ताओं, यानी प्रियंका (Death penalty) और आशीष उर्फ डैनी के अपराध को किसी भी उचित संदेह से परे साबित करने में बुरी तरह विफल रहा है. ट्रायल कोर्ट का दोषी ठहराने का फैसला एक ऐसे बच्चे गवाह के बयान पर आधारित है जिसकी बात की पुष्टि नहीं हुई है, जिसे सिखा-पढ़ाकर तैयार किया गया था और जिसके बयान में विरोधाभास हैं.