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Family Court के एक्स-पार्टी भरण-पोषण आदेश के खिलाफ सीधे क्रिमिनल रिवीजन पोषणीय नहीं : इलाहाबाद हाई कोर्ट

Family Court के एक्स-पार्टी भरण-पोषण आदेश के खिलाफ सीधे क्रिमिनल रिवीजन पोषणीय नहीं : इलाहाबाद हाई कोर्ट

इलाहाबाद हाई कोर्ट ने आपराधिक मामलों में परिवार अदालत (Family Court) द्वारा पारित एकतरफा (एक्स-पार्टी) आदेशों को लेकर एक अहम कानूनी व्यवस्था दी है. अदालत ने स्पष्ट किया है कि दंड प्रक्रिया संहिता की धारा 125 या भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता की धारा 144 के तहत पारित Family Court के किसी भी एकतरफा भरण-पोषण आदेश के खिलाफ सीधे हाईकोर्ट में दाखिल की गई आपराधिक पुनर्विचार याचिका पोषणीय नहीं होगी.

यह आदेश जस्टिस प्रवीन कुमार गिरि की एकल पीठ ने ‘हाफिज मोहम्मद हारिश बनाम उत्तर प्रदेश राज्य व अन्य’ (Criminal Revision No. 3845 of 2026) के मामले की सुनवाई करते हुए पारित किया है. मामला आगरा स्थिति Family Court का है, जहाँ पत्नी (श्रीमती माबिया) द्वारा अपने पति हाफिज मोहम्मद हारिश के खिलाफ भरण-पोषण की याचिका (Criminal Misc. Case No. 3171 of 2024) दाखिल की गई थी.

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इस याचिका पर सुनवाई करते हुए प्रधान न्यायाधीश, Family Court, आगरा ने 30 मार्च 2026 को पति के अनुपस्थित रहने पर एकतरफा निर्णय सुनाते हुए भरण-पोषण की अर्जी स्वीकार कर ली थी. Family Court के इस एकतरफा फैसले और आदेश को रद्द (Quash) कराने तथा विचारण न्यायालय की आगे की कार्यवाही पर रोक लगाने की मांग को लेकर पति ने इलाहाबाद हाईकोर्ट में आपराधिक पुनर्विचार याचिका दाखिल की. सुनवाई के दौरान रिवीजनकर्ता (पति) के अधिवक्ता ने अदालत को सूचित किया कि वह इस याचिका को गुण-दोष (Merit) के आधार पर बल नहीं देना चाहते.

उन्होंने कहा कि कानून में एकतरफा आदेश को वापस लेने के लिए संबंधित विचारण न्यायालय (ट्रायल कोर्ट) के समक्ष आवेदन दाखिल करने का स्पष्ट प्रावधान मौजूद है, और याचिकाकर्ता अब उसी विकल्प को चुनना चाहता है. राज्य सरकार की ओर से पेश हुए राज्य विधि अधिकारी ने कोर्ट को बताया कि भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता (BNSS) की धारा 145(2) [तत्कालीन CrPC की धारा 126(2)] के तहत पीड़ित पक्ष को यह अधिकार प्राप्त है कि वह एकतरफा आदेश के खिलाफ उसी अदालत में रिकॉल एप्लीकेशन दाखिल कर सकता है.

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अतः, जब कानून में एक प्रभावी और वैकल्पिक वैधानिक उपाय उपलब्ध है, तो हाईकोर्ट के समक्ष क्रिमिनल रिवीजन पोषणीय नहीं है. राज्य पक्ष ने हाईकोर्ट के पूर्व निर्णयों (‘अनुप कुमार बनाम प्रतिभा कुशवाहा’ व ‘अभिषेक गोंड बनाम उत्तर प्रदेश राज्य’) का भी हवाला दिया, जिनमें समान कानूनी सिद्धांत को बरकरार रखा गया था.

अदालत ने CrPC की धारा 126(2) और BNSS की धारा 145(2) के प्रावधानों पर गौर करते हुए कहा कि कानून में स्पष्ट रूप से उल्लेख है कि यदि मजिस्ट्रेट या Family Court इस बात से संतुष्ट है कि पक्षकार जानबूझकर समन की तामीली से बच रहा है या कोर्ट में उपस्थित नहीं हो रहा है, तो वह एकतरफा सुनवाई कर सकता है. हालाँकि, यदि प्रभावित पक्षकार आदेश की तारीख से 90 दिनों (तीन माह) के भीतर उचित कारण दर्शाते हुए आवेदन दाखिल करता है, तो कोर्ट उस एकतरफा आदेश को रद्द या निरस्त कर सकता है.

रिवीजनकर्ता के पास Family Court के समक्ष धारा 126(2) CrPC / 145(2) BNSS के तहत रिकॉल अर्जी दाखिल करने का स्पष्ट और प्रभावी विकल्प उपलब्ध

जस्टिस प्रवीन कुमार गिरि ने अपने फैसले में कहा कि चूंकि रिवीजनकर्ता के पास Family Court के समक्ष धारा 126(2) CrPC / 145(2) BNSS के तहत रिकॉल अर्जी दाखिल करने का स्पष्ट और प्रभावी विकल्प उपलब्ध है, इसलिए इस स्तर पर हाईकोर्ट में दाखिल पुनर्विचार याचिका पोषणीयता के आधार पर खारिज की जाती है. अदालत ने याचिकाकर्ता को यह छूट भी दी कि यदि वह चाहे तो नियमानुसार निचली अदालत के समक्ष अपनी शिकायत दर्ज कराने हेतु वैधानिक कदम उठा सकता है.

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इलाहाबाद हाईकोर्ट के इस निर्णय से पारिवारिक विवादों और भरण-पोषण मामलों से जुड़े मुकदमों में एक स्पष्ट कानूनी दिशा तय हुई है. प्रायः यह देखा जाता है कि ट्रायल कोर्ट द्वारा एकतरफा फैसला सुनाए जाने के तुरंत बाद पक्षकार हाईकोर्ट का दरवाजा खटखटाते हैं, जिससे उच्च न्यायालयों पर मुकदमों का बोझ बढ़ता है. हाईकोर्ट के इस कड़े और स्पष्ट रुख से अब पक्षकारों को पहले संबंधित Family Court या मजिस्ट्रेट कोर्ट में ही जाकर उचित कारण बताकर आदेश रिकॉल कराने की प्रक्रिया पूरी करनी होगी.

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