Final Report पेश होने पर Judicial Magistrate के पास एक विकल्प यह है कि वह कोड की धारा 190(1)(b) के तहत अपराध का संज्ञान ले और प्रक्रिया शुरू करे
इलाहाबाद हाई कोर्ट ने औरैया के सेशंस जज के आदेश को रद किया, कहा, Judicial Magistrate के आदेश में कोई खामी नहीं

पुलिस की तरफ से Final Report पेश होने पर Judicial Magistrate के पास उपलब्ध विकल्पों में से एक विकल्प यह है कि वह कोड की धारा 190(1)(b) के तहत अपराध का संज्ञान ले और प्रक्रिया शुरू करे, भले ही पुलिस रिपोर्ट में यह निष्कर्ष निकाला गया हो कि आरोपी के खिलाफ कोई मामला नहीं बनता है. कोड की धारा 190(1)(b) के तहत संज्ञान लेते समय, Judicial Magistrate को कोड की धारा 200 और 202 में निर्धारित प्रक्रिया का पालन करने की आवश्यकता नहीं है.
संज्ञान लेने और समन जारी करने के चरण में, Judicial Magistrate को केवल इस बात का निर्धारण करने के लिए अपने न्यायिक दिमाग का उपयोग करना होता है कि क्या आरोपी व्यक्तियों के खिलाफ कार्यवाही करने और उन्हें समन करने के लिए प्रथम दृष्टया मामला बनता है. इस चरण में, Judicial Magistrate को न तो आरोपी की ओर से पेश किए गए बचाव पक्ष के संस्करण, सामग्री या दलीलों पर विचार करने की आवश्यकता है और न ही रिकॉर्ड पर उपलब्ध सामग्री या सबूतों के गुण-दोष का विस्तृत मूल्यांकन करने की आवश्यकता है.
औरैया के Judicial Magistrate का आदेश रीइंस्टेट
सुप्रीम कोर्ट द्वारा विभिन्न फैसलों में दी गयी इस व्यवस्था को नजीर मानते हुए इलाहाबाद हाई कोर्ट के जस्टिस संदीप जैन की बेंच ने औरैया के सत्र न्यायाधीश द्वारा आपराधिक पुनरीक्षण संख्या 48/2019 में 15.07.2019 को पारित विवादित आदेश को रद्द कर दिया है और औरैया के Judicial Magistrate द्वारा 10.01.2019 को पारित आदेश के तहत प्रतिवादी को मुकदमे का सामना करने के लिए समन जारी करने का आदेश को रीइंस्टेट कर दिया है.
भारत के संविधान के अनुच्छेद 227 के तहत दायर की गयी इस याचिका में औरैया के सेशंस जज द्वारा क्रिमिनल रिविजन नंबर 48/2019 (सतेंद्र उर्फ चुनमुन बनाम जीतू सोनी और अन्य) में 15.07.2019 को पारित आदेश को रद्द करने की मांग की गई थी. तथ्यों के अनुसार याचिकाकर्ता जीतू सोनी ने 18.03.2015 को थाना बिधूना जिला औरैया में FIR दर्ज कराई.
इसे IPC की धारा 307 के तहत केस क्राइम नंबर 163/2015 के रूप में दर्ज किया गया. इसमें सतेंद्र उर्फ चुनमुन और नारायण को नामजद किया गया था. आरोप लगाया गया था कि शिकायतकर्ता अपने पिता और भाइयों के साथ अपनी ज्वैलरी की दुकान बंद करके घर लौट रहा था आरोपित लाल रंग की बाइक से आए और उसके भाई अनिल सोनी को मारने के इरादे से उस पर गोली चलाई. घटना में उसका भाई जख्मी हो गया. घटना का कारण पुरानी रंजिश बताया गया था.

विवेचना अधिकारी ने जांच के बाद इस मामले में चार्जशीट के स्थान पर Final Report लगा दी. इसकी जानकारी होने पर शिकायतकर्ता ने प्रोटेस्ट पिटीशन दायर की. औरैया के Judicial Magistrate ने विरोध याचिका CrPC की धारा 190(1)(b) के तहत संज्ञान लिया और Final Report स्वीकार करके केस बंद करने के स्थान पर आरोपितों को ट्रायल का सामना करने के लिए तलब किया.
आरोपी सतेंद्र उर्फ चुनमुन ने क्रिमिनल रिवीजन नंबर 48/2019 (सतेंद्र उर्फ चुनमुन बनाम जीतू सोनी और अन्य) दायर करके इस आदेश को चुनौती दी. औरैया के सेशंस जज ने 15.07.2019 के आदेश से रिवीजन को मंजूरी दे दी, मुख्य रूप से इस आधार पर कि Judicial Magistrate ने कोई खास निष्कर्ष दर्ज नहीं किया था कि केस डायरी में उपलब्ध सामग्री के आधार पर आरोपी के खिलाफ IPC की धारा 307 के तहत अपराध बनता है.
रिविजनल कोर्ट की राय थी कि Judicial Magistrate ने कानून द्वारा निर्धारित प्रक्रिया का पालन नहीं किया था और इसलिए, रिविजनल आदेश में की गई टिप्पणियों के आलोक में मामले को नए सिरे से विचार करने के लिए Judicial Magistrate के पास वापस भेज दिया. इसके बाद यह रिट याचिका दाखिल की गयी.
सुनवाई के दौरान दोनों पक्षों की ओर से विभिन्न हाई कोर्ट और सुप्रीम कोर्ट के निर्णयों का हवाला दिया गया और रिट याचिका को खारिज करने का आग्रह किया. कोर्ट ने रिकॉर्ड पर उपलब्ध तथ्यों को परखने के बाद कहा कि रिकॉर्ड पर मौजूद सामग्री से यह स्पष्ट है कि केस डायरी में IPC की धारा 307 के तहत दंडनीय अपराध के होने का संकेत देने वाली पर्याप्त सामग्री मौजूद थी.
बेंच ने कहा कि समन जारी करने के चरण में, आरोपियों के बचाव पक्ष की जांच या उस पर निर्णय लेने की आवश्यकता नहीं होती है. Judicial Magistrate ने रिकॉर्ड पर मौजूद सामग्री, जिसमें चोट की रिपोर्ट और CrPC की धारा 161 के तहत दर्ज घायल और शिकायतकर्ता के बयान शामिल हैं, पर विचार करने के बाद, सही ढंग से Final Report को स्वीकार करने से इनकार कर दिया और CrPC की धारा 190(1)(b) के तहत निहित शक्ति का प्रयोग करते हुए आरोपियों को IPC की धारा 307 के तहत दंडनीय अपराध के लिए मुकदमे का सामना करने के लिए समन जारी करने की कार्यवाही की.
तथ्यों और परिस्थितियों को देखते हुए, यह न्यायालय पाता है कि रिविजनल कोर्ट ने Judicial Magistrate द्वारा पारित आदेश में हस्तक्षेप करने में गलती की है. Judicial Magistrate द्वारा पारित आदेश में ऐसी कोई अवैधता या विकृति नहीं है जिसके लिए रिविजनल कोर्ट द्वारा हस्तक्षेप की आवश्यकता हो.