20 साल के आसपास की उम्र में Youth अक्सर नासमझी में गलतियाँ कर बैठते हैं, ऐसी गलतियों को अक्सर माफ किया जा सकता है
मुकदमे की जानकारी न देने के आधार पर सेवा से बर्खास्त किये गये पुलिस आरक्षी को बहाल करने के सिंगल बेंच के आदेश के खिलाफ सरकारी अपील खारिज

20 साल के आसपास की उम्र में Youth अक्सर नासमझी में गलतियाँ कर बैठते हैं. Youth की ऐसी गलतियों को अक्सर माफ किया जा सकता है. Youth में तो ऐसी गलतियाँ होती ही हैं. Youth से यह उम्मीद नहीं की जा सकती कि वे बड़ों की तरह समझदारी से व्यवहार करें. हमारा नजरिया यह होना चाहिए कि Youth की छोटी-मोटी गलतियों को माफ कर दिया जाए, न कि उन्हें जीवन भर के लिए अपराधी करार दिया जाए.
सुप्रीम कोर्ट द्वारा विभिन्न केसेज में दी गयी इस व्यवस्था को नजीर मानते हुए इलाहाबाद हाई कोर्ट के जस्टिस जेजे मुनीर और जस्टिस इन्द्रजीत शुक्ला की बेंच ने राज्य सरकार की उस अपील को खारिज कर दिया है जिसमें मुकदमा दर्ज होने की जानकारी न देने के आधार पर Youth पुलिस आरक्षी की नियुक्ति निरस्त करने के फैसले का इलाहाबाद हाई कोर्ट की सिंगल बेंच ने रद्द करते हुए उसे सेवा में वापस लेने का आदेश दिया था.
यह स्पेशल अपील उत्तर प्रदेश राज्य की तरफ से सचिव के माध्यम से दाखिल की गयी थी. इसमें सिंगल बेंच के जस्टिस सभाजीत यादव के 10.05.2013 के उस फैसले और आदेश को चुनौती दी गयी थी जिसमें रिट-A नंबर 3021/2001 को मंजूरी दी गई थी. इस फैसले में अपीलकर्ताओं द्वारा जारी 24.03.2001 और 31.01.1998 के आदेशों को सिंगल बेंच ने रद्द कर दिया गया था और याचिकाकर्ता (Youth) को सेवा में निरंतरता के साथ बहाल करने का आदेश दिया गया था.
Youth का चयन अलीगढ़ जिले में आयोजित भर्ती प्रक्रिया में सिविल पुलिस में कॉन्स्टेबल के पद पर हुआ था
स्पेशल अपील के प्रतिवादी (Youth) का चयन अलीगढ़ जिले में आयोजित भर्ती प्रक्रिया में सिविल पुलिस में कॉन्स्टेबल के पद पर हुआ था. चयन के बाद, उन्हें अलीगढ़ में ही कॉन्स्टेबल के तौर पर नियुक्त किया गया. नियुक्ति के बाद, पुलिस मुख्यालय, इलाहाबाद के आदेश के तहत, Youth को ट्रेनिंग के लिए अन्य चयनित उम्मीदवारों के साथ फिरोजाबाद ट्रांसफर कर दिया गया. पुलिस लाइंस, फिरोजाबाद में ड्यूटी जॉइन करने के बीस दिन बाद, याचिकाकर्ता को सेवा से हटा दिया गया.
इसका आधार यह बताया गया कि उनके चयन और नियुक्ति से पहले Youth के खिलाफ एक आपराधिक मामला लंबित था, जिसकी जानकारी उन्होंने नहीं दी थी. याचिकाकर्ता Youth का कहना था कि चयन के बाद, अलीगढ़ के SSP द्वारा उनके चरित्र की जांच की गई थी. SSP ने उनकी नियुक्ति की सिफारिश की थी क्योंकि वे किसी ऐसे आपराधिक मामले में शामिल नहीं थे जिसमें ‘नैतिक अधमता’ शामिल हो.

याचिकाकर्ता केस क्राइम नंबर 932/1995 (स्टेट बनाम राकेश व अन्य) में शामिल थे, जो IPC की धाराओं 147, 148, 149, 323, 325 के तहत थाना डिबाई जिला बुलंदशहर में दर्ज था. इस मामले में दोनों पक्षों के बीच समझौते के आधार पर ट्रायल कोर्ट ने याचिकाकर्ता को बरी कर दिया था.
सिंगल जज ने इस कोर्ट की बेंच के ‘अवधेश कुमार शर्मा बनाम भारत संघ और अन्य’ (2000 (2) AWC 1073) मामले के फैसले पर ध्यान दिया, जिसमें यह कहा गया है कि जब याचिकाकर्ता को आपराधिक मामले में बरी कर दिया जाता है, तो कानून के तहत यह माना जाना चाहिए कि असल में वह कभी ऐसे किसी मामले में शामिल नहीं था, क्योंकि अदालतों के फैसले हमेशा पिछली तारीख से लागू होते हैं.
सिंगल जज ने माना कि अवधेश कुमार शर्मा मामले में डिवीजन बेंच का फैसला इस कोर्ट के लिए बाध्यकारी है और पूरी तरह से याचिकाकर्ता के मामले पर लागू होता है. जज की राय थी कि फिरोजाबाद के पुलिस अधीक्षक द्वारा 24.03.2001 को पारित आदेश, जिसमें याचिकाकर्ता Youth के अभ्यावेदन को खारिज कर दिया गया था और पुलिस मुख्यालय, इलाहाबाद द्वारा 31.01.1998 को पारित आदेश, जिसमें याचिकाकर्ता की नियुक्ति रद्द कर दी गई थी, उन्हें बरकरार नहीं रखा जा सकता और उन्हें रद्द किया जाना चाहिए.
याचिकाकर्ता को बिना किसी बकाया वेतन के, निरंतरता के साथ सेवा में बहाल करने का निर्देश दिया. स्पेशल अपील की सुनवाई के दौरान स्टेट का पक्ष रखते हुए स्टेट के स्थायी अधिवक्ता ने तर्क दिया कि पुलिस कांस्टेबल के पद के लिए दावा करते समय याचिकाकर्ता द्वारा अपने खिलाफ लंबित आपराधिक मामले का खुलासा न करना और इसके बजाय हलफनामे पर यह कहना कि उनके खिलाफ कोई मामला लंबित नहीं था रिट याचिकाकर्ता को सेवा में नियुक्ति के लिए अयोग्य बनाता है.
आपराधिक मामले में शामिल होने के कारण रिट याचिकाकर्ता Youth का चरित्र बेदाग नहीं है और यदि रिट याचिकाकर्ता ने इस तथ्य का खुलासा किया होता तो भी उन्हें अयोग्य घोषित कर दिया जाता. आपराधिक मामले में बरी होना समझौते के आधार पर हुआ है और इससे रिट याचिकाकर्ता के चरित्र और प्रतिष्ठा पर लगे दाग नहीं मिटते.
याचिकाकर्ता के वकील का कहना था कि जब रिट याचिकाकर्ता ने पुलिस कांस्टेबल के रूप में भर्ती के लिए आवेदन किया था, तो उन्हें आपराधिक मामले के बारे में कोई जानकारी नहीं थी, क्योंकि यह मामला उस समय का है जब रिट याचिकाकर्ता नाबालिग थे. यह बात सच है कि समझौता करते समय वह बालिग हो चुका था, जिसके कारण उसे बरी कर दिया गया, उसे इस बात का पता समझौता होने से सिर्फ 2-3 दिन पहले ही चला था.
दोनों पक्षों के वकीलों की बात सुनने और सुप्रीम कोर्ट से लेकर हाई कोर्ट की डबल बेंच द्वारा सिमिलर मामले में दिये गये फैसले और आदेश को देखते हुए बेंच ने कहा कि Youth अक्सर नासमझी में गलतियाँ करते हैं, जिन्हें अक्सर माफ कर दिया जाता है. इसे सुप्रीम कोर्ट ने भी माना है. इस स्थिति में भले ही याचिकाकर्ता को पता होता, फिर भी आरोपों की प्रकृति, उस पर लगे आरोप और सभी परिस्थितियों को देखते हुए, यह ऐसा मामला नहीं होता जिसमें उसकी उम्मीदवारी रद्द की जानी चाहिए और नौकरी देने से इनकार किया जाना चाहिए.