School Uniform के साथ हिजाब पहनने का अधिकार संविधान के अनुच्छेद 19(1)(ए) के तहत गारंटीकृत नहीं
इलाहाबाद हाई कोर्ट ने स्कूल Uniform के चलते छात्रा को स्कूल में प्रवेश न देने के फैसले को सही ठहराया, याचिका खारिज

इलाहाबाद हाईकोर्ट ने स्कूल Uniform के साथ हेडस्कार्फ (हिजाब) पहनकर स्कूल आने की मांग में दाखिल 11वीं की छात्रा की याचिका को खारिज कर दिया है. कोर्ट ने कहा कि स्कूल छात्रा की आस्था पर कोई रोक नहीं लगा रहा, बल्कि केवल संस्थागत अनुशासन और Uniform के पालन की अपेक्षा कर रहा है. ऐसी स्थिति में स्कूल को बाध्य नहीं किया जा सकता कि वह किसी एक छात्रा के लिए अलग से नियम बनाए. यह आदेश जस्टिस जेजे मुनीर और जस्टिस इंद्रजीत शुक्ला ने प्रयागराज के टैगोर पब्लिक स्कूल की एक नाबालिग छात्रा सुकैना रिजवी की याचिका खारिज करते हुए हुए सुनाया है.
याचिकाकर्ता कक्षा-10 पास कर चुकी थी और कक्षा-11 में उसी स्कूल में दाखिला चाहती थी. उसका कहना था कि वह कक्षा-6 से ही स्कार्फ पहनकर पढ़ती आई है और स्कूल ने कभी आपत्ति नहीं जताई, लेकिन अब कक्षा-11 में दाखिले के वक्त स्कूल प्रशासन ने स्कार्फ पहनने पर आपत्ति जताते हुए दाखिला देने से इनकार कर दिया.
याचिका के अनुसार याचिकाकर्ता मुस्लिम शिया समुदाय से है. याचिकाकर्ता की ओर से उसके अधिवक्ता ने तर्क दिया कि उसे स्कार्फ पहनने का मौलिक अधिकार है. वह बचपन से ही स्कार्फ पहनती आ रही हैं और इसके बिना उन्हें अच्छा महसूस नहीं होता. इसलिए, उसने स्कूल से अनुरोध किया कि उसे Uniform के साथ हेडस्कार्फ पहनने की अनुमति दी जाए.
दलील दी कि स्कूल की ओर से पहली बार Uniform ड्रेस कोड निर्धारित करने का कोई औचित्य नहीं था, जब उसने 11वीं कक्षा में प्रवेश मांगा और उस ड्रेस कोड के तहत, याचिकाकर्ता को स्कार्फ पहनने से मना कर दिया. इसके विपरीत औपचारिक और सभ्य पोशाक पहनने की अनुमति दी गई थी, जहां छात्राएं कोई भी भारतीय/पश्चिमी गैर-दिखावटी पोशाक पहन सकती थीं.
याचिकाकर्ता का कहना है कि हेडस्कार्फ पहनने का उसका अधिकार संविधान के अनुच्छेद 19(1)(ए) के तहत गारंटीकृत अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के हिस्से के रूप में संरक्षित है. उसे सिर पर स्कार्फ पहनकर उचित कपड़े पहनने से नहीं रोका जा सकता, क्योंकि उसे अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का अधिकार है.
तर्क दिया गया कि स्कूल द्वारा लगाए गए प्रतिबंध याचिकाकर्ता की गरिमा और शारीरिक अखंडता के अधिकार को प्रभावित करते हैं. उनका कहना है कि स्कूल द्वारा प्रतिबंधित हेडस्कार्फ सभ्य है और यह नहीं कहा जा सकता कि स्कूल द्वारा लगाया गया यह प्रतिबंध किसी भी तरह से उचित है. बल्कि स्कूल की कार्रवाई भेदभावपूर्ण है और कानून के अनुरूप नहीं है.
स्कार्फ पहनना याचिकाकर्ता की एक आवश्यक धार्मिक प्रथा थी और उसे अपनी पोशाक के हिस्से के रूप में इसे पहनने से रोकना, संविधान के अनुच्छेद 14 और 19(1)(ए) के तहत गारंटीकृत उसके मौलिक अधिकारों का उल्लंघन था. याचिकाकर्ता ने हेडस्कार्फ पहनने की अनुमति की मांग में यह रिट याचिका दाखिल की.
डीआईओएस ने स्कूल Uniform से जुड़े मसले की जांच के लिए एडीआईओएस को नियुक्त किया और रिपोर्ट देने के लिए कहा
याचिका में दर्ज कराये गये तथ्यों के अनुसार छात्रा ने पहले इसकी शिकायत जिलाधिकारी से की. इस पर डीएम ने डीआईओएस (जिला विद्यालय निरीक्षक) से रिपोर्ट मांगी. डीआईओएस ने स्कूल Uniform से जुड़े मसले की जांच के लिए एडीआईओएस को नियुक्त किया और रिपोर्ट देने के लिए कहा.

एडीआईओएस के जवाब मांगने पर स्कूल प्रिंसिपल ने स्पष्ट किया कि यह सह-शिक्षा संस्थान है. जहां सभी छात्रों के लिए Uniform ड्रेस कोड लागू है. किसी एक छात्रा को अलग छूट देने से स्कूल की व्यवस्था प्रभावित होगी. कोर्ट ने कहा कि जब तक ड्रेस कोड एकसमान, नेकनीयती से बना और गैर-भेदभावपूर्ण है, तब तक Uniform तय करना स्कूल प्रशासन के अधिकार क्षेत्र में आता है. पहले स्कार्फ पहनने की अनुमति मिलने से यह स्थायी अधिकार नहीं बन जाता कि स्कूल भविष्य में भी उसे बाध्य हो.
कोर्ट ने यह भी कहा कि याचिका में यह साबित करने के लिए कोई ठोस सामग्री या धार्मिक ग्रंथों का हवाला नहीं दिया गया कि स्कार्फ पहनना इस्लाम का “अनिवार्य धार्मिक आचरण” है. इस आधार पर अनुच्छेद 25 के तहत संरक्षण का दावा स्वीकार नहीं किया जा सका. कोर्ट ने केरल हाईकोर्ट बॉम्बे हाईकोर्ट और कर्नाटक हाईकोर्ट की फुल बेंच के प्रसिद्ध “रेशम” फैसले का उल्लेख किया, जिनमें भी यही सिद्धांत दोहराया गया था कि निजी स्कूल अपनी Uniform नीति खुद तय कर सकते हैं और हिजाब को अनिवार्य धार्मिक प्रथा नहीं माना गया.
सुप्रीम कोर्ट में “आयशा शिफा बनाम कर्नाटक राज्य” मामले में दो जजों की राय बंटी हुई थी, इसलिए इस मुद्दे पर अभी कोई अंतिम फैसला नहीं आया है. कोर्ट ने कहा कि स्कूल छात्रा की आस्था पर कोई रोक नहीं लगा रहा, बल्कि केवल संस्थागत अनुशासन और Uniform के पालन की अपेक्षा कर रहा है. इसी आधार पर याचिका खारिज कर दी गई.
यह सच है कि यह कोर्ट, संविधान के आर्टिकल 226 के तहत अपने अधिकार क्षेत्र का इस्तेमाल करते हुए, नागरिकों के मौलिक अधिकारों को लागू करने के लिए कदम उठा सकता है, अगर उनका खुलेआम उल्लंघन हुआ हो. लेकिन जिन मामलों में हमें ऐसा कोई उल्लंघन नहीं दिखता, जैसे कि Uniform ड्रेस कोड का पालन करना—जो कि Uniform पहनने वाले छात्रों के लिए स्कूल के अनुशासन का हिस्सा है—वहां यह कोर्ट पॉलिसी बनाने वाले (यानी स्कूल) की राय के बजाय अपनी राय थोपने से बचेगा.
स्कूल में छात्रों के लिए तय Uniform कई मकसद पूरे करती है. यह अनुशासन और बच्चों के बीच समानता लाती है, संस्थान की पहचान दिखाती है और क्लासरूम में भेदभाव को खत्म करती है. छात्रों के लिए Uniform पहनने का नियम एक ऐसा माहौल बनाता है जो किसी धर्म के पक्ष में नहीं होता, क्योंकि यह अलग-अलग धर्मों को मानने वाले छात्रों पर समान रूप से लागू होता है और किसी को उसके धर्म के आधार पर अलग नहीं करता.
प्रदीप कुमार श्रीवास्तव बनाम मानव संसाधन विकास मंत्रालय, नई दिल्ली और अन्य (2014:AHC:79135-DB) मामले में, इस कोर्ट की एक डिवीजन बेंच के सामने एक याचिकाकर्ता की अपील आई थी. उसने जनहित में यह अपील की थी और उस स्कूल के तय ड्रेस कोड पर आपत्ति जताई थी, जिसमें लड़कियों की Uniform में स्कर्ट शामिल थी. प्रदीप कुमार श्रीवास्तव मामले में PIL याचिकाकर्ता की दलील को खारिज करते हुए डिवीजन बेंच ने कहा:
“हमें उन सोच के बारे में अपनी नाराजगी जाहिर करनी चाहिए जिनकी वजह से यह याचिका दायर की गई है. छात्राओं के लिए ऐसे Uniform में कुछ भी गलत नहीं है जिसमें स्कर्ट पहनने की इजाजत हो, बशर्ते संबंधित शिक्षा अधिकारी मानते हों कि ऐसा ड्रेस कोड सही है. अगर कोई बदलाव लाना है, तो वह उन लोगों की सोच में लाया जाना चाहिए जो ऐसे ड्रेस कोड की शिकायत करते हैं, न कि खुद ड्रेस कोड को बदलकर. याचिकाकर्ता ने स्कूल के बच्चों की शिक्षकों के साथ ग्रुप फोटो भी जमा की है. हमारी राय में, यह याचिका कोर्ट की प्रक्रिया का पूरी तरह से गलत इस्तेमाल है.”