राष्ट्रपति की पूर्व स्वीकृति के बिना पारित यूपी का Tenancy विनियमन कानून 2021 आंशिक रूप से असंवैधानिक करार

इलाहाबाद हाईकोर्ट ने उत्तर प्रदेश शहरी परिसर Tenancy विनियमन अधिनियम, 2021 की धारा 8, 9, 10, 38 और 42 को असंवैधानिक घोषित कर दिया है. यह फैसला इंदर भूषण सावनी बनाम कंचन कुमारी जैन और अन्य की याचिका सहित कुल 16 याचिकाओं को एक साथ सुनवाई के बाद आया है. यह फैसला जस्टिस सौमित्र दयाल सिंह और जस्टिस स्वरूपमा चतुर्वेदी की खंडपीठ ने सुनाया है.
याचिकाकर्ताओं की ओर से तर्क दिया गया कि यह Tenancy कानून राष्ट्रपति की पूर्व स्वीकृति के बिना पारित किया गया, जबकि यह विषय समवर्ती सूची की प्रविष्टि 6, 7 और 13 से संबंधित है, न कि राज्य सूची की प्रविष्टि 18 से. कोर्ट ने माना कि भवन-किरायेदारी (Tenancy) संबंधी कानून बनाने की शक्ति संविधान की सातवीं अनुसूची की समवर्ती सूची की प्रविष्टि 6, 7 और 13 से मिलती है, राज्य सूची की प्रविष्टि 18 से नहीं. यह सिद्धांत सुप्रीम कोर्ट के इंदु भूषण बोस मामले (1969) पर आधारित है.
Tenancy निर्धारण/संशोधन (धारा 8-10) और बेदखली के नए आधार, संपत्ति हस्तांतरण कानून के प्रावधानों से सीधे टकराते हैं

चूंकि यह कानून समवर्ती सूची के विषय पर बना, इसलिए संपत्ति हस्तांतरण अधिनियम और प्रांतीय लघुवाद न्यायालय अधिनियम से टकराव की स्थिति में इसे राष्ट्रपति की स्वीकृति आवश्यक थी, जो नहीं ली गई. कोर्ट ने पाया कि किराया (Tenancy) निर्धारण/संशोधन (धारा 8-10) और बेदखली के नए आधार, संपत्ति हस्तांतरण कानून के प्रावधानों से सीधे टकराते हैं. धारा 42 का प्रभावी प्रावधान भी असंवैधानिक ठहराया गया क्योंकि यह बिना राष्ट्रपति की स्वीकृति के केंद्रीय कानूनों को दरकिनार करने का प्रयास करता है.
इस फैसले के प्रभावी होने से पुराना यूपी शहरी भवन (Tenancy Control) अधिनियम, 1972 पुनर्जीवित हो जाएगा. हालांकि, अदालत ने स्पष्ट किया कि जिन मामलों में अब तक 2021 अधिनियम के तहत कार्यवाही पूरी हो चुकी है और चुनौती नहीं दी गई, वे सुरक्षित रहेंगी. सभी संबंधित याचिकाओं में पारित आदेश रद्द कर दिए गए हैं.
राज्य विधि अधिकारी के बेटे पर जानलेवा हमले की विवेचना पूरी करने का निर्देश

इलाहाबाद हाईकोर्ट के जस्टिस चंद्र धारी सिंह और जस्टिस तरुण सक्सेना की खंडपीठ ने देवेंद्र नाथ मिश्रा केस की विवेचना पूरी करने का निर्देश दिया है. 31 जुलाई 2026 के आदेश के अनुपालन में पुलिस आयुक्त, प्रयागराज का व्यक्तिगत हलफनामा दाखिल किया गया. राज्य की ओर से बताया गया कि विवेचना पूरी हो चुकी है, लेकिन सहायक पुलिस आयुक्त, प्रयागराज को केस डायरी और अन्य सामग्री की समीक्षा में विवेचना रिपोर्ट में कुछ खामियां मिली हैं.
मामले के विवेचना अधिकारी को बदल दिया गया है और नया विवेचना अधिकारी नियुक्त किया गया है. पुलिस आयुक्त, प्रयागराज ने पूर्व विवेचना अधिकारी के खिलाफ विभागीय जांच भी शुरू कर दी है.
अदालत ने याचिकाकर्ता के वकील प्रशांत सिंह, सुरेश यादव, राज्य के वकील और रिकॉर्ड पर मौजूद सामग्री को देखने के बाद अगली सुनवाई तक विवेचना पूरी करने का निर्देश दिया. अगली सुनवाई 5 अक्टूबर 2026 को होगी. याची अधिवक्ता का कहना है कि विगत 10 नवंबर 2025 को शाम कुछ लोगों ने याची के पुत्र पर जानलेवा किया. जिसकी प्राथमिकी लगभग एक माह बाद वरिष्ठ पुलिस अधिकारियों के हस्तक्षेप के बाद दर्ज की गई थी.
विगत आठ माह से गंभीर धाराओं में एफआईआर दर्ज होने के बावजूद हमलावरों को गिरफ्तार नही किया गया जबकि सभी लोग प्रयागराज में रह रहे है. किसकी जांच मोबाईल काल डिटेल और मुख्य आरोपी सतीश चन्द्र श्रीवास्तव के घर लगे सीसीटीवी फुटेज से प्राप्त की जा सकती है. याची राज्य विधि अधिकारी हैं.
हाल ही में हाईकोर्ट जा रहा था तो स्वामी चाय के सामने खड़े सूरजभान सिंह आदि ने गाली दी और जान से मारने की नियत से दौड़ाया तो वह दस कदम दूरी पर स्थित पुलिस चौकी पर जाकर चौकी इंचार्ज विनय यादव को सारी बात बताकर उन वांछित अपराधियों को सर्च करने का आग्रह किया. कार्रवाई के बजाय याची को ही धमकाने लगे.
पुलिस की रिपोर्ट की खामियों के कारण पुनः विवेचना का आदेश दिया गया है.और विवेचना अधिकारी को बदल दिया गया है. याची ने विवेचना पुलिस पर आरोपियों से मिलीभगत का आरोप लगाया है. इसी मामले की कोर्ट ने विवेचना पूरी करने का निर्देश दिया है.