वेश्यालय में स्वयं की Enjoyment के लिए गए ग्राहक के खिलाफ अनैतिक व्यापार (निवारण) एक्ट की धारा 3, 5 और 7 के तहत मुकदमा नहीं चलाया जा सकता

जस्टिस डॉ. गौतम चौधरी ने एक आरोपी नितिन की याचिका स्वीकार करते हुए उसके खिलाफ लंबित आपराधिक कार्यवाही, आरोपपत्र और समन आदेश रद्द कर दिया. मामला गाजियाबाद का है. पुलिस को सूचना मिली थी कि भोजपुरा चौराहे के पास डीएलएफ पुलिस चौकी के नजदीक एक मकान में महिलाएं देह व्यापार में शामिल हैं. सूचना के आधार पर पुलिस ने मकान पर छापा मारा. मौके से 16 लोगों को Enjoyment में लिप्त पकड़ा गया जिनमें महिलाएं और सात पुरुष थे.
महिलाओं ने बताया कि वे देह व्यापार में शामिल थीं और Enjoyment से हुई अपनी कमाई का एक हिस्सा उस व्यक्ति को देती थीं, जिसके मकान में वे मौजूद थीं
पुलिस के अनुसार वहां मौजूद महिलाओं ने बताया कि वे देह व्यापार में शामिल थीं और Enjoyment से हुई अपनी कमाई का एक हिस्सा उस व्यक्ति को देती थीं, जिसके मकान में वे मौजूद थीं. इसके बाद उसी दिन एफआईआर दर्ज की गई और अनैतिक व्यापार (निवारण) अधिनियम की धारा 3, 4, 5 और 7 के तहत आरोपपत्र दाखिल किया गया.

मामले में आरोपित एक व्यक्ति ने आपराधिक प्रक्रिया संहिता की धारा 482 के तहत हाईकोर्ट का रुख किया. उसने आरोपपत्र, समन आदेश और उसके खिलाफ चल रही पूरी कार्यवाही रद्द करने की मांग की. उसकी ओर से दलील दी गई कि अधिनियम की धारा 15(2) में छापेमारी के दौरान दो स्वतंत्र स्थानीय गवाहों की मौजूदगी से जुड़ी शर्त पूरी नहीं की गई. इसके अलावा एफआईआर में लगाए गए आरोपों को सही मान भी लिया जाए तो उसके खिलाफ कोई अपराध नहीं बनता, क्योंकि वह केवल ग्राहक के रूप में Enjoyment के लिए वहां गया था.
याचिकाकर्ता की ओर से हाईकोर्ट के एक पुराने फैसले दिनेश तिवारी उर्फ धीरेंद्र कुमार तिवारी बनाम उत्तर प्रदेश राज्य का भी हवाला दिया गया. उस मामले में कहा गया कि केवल ग्राहक के तौर पर वेश्यालय जाने वाला व्यक्ति Enjoyment के लिए वेश्यालय चलाने, उसका प्रबंधन करने या उसके संचालन में सहायता करने वाला व्यक्ति नहीं माना जा सकता.
राज्य सरकार की ओर से याचिका का विरोध करते हुए कहा गया कि आरोपी वेश्यालय के रूप में संचालित किए जा रहे मकान में छापेमारी के दौरान मौके पर पकड़ा गया और उसने पैसे देकर वेश्यावृत्ति कराई. रिकॉर्ड की जांच के बाद हाईकोर्ट ने पाया कि याचिकाकर्ता की भूमिका एक ग्राहक की ही थी. अदालत ने कहा कि वह व्यक्तिगत Enjoyment के लिए पैसे देकर वहां गया और उपलब्ध सामग्री से यह नहीं दिखता कि वह वेश्यालय चलाने या वेश्यावृत्ति के व्यावसायिक शोषण में शामिल था.
“यदि कोई व्यक्ति Enjoyment के लिए ग्राहक के रूप में वेश्यालय जाता है तो अधिक से अधिक यह कहा जा सकता है कि उसने अपनी व्यक्तिगत इच्छा की पूर्ति के लिए यौनकर्मी की सेवा ली, लेकिन वह कानून में परिभाषित ‘वेश्यावृत्ति के उद्देश्य’ के लिए ऐसा नहीं करता, जिसमें व्यावसायिक शोषण आवश्यक तत्व है.”
अदालत ने कहा
हाईकोर्ट ने आगे कहा कि व्यक्तिगत Enjoyment के लिए पैसे देने वाले ग्राहक के खिलाफ अनैतिक व्यापार (निवारण) अधिनियम की धारा 3, 5 या 7 के तहत मुकदमा नहीं चलाया जा सकता. अदालत ने माना कि याचिकाकर्ता के खिलाफ इन धाराओं के तहत कार्यवाही जारी रखना अदालत की प्रक्रिया का दुरुपयोग होगा. इसके बाद हाईकोर्ट ने गाजियाबाद में सिविल जज (जूनियर डिवीजन)/त्वरित न्यायालय न्यायिक मजिस्ट्रेट के समक्ष लंबित पूरी कार्यवाही के साथ आरोपपत्र और समन आदेश को रद्द कर दिया.
पॉक्सो एक्ट के दोषी को अपील के दौरान मिली जमानत
इलाहाबाद हाईकोर्ट ने गाजीपुर के शादियाबाद थाना क्षेत्र से जुड़े एक पॉक्सो एक्ट मामले में दोषी करार दिए गए कमलेश कुमार को अपील की सुनवाई लंबित रहने तक जमानत दे दी है. जस्टिस तेज प्रताप तिवारी की एकल पीठ ने यह आदेश पारित किया. गाजीपुर के अपर सत्र न्यायाधीश/विशेष न्यायाधीश (पॉक्सो एक्ट) की अदालत ने 16 दिसंबर 2025 को कमलेश कुमार को भारतीय दंड संहिता की धारा 363, 354, 376, 506 और पॉक्सो एक्ट की धारा 3/4 के तहत दोषी ठहराते हुए सजा सुनाई थी.
अपीलकर्ता के अधिवक्ता ने तर्क दिया कि दोषसिद्धि झूठे और कमजोर आधारों पर हुई है. उन्होंने कहा कि घटना सार्वजनिक स्थान पर होने के बावजूद पीड़िता ने शोर मचाकर मदद नहीं मांगी, चिकित्सीय परीक्षण में पीड़िता की उम्र 18 वर्ष से अधिक पाई गई, कोई चोट के निशान नहीं मिले और चिकित्सीय परीक्षण घटना के करीब 13 दिन बाद हुआ, जिससे अभियोजन पक्ष की कहानी पर संदेह पैदा होता है. यह भी बताया गया कि अधिकतम सजा दस वर्ष है. अपीलकर्ता छह माह से जेल में है और विचारण के दौरान वह जमानत पर था और उसने इसका दुरुपयोग नहीं किया.
राज्य सरकार की ओर से अपर शासकीय अधिवक्ता और पीड़ित पक्ष के अधिवक्ता ने जमानत का पुरजोर विरोध किया. उनका कहना था कि मेडिकल रिपोर्ट के अनुसार पीड़िता की उम्र 16 वर्ष से अधिक पर 18 वर्ष से कम थी, तथा दोषी ने बलात्कार का अपराध किया, इसलिए निचली अदालत का फैसला और सजा उचित है तथा इसमें हस्तक्षेप की जरूरत नहीं है.
दोनों पक्षों की दलीलें सुनने के बाद कोर्ट ने मामले के गुण-दोष पर कोई टिप्पणी किए बिना कहा कि अपीलों के भारी संख्या में लंबित होने के कारण जल्द सुनवाई की संभावना नहीं है, इसलिए अपीलकर्ता को जमानत दिए जाने का मामला बनता है. कोर्ट ने कमलेश कुमार को व्यक्तिगत बॉन्ड और समान राशि के दो जमानतदारों की शर्त पर संबंधित निचली अदालत की संतुष्टि होने पर रिहा करने का आदेश दिया. अपील अब यथासमय सुनवाई के लिए सूचीबद्ध होगी.