Appointment Letter जारी होने से पहले मरने वाले कैंडिडेट के आश्रित गवर्नमेंट सर्वेंट डाइंग-इन-हार्नेस रूल्स, 1974 के तहत दया के आधार पर नौकरी का दावा नहीं कर सकते
इलाहाबाद हाई कोर्ट ने बुलंदशहर के एसपी के नियुक्ति के आदेश को खारिज करने से किया इंकार, याचिका खारिज

सरकारी नौकरी के लिए सिलेक्शन प्रोसेस में शामिल होने और चुने जाने के बावजूद Appointment Letter जारी होने से पहले मरने वाले कैंडिडेट के आश्रित उनकी मौत के कारण दया के आधार पर नौकरी का दावा नहीं कर सकते क्योंकि ऐसे कैंडिडेट की मौत से पहले सर्विस शुरू नहीं हुई थी. इसको आधार बनाते हुए इलाहाबाद हाई कोर्ट के जस्टिस अनीस कुमार गुप्ता की बेंच ने मृतक आश्रित कोटे में नियुक्ति (Appointment) की मांग करते हुए दायर की गयी महिला को कोई राहत देने से इंकार करते हुए याचिका खारिज कर दी है.
यह रिट याचिका संध्या यादव ने बुलंदशहर के पुलिस अधीक्षक द्वारा 09.11.2021 को जारी आदेश को रद्द करने की मांग में दायर की गयी थी. अपने आदेश में पुलिस अधीक्षक ने नियुक्ति पत्र जारी होने से पहले याचिकाकर्ता के पति की मृत्यु के कारण अनुकंपा के आधार पर Appointment के याचिकाकर्ता के दावे को खारिज कर दिया गया था.
तथ्यों के अनुसार अक्टूबर 2018 में सिविल पुलिस और PAC में कांस्टेबल के पद पर सीधी भर्ती के लिए एक विज्ञापन जारी किया गया था. इसके तहत याचिकाकर्ता के पति ने आवेदन किया और लिखित परीक्षा पास की. उन्होंने 29.12.2019 को हुई शारीरिक दक्षता परीक्षा और बाद में 07.03.2021 को हुई मेडिकल जांच में भी भाग लिया. इसके बाद चयनित उम्मीदवारों की सूची जारी की गई, जिसमें याचिकाकर्ता के पति को चयनित घोषित किया गया. 05.06.2021 को Appointment Letter जारी होने से पहले 30.04.2021 को याचिकाकर्ता के पति की मृत्यु हो गई.
आधार बताया गया कि उसके पति के पक्ष में Appointment Letter जारी किया गया था
याचिकाकर्ता संध्या यादव ने कांस्टेबल के पद पर अपने पति के चयन के आधार पर अनुकंपा नियुक्ति (Appointment) के लिए आवेदन किया था. आधार बताया गया कि उसके पति के पक्ष में Appointment Letter जारी किया गया. महिला की तरफ से उसके अधिवक्ता ने तर्क दिया कि चूंकि याचिकाकर्ता के पति का अंतिम रूप से चयन हो गया था और 2018 में शुरू हुई चयन प्रक्रिया में देरी हुई थी, इसलिए यदि चयन प्रक्रिया समय पर पूरी हो जाती, तो याचिकाकर्ता के पति अपनी मृत्यु से पहले कांस्टेबल के रूप में कार्यभार संभाल लेते और परिणामस्वरूप, वे सरकारी कर्मचारी होते.
ऐसी स्थिति में, याचिकाकर्ता ऐसे सरकारी कर्मचारी पर आश्रित होने के नाते अनुकंपा Appointment का दावा करने की हकदार होतीं. उन्होंने कहा कि बुलंदशहर के पुलिस अधीक्षक ने याचिकाकर्ता की अनुकंपा के आधार पर नियुक्ति की मांग को गलत तरीके से खारिज कर दिया.
उन्होंने अपना पक्ष मजबूत करने के लिए ‘वंदना देवी बनाम उत्तर प्रदेश राज्य व 3 अन्य’ (रिट-A नंबर 22449/2013) मामले में 25.04.2013 को पारित अंतरिम आदेश और ‘मोनी देवी बनाम उत्तर प्रदेश राज्य व अन्य’ (रिट-A नंबर 4216/2014) मामले में 07.02.2018 को पारित अंतिम आदेश (जो 2018 (5) ADJ 456 में दर्ज है) का हवाला दिया.
याचिकाकर्ता के वकील का कहना था कि Appointment Letter जारी करने में हुई देरी के कारण, और बिल्कुल वैसी ही परिस्थितियों में जहाँ उम्मीदवारों की मृत्यु हो गई थी, इस कोर्ट ने उनके आश्रितों को अनुकंपा के आधार पर नियुक्ति दी है. इसलिए, याचिकाकर्ता ऊपर बताए गए फैसलों के आधार पर समानता का दावा करती है और मांग करती है कि उसे भी वैसा ही लाभ दिया जाए और अनुकंपा के आधार पर नियुक्ति दी जाए.
इसके विपरीत, राज्य की ओर से अतिरिक्त मुख्य स्थायी अधिवक्ता का कहना था कि याचिकाकर्ता के पति की सेवा में आने और उन्हें Appointment Letter जारी होने से पहले ही मृत्यु हो गई थी. ऐसी परिस्थितियों में किसी भी तरह से उन्हें सरकारी कर्मचारी नहीं माना जा सकता है. यहाँ तक कि अगर कोई उम्मीदवार चयन प्रक्रिया में भाग लेता है और अंतिम Appointment Letter जारी हो जाता है, तब भी जब तक वह नौकरी ज्वाइन नहीं कर लेता, उसे सरकारी कर्मचारी नहीं माना जा सकता.
ऐसे उम्मीदवारों के आश्रितों पर ‘यूपी सरकारी कर्मचारी (सेवाकाल में मृत्यु) नियम, 1974’ या ‘उत्तर प्रदेश पुलिस कांस्टेबल और हेड कांस्टेबल सेवा नियम, 2015’ लागू नहीं होंगे, और इस प्रकार याचिकाकर्ता को कोई लाभ नहीं दिया जा सकता. उन्होंने कहा कि वंदना देवी मामले में अंतरिम आदेश और मोनी देवी मामले में अंतिम आदेश, मामले के खास तथ्यों और परिस्थितियों में पारित किए गए थे.
उन मामलों में, शुरुआती नियुक्तियां की गई थीं और बाद में संबंधित अधिकारियों ने गैर-कानूनी तरीके से चयन रद्द कर दिया था, जिसे बाद में अदालतों ने खारिज कर दिया था. ऐसी परिस्थितियों में, आश्रितों को अनुकंपा के आधार पर नियुक्ति (Appointment) दी गई थी.
मौजूदा मामले में, ऐसी कोई परिस्थिति नहीं है कि चयन प्रक्रिया कभी रद्द की गई हो. Appointment Letter जारी होने से पहले ही, याचिकाकर्ता के पति का निधन हो गया. ऐसे में, मामले के तथ्यों को देखते हुए याचिकाकर्ता के वकील द्वारा जिन फैसलों का हवाला दिया गया है वे यहां लागू नहीं होते.
दोनों पक्षों के तर्कों को सुनने और रिकॉर्ड पर उपलब्ध तथ्यों को परखने के बाद बेंच ने कहा कि सिलेक्शन प्रोसेस पूरी होने के बाद Appointment Letter जारी होने से पहले ही याचिकाकर्ता के पति की मौत हो गई. ऐसे हालात में किसी भी तरह से यह नहीं कहा जा सकता कि याचिकाकर्ता के पति सर्विस में थे. इसलिए ‘U.P. गवर्नमेंट सर्वेंट डाइंग-इन-हार्नेस रूल्स, 1974’ और ‘उत्तर प्रदेश पुलिस कॉन्स्टेबल एंड हेड कॉन्स्टेबल सर्विस रूल्स, 2015’ (जिसके नियम 5 में दया के आधार पर नौकरी का प्रावधान है) के नियम याचिकाकर्ता के मामले में लागू नहीं होंगे.