नसरीन Suicide केस में 3 आरोपियों को हाईकोर्ट से राहत, अगली सुनवाई तक उत्पीड़नात्मक कार्रवाई पर रोक

इलाहाबाद हाईकोर्ट ने संभल के गुन्नौर थाना क्षेत्र में महिला की Suicide के मामले में तीन आरोपियों को अंतरिम राहत दी है. कोर्ट ने अगली सुनवाई तक आरोपियों के खिलाफ Suicide के लिए उकसाने के आपराधिक मामले में कोई उत्पीड़नात्मक कार्रवाई पर रोक लगा दी है. अगली सुनवाई 23 सितंबर 2026 को होगी. यह आदेश जस्टिस मदन पाल सिंह ने संभल के इरफान व दो अन्य की याचिका पर दिया है.
याचिका में दो जून 2025 की चार्जशीट, सात अक्टूबर 2025 के संज्ञान/समन आदेश और Suicide के लिए उकसाने के आपराधिक वाद की पूरी कार्यवाही रद्द करने की मांग की गई है. याचियों की ओर से दलील दी गई कि आरोपी निर्दोष हैं और एफआईआर में लगाए गए आरोप झूठे व मनगढ़ंत हैं.
उन्होंने कहा कि धारा 108 बीएनएस के तहत Suicide के लिए उकसाने के आवश्यक तत्व इस मामले में मौजूद नहीं हैं. एफआईआर और धारा 180 बीएनएसएस के बयान में भी मृतका को कब, कहां और किस तरह प्रताड़ित किया गया, इसका स्पष्ट उल्लेख नहीं है.
28 अप्रैल को नसरीन ने फांसी लगाकर Suicide कर ली
अधिवक्ताओं के मुताबिक आरोपी मृतका नसरीन के जेठ, जेठानी और देवरानी हैं तथा उनका मृतका के रोजमर्रा के मामलों से कोई संबंध नहीं था. पति की मौत के बाद नसरीन बच्चों के साथ ससुराल में रह रही थी. वह अपने अविवाहित देवर शमीम से विवाह की उम्मीद कर रही थी, लेकिन शमीम ने 21 अप्रैल 2025 को दूसरी महिला से शादी कर ली. इसके सात दिन बाद 28 अप्रैल को नसरीन ने फांसी लगाकर Suicide कर ली. कोर्ट ने मामले को विचारणीय मानते हुए प्रतिवादियों को जवाब दाखिल करने के लिए कहा है. अगली सुनवाई 23 सितम्बर नियत की है.
सुलह प्रक्रिया अपनाए बिना पारित पंचाट रद्द, स्थायी लोक अदालत को मामला वापस

याचिकाकर्ताओं स्मृति रविता व तीन अन्य की ओर से अधिवक्ता निगमेंद्र शुक्ला ने अदालत के समक्ष दलील दी कि स्थायी लोक अदालत ने विवाद के निस्तारण से पहले पक्षकारों के बीच सौहार्दपूर्ण समझौते के लिए वास्तविक प्रयास नहीं किए. पंचाट में केवल सामान्य संदर्भ दिया गया, जो पर्याप्त नहीं है. राज्य की ओर से पैरवी कर रहे स्थायी अधिवक्ता भी इस स्थिति का खंडन नहीं कर सके.
अदालत ने स्पष्ट किया कि स्थायी लोक अदालत का प्राथमिक कर्तव्य पक्षकारों के बीच समझौता कराना है, न कि सीधे गुण-दोष पर निर्णय देना. अदालत ने कहा कि यदि सुलह प्रक्रिया में किए गए प्रयासों का विवरण पंचाट में दर्ज नहीं है, तो यह मान लिया जाएगा कि वास्तविक प्रयास हुए ही नहीं, जिससे पंचाट अवैध हो जाएगा.
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वर्तमान मामले में अदालत ने पाया कि पंचाट में सुलह के प्रयासों का कोई उल्लेख नहीं था, केवल एक तारीख निर्धारित करने का जिक्र था, लेकिन उस दिन क्या प्रयास हुए और समझौता क्यों नहीं हो सका, इसका कोई विवरण दर्ज नहीं किया गया. अदालत ने आक्षेपित पंचाट को रद्द करते हुए मामला स्थायी लोक अदालत, बुलंदशहर को वापस भेज दिया, और निर्देश दिया कि वह पहले सुलह की प्रक्रिया के तहत युक्तियुक्त प्रयास करे और असफल होने पर ही गुण-दोष के आधार पर निर्णय दे. याचिका इसी निर्देश के साथ आंशिक रूप से स्वीकार की गई.