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Kidnapping & Rape के 35 साल पुराने मामले के आरोपित बरी,  इलाहाबाद हाईकोर्ट ने कहा बिना ठोस दस्तावेजी आधार के अनुमानित उम्र पर सजा नहीं दी जा सकती

Kidnapping and Rape के 35 साल पुराने मामले के आरोपित बरी,  इलाहाबाद हाईकोर्ट ने कहा बिना ठोस दस्तावेजी आधार के अनुमानित उम्र पर सजा नहीं दी जा सकती

इलाहाबाद हाईकोर्ट ने वर्ष 1991 के एक बहुचर्चित अपहरण एवं दुष्कर्म (Kidnapping and Rape) मामले में सत्र न्यायालय, बांदा द्वारा सुनाई गई सजा को रद्द करते हुए तीनों आरोपियों राम चरण, राजा राम और राम कुमार को दोषमुक्त कर दिया है. जस्टिस तेज प्रताप तिवारी की अदालत ने यह फैसला संदेह का लाभ देते हुए सुनाया क्योंकि अभियोजन पक्ष पीड़िता के नाबालिग होने को युक्तियुक्त संदेह से परे साबित नहीं कर सका.

मामला 5/6 मई 1989 की रात का है, जब बांदा जिले के फतेहगंज मार्ग पर गश्त कर रही पुलिस टीम ने दो साइकिल सवारों के साथ पैदल जा रही एक महिला को रोका. महिला ने आरोप लगाया कि उसे जबरन ले जाया जा रहा है. पुलिस ने मौके से राम कुमार को पकड़ा, जबकि राम देन (जिनकी अपील के दौरान मृत्यु हो गई) फरार हो गया. पीड़िता ने बताया कि राम चरण ने उसका अपहरण किया और रात भर बलात्कार (Kidnapping and Rape) के बाद उसे बदौसा ले जाकर राजा पंडित को सौंपने के लिए भेजा गया था.

रास्ते में राम कुमार और राम देन ने भी उसके साथ दुष्कर्म किया. सत्र न्यायालय ने 19 नवंबर 1991 को राम चरण और राजा राम को धारा 366 आईपीसी के तहत 3 वर्ष तथा राम चरण, राम कुमार और राम देन को धारा 376 आईपीसी (Kidnapping and Rape) के तहत 7 वर्ष के सश्रम कारावास और जुर्माने की सजा सुनाई थी.

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बचाव पक्ष के वकीलों ने तर्क दिया कि घटना के समय पीड़िता वयस्क थी, इसलिए धारा 366 और 376 के तहत अपराध (Kidnapping and Rape) नहीं बनता. इसके समर्थन में पीड़िता के भाई महेश के बयान का हवाला दिया गया, जिन्होंने कहा था कि गवाही के समय उनकी अपनी उम्र लगभग 25 वर्ष थी और उनके बाद एक और छोटी बहन, फिर पीड़िता सबसे छोटी थी.

राज्य सरकार की ओर से एजीए ने दलील दी कि भाई की उम्र और डॉक्टर की गवाही से यह स्पष्ट है कि पीड़िता 18 वर्ष से कम आयु की नाबालिग थी. अदालत ने पाया कि रेडियोलॉजिस्ट डॉ. एमसी मित्तल ने एक्स-रे रिपोर्ट में उम्र का स्पष्ट उल्लेख नहीं किया, जबकि उम्र निर्धारण ही जांच का मुख्य उद्देश्य था.

पीड़िता ने स्वयं अपनी उम्र 17 वर्ष (बयान के समय, यानी अगस्त 1991 में) बताई थी और कहा था कि उसकी शादी चार साल पहले हो चुकी थी. भाई महेश ने पीड़िता की सटीक उम्र बताने से इनकार किया था. माता-पिता जीवित होने के बावजूद अभियोजन ने उन्हें उम्र संबंधी गवाही के लिए पेश नहीं किया.

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कोर्ट ने कहा कि बिना ठोस दस्तावेजी आधार के अनुमानित उम्र पर सजा नहीं दी जा सकती. इसके अलावा बचाव पक्ष ने धारा 313 सीआरपीसी के तहत आरोपियों से पूछताछ की प्रक्रिया को भी त्रुटिपूर्ण बताया, यह कहते हुए कि उन्हें अभियोजन साक्ष्य में आई परिस्थितियों के बारे में ठीक से नहीं पूछा गया.

इन तथ्यों के आधार पर हाईकोर्ट ने माना कि अभियोजन पक्ष पीड़िता के नाबालिग होने को साबित करने में विफल रहा, इसलिए उसे वयस्क मानते हुए संदेह का लाभ Kidnapping and Rape के आरोपियों को दिया गया. कोर्ट ने सत्र न्यायालय का 19 नवंबर 1991 का आदेश रद्द करते हुए अपील स्वीकार कर ली और आरोपियों की जमानत की शर्तें समाप्त कर दीं.

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इलाहाबाद हाईकोर्ट ने 41 साल पुराने Kidnapping मामले में तीन आरोपियों को किया बरी

इलाहाबाद हाईकोर्ट ने 1985 के एक अपहरण मामले में तीन दोषियों को संदेह का लाभ देते हुए बरी कर दिया है. जस्टिस तेज प्रताप तिवारी की एकलपीठ ने यह फैसला सुनाया. मामला इटावा जिले के 10 अक्टूबर 1981 का है, जब शिकायतकर्ता कालीचरण के भाई मुन्नी लाल और राम स्वरूप को गांव नगला गौर के पास हथियारबंद लोगों ने कथित रूप से अगवा (Kidnapping) कर लिया था.

पांचवीं अपर सत्र न्यायाधीश (एंटी डकैती), इटावा की अदालत ने 18 जनवरी 1985 को जयवीर सिंह, बुरान सिंह और श्री चंद सहित आरोपियों को भारतीय दंड संहिता की धारा 364 (हत्या के इरादे से Kidnapping) के तहत सात वर्ष के सश्रम कारावास की सजा सुनाई थी. अपील के दौरान दो अन्य दोषियों श्याम सिंह और रणजीत सिंह की मृत्यु हो जाने से उनके विरुद्ध अपील समाप्त हो गई.

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हाईकोर्ट ने पाया कि अभियोजन पक्ष अपहरण (Kidnapping) की घटना और आरोपियों की संलिप्तता ठोस साक्ष्यों से साबित नहीं कर सका. कोर्ट ने कहा कि जब हथियारबंद आरोपियों ने कथित तौर पर बल प्रयोग कर दो व्यक्तियों को अगवा (Kidnapping) किया, तब मौके पर मौजूद गवाहों को कोई चोट नहीं आई यह तथ्य घटना पर गंभीर संदेह पैदा करता है. इसके अलावा शव, हथियार या फोरेंसिक साक्ष्य की बरामदगी न होना, तथा गवाहों द्वारा आरोपियों की पहचान भी घटना के लंबे समय बाद पहली बार अदालत में किए जाने को कोर्ट ने अविश्वसनीय माना.

कोर्ट ने सुप्रीम कोर्ट के पंकज बनाम राजस्थान राज्य (2016) और नत्थू बनाम उत्तर प्रदेश राज्य के फैसलों का हवाला देते हुए कहा कि जब घटना की मूल कहानी ही संदिग्ध हो, तो आरोपी को दोषी नहीं ठहराया जा सकता. कोर्ट ने ट्रायल कोर्ट के फैसले को रद्द करते हुए अपील स्वीकार कर ली और आरोपियों को संदेह का लाभ दिया.

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