Service Rules बदलने से सभी पद प्रभावित नहीं तो नियुक्ति न देना गलत, राज्य सरकार को आदेश 1 माह में करे नियुक्ति

भर्ती प्रक्रिया जारी रहने के दौरान Service Rules और वेतनमान में बदलाव कर दिये जाने का प्रभाव यदि जारी नियुक्ति प्रक्रिया के सभी पदों पर नहीं हुआ है तो सफल अभ्यर्थियों को इस आधार पर नियुक्ति देने से इंकार नहीं किया जा सकता कि Service Rules और वेतनमान में बदलाव हो चुका है. इलाहाबाद हाई कोर्ट ने इस कमेंट के साथ उन अभ्यर्थियों को बड़ी राहत दे दी है जिन्हें सिर्फ इस आधार पर नियुक्ति देने से इंकार कर दिया था कि Service Rules और वेतनमान में बदलाव होने के चलते नियुक्ति नहीं दी जा सकती है.
कोर्ट ने Service Rules और वेतनमान बदल जाने के चलते नियुक्ति से इंकार करने वाले आदेश को रद कर दिया है और राज्य सरकार को आदेश दिया है कि वह एक माह में सफल अभ्यर्थियों को नियुक्ति पत्र जारी करे. इलाहाबाद हाईकोर्ट के जस्टिस सरल श्रीवास्तव और जस्टिस सुधांशु चौहान की खंडपीठ ने कमल नयन सिंह व अन्य और श्रीपति यादव व अन्य की स्पेशल अपील को स्वीकार करते हुए राज्य सरकार को निर्देश दिया है कि प्रविधिक शिक्षा निदेशालय, कानपुर के अंतर्गत लाइब्रेरियन पद पर याचियों को एक माह के भीतर नियुक्ति दी जाए.
Service Rules के सभी पद नये बदलाव से प्रभावित नहीं हैं तो फिर नियुक्ति न देना गलत
कोर्ट ने कहा कि नई नियुक्ति से पहले सरकार नयी नियमावली (Service Rules) लागू कर देती है और वेतनमान में बदलाव करने के आधार पर तभी नियुक्ति देने से इंकार कर सकती है जब सभी पदों पर इसका प्रभाव समान रूप से पड़े. Service Rules के सभी पद नये बदलाव से प्रभावित नहीं हैं तो फिर नियुक्ति न देना गलत है.
अपीलार्थी अधिवक्ता मुजीब अहमद सिद्दीकी का कहना था कि यूपी अधीनस्थ सेवा चयन आयोग ने 2016 के विज्ञापन के तहत 69 पदों पर लाइब्रेरियन भर्ती के लिए परीक्षा कराई, जिसका परिणाम दिसंबर 2021 में घोषित हुआ. इसी बीच एक आईसीटीई ने 2019 में नए नियम (Service Rules) बनाकर लाइब्रेरियन पद की योग्यता व वेतनमान बढ़ा दिया और राज्य सरकार ने 2021 में नई सेवा नियमावली (Service Rules) लागू कर दी. इसके आधार पर राज्य सरकार ने चयनित अभ्यर्थियों को नियुक्ति देने से इन्कार कर दिया.

याचियों ने पहले भी हाईकोर्ट का रुख किया था, जहां दिसंबर 2022 में एकलपीठ ने राज्य सरकार को एक माह में नियुक्ति देने का आदेश दिया था, हालांकि यह छूट भी दी थी कि यदि सरकार अलग दृष्टिकोण रखती है तो निर्णय ले सकती है. राज्य सरकार ने इस फैसले के खिलाफ अपील दायर की, लेकिन बाद में उसे वापस ले लिया. इसके बावजूद राज्य ने मार्च 2024 में एक आदेश पारित कर याचियों की नियुक्ति की मांग फिर खारिज कर दी, जिसे एकलपीठ ने जुलाई 2024 में सही ठहराया था.
खंडपीठ ने कहा कि राज्य सरकार ने अपनी पूर्व अपील वापस लेकर एकलपीठ के 2022 के फैसले को स्वीकार कर लिया था, इसलिए वह “रेस जुडीकेटा के सिद्धांत के तहत उन्हीं आधारों पर दोबारा आपत्ति नहीं उठा सकती. कोर्ट ने यह भी कहा कि मार्च 2024 का आदेश वास्तव में पूर्व के न्यायिक निर्णय पर अपील जैसा था, जो प्रशासनिक प्राधिकरण के अधिकार क्षेत्र में नहीं आता.
साथ ही कोर्ट ने पाया कि सभी लाइब्रेरियन पद New Service Rules लागू कर दिये जाने सेअपग्रेड नहीं हुए थे. पुराने वेतनमान वाले पद अब भी बरकरार हैं. इस आधार पर कोर्ट ने जुलाई 2024 के फैसले को रद्द करते हुए राज्य सरकार को एक माह के भीतर याचियों को पुराने वेतनमान (ग्रेड पे ₹2800, पे बैंड ₹5200-20200) में लाइब्रेरियन पद पर नियुक्ति देने का आदेश दिया.
बीएचयू के आयुर्वेद संकाय में प्रमोशन को लेकर विवाद, याचिका पर सुनवाई 10 अगस्त तक टली
इलाहाबाद हाईकोर्ट के जस्टिस सिद्धार्थ नंदन ने काशी हिंदू विश्वविद्यालय वाराणसी द्वारा 21 फरवरी 2026 को जारी एक अध्यादेश के खिलाफ दायर याचिका पर सुनवाई की. यह याचिका डॉ. सुशील कुमार दुबे ने केंद्र सरकार और अन्य आठ पक्षकारों के खिलाफ दाखिल की है. याचिकाकर्ता के वकील केआर सिंह का कहना है कि आयुर्वेद शिक्षा को मान्यता देने और नियंत्रित करने का अधिकार नेशनल कमीशन फॉर इंडियन सिस्टम ऑफ मेडिसिन के पास है.
एनसीआईएम एक्ट, 2020 की धारा 55(2) के तहत बनाए गए नियम (2022) के अनुसार, असिस्टेंट प्रोफेसर से एसोसिएट प्रोफेसर बनने के लिए 5 साल और प्रोफेसर बनने के लिए 10 साल का शिक्षण अनुभव अनिवार्य है. याचिकाकर्ता का आरोप है कि विश्वविद्यालय का अध्यादेश केंद्रीय स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण मंत्रालय की 2008 की डीएसीपी योजना का हवाला देकर सिर्फ 2 साल की सेवा में ही प्रमोशन की अनुमति दे रहा है, जो एक्ट, 2020 के प्रावधानों के विपरीत है.
वकील ने सुप्रीम कोर्ट के एक फैसले ईएसआईसी बनाम भारत संघ, 2022) का हवाला देते हुए कहा कि विज्ञापन और सेवा नियमों में टकराव होने पर बाद वाला नियम प्रभावी होता है, इसलिए एक्ट को अध्यादेश पर प्राथमिकता मिलनी चाहिए. विश्वविद्यालय के वकील ने इस मुद्दे पर जवाब देने के लिए समय मांगा. याचिकाकर्ता के वकील ने बताया कि एसोसिएट प्रोफेसर पद के लिए डिपार्टमेंटल प्रमोशन कमेटी पहले ही गठित हो चुकी है और इंटरव्यू भी हो चुके हैं, और यूनिवर्सिटी डी ए सी पी स्कीम के तहत प्रमोशन प्रक्रिया आगे बढ़ा रही है.
कोर्ट ने कहा कि अंतरिम आवेदन पर विचार करने से पहले विश्वविद्यालय को अपना पक्ष रखने का मौका दिया जाना उचित होगा, लेकिन स्पष्ट किया कि इस बीच होने वाले किसी भी प्रमोशन का परिणाम इस याचिका के अंतिम फैसले पर निर्भर करेगा. अगली सुनवाई 10 अगस्त 2026 को तय की गई है.