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528 BNSS के तहत Criminal Proceeding रद्द करने की अर्जी सुनते समय कोर्ट न तो मिनी ट्रायल कर सकता है और न सबूतों की जांच

इलाहाबाद हाई कोर्ट ने भगोड़ा घोषित अपराधियों की तरफ से दाखिल केस रद करने की अर्जी की खारिज, पासपोर्ट जब्त करने को सही बताया

528 BNSS के तहत Criminal Proceeding रद्द करने की अर्जी सुनते समय कोर्ट न तो मिनी ट्रायल कर सकता है और न सबूतों की जांच

Criminal Proceeding को रद्द करने की अर्जी पर विचार करते समय, असाधारण अधिकार क्षेत्र का इस्तेमाल करने वाला कोर्ट न तो कोई मिनी ट्रायल कर सकता है और न ही किसी खास मामले के सबूतों की जांच-परख कर सकता है. शिकायत में लगाए गए आरोपों की सच्चाई या गलतफहमी की जांच उस संभावित बचाव के आधार पर नहीं की जा सकती जो आरोपी अभियोजन से बचने के लिए पेश कर सकता है और अगर कोर्ट ऐसा कोई गलत कदम उठाता है जिससे Criminal Proceeding रद्द हो जाती है, तो उस फैसले को पलट दिया जाएगा.

सुप्रीम कोर्ट द्वारा प्रियंका जायसवाल बनाम झारखंड राज्य (2024 SCC Online SC 685) मामले में दी गयी इस व्यवस्था के आधार पर इलाहाबाद हाई कोर्ट के जस्टिस मदन पाल सिंह की बेंच ने राहुल शर्मा और अन्य तरफ से Criminal Proceeding रद करने की मांग में दाखिल याचिका को खारिज कर दिया है.

Criminal Proceeding रद्द करने की मांग में यह अर्जी राहुल शर्मा और अन्य की तरफ से B.N.S.S. की धारा 528 के तहत दायर की गई थी. इसमें 8 अक्टूबर 2024 की चार्ज-शीट, 6 नवंबर 2024 के संज्ञान/समन आदेश और क्रिमिनल केस नंबर 4461/2024 (राज्य बनाम सीमा और अन्य) की पूरी Proceeding को रद्द करने की मांग की गई थी. यह केस अपराध संख्या 579/2023 (धारा 420, 409, 467, 468, 471 और 120-B आईपीसी, थाना-सेक्टर-24, जनपद गौतम बुद्ध नगर) से जुड़ा है और एडिशनल चीफ ज्यूडिशियल मजिस्ट्रेट-I, गौतम बुद्ध नगर की कोर्ट में पेंडिंग है.

Criminal Proceeding रद्द करने की मांग में यह अर्जी राहुल शर्मा और अन्य की तरफ से B.N.S.S. की धारा 528 के तहत दायर की गई थी

तथ्यों के अनुसार साउथ इंडियन बैंक लिमिटेड के डिप्टी जनरल मैनेजर और रीजनल हेड, रंजित आर नायर ने 18 दिसंबर 2023 को एक F.I.R. दर्ज कराई. इसमें तीन लोगों को नामजद और बाकी को अज्ञात बताया गया है. FIR में आरोप है कि राहुल शर्मा, जब सेक्टर-22, नोएडा ब्रांच में असिस्टेंट मैनेजर के पद पर तैनात थे, तब उन्होंने अपनी पत्नी, माँ और अन्य अज्ञात लोगों के साथ मिलकर आपराधिक साजिश रची.

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इस साजिश का मकसद M/s एसोसिएटेड इलेक्ट्रॉनिक्स रिसर्च फाउंडेशन (AERF) के लगभग 28.07 करोड़ रुपये का गबन करना था. आरोप है कि राहुल शर्मा ने शुरू में बैंक और स्थानीय पुलिस से शिकायत की थी कि फर्म के डायरेक्टर उन्हें धमका रहे हैं और वे गैर-कानूनी वित्तीय लेन-देन में शामिल हैं, लेकिन बैंक की आंतरिक सतर्कता जांच से पता चला कि उन्होंने खुद बैंकिंग सिस्टम में हेरफेर किया था और बिना इजाजत के लेन-देन किए थे.

जांच में यह भी पता चला कि हेराफेरी की गई रकम को लगभग बीस अलग-अलग बैंकों में मौजूद कई बैंक अकाउंट के जरिए घुमाया गया. हेराफेरी की गई रकम का एक बड़ा हिस्सा कथित तौर पर भूमिका शर्मा (राहुल शर्मा की पत्नी) और सीमा रानी (राहुल शर्मा की मां) के अकाउंट में ट्रांसफर किया गया, साथ ही अन्य लाभार्थियों को भी भेजा गया.

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बैंक ने आरोप लगाया कि राहुल शर्मा को नौकरी से सस्पेंड कर दिया गया था, वे फरार थे, और उन्होंने कथित तौर पर डुप्लीकेट पासपोर्ट हासिल कर लिया था, जिससे यह आशंका पैदा हुई कि वे देश छोड़कर भागना चाहते हैं. इन आरोपों के आधार पर, धोखाधड़ी, जालसाजी, आपराधिक विश्वासघात और आपराधिक साजिश से जुड़े अपराधों के लिए यह FIR दर्ज की गई और Proceeding शुरू हुई थी.

आवेदकों के वकील ने तर्क दिया कि चूंकि आवेदक अभी भारत में नहीं रह रहे हैं, इसलिए उनके खिलाफ Cr.P.C. की धारा 82 और 83 के तहत और Proceeding शुरू की गई और उसके बाद जांच अधिकारी ने आवेदकों के खिलाफ 08.10.2024 की तारीख वाली चार्जशीट दाखिल की. 08.10.2024 की चार्जशीट में जांच अधिकारी ने बताया है कि फर्जी अकाउंट नंबरों से जुड़े KYC दस्तावेज और सैंपल सिग्नेचर पहले ही हासिल करके F.S.L. भेजे जा चुके हैं, लेकिन उनके नतीजे अभी तक नहीं मिले हैं.

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विपक्ष के अधिवक्ता ने शुरुआती ऐतराज का सवाल उठाया कि क्या आवेदक इस और Criminal Proceeding रद्द करने की मांग में अर्जी को दायर कर सकते हैं क्योंकि उन्हें भगोड़ा घोषित किया जा चुका है. इसके जवाब में आवेदकों के वकील ने तर्क दिया कि वे वे भगोड़े नहीं हैं क्योंकि 18-12-2023 को मौजूदा FIR दर्ज होने से पहले ही वे भारत छोड़कर U.A.E. में रहने लगे थे.

उनके पासपोर्ट जब्त किये जा चुके हैं, आवेदक इस मामले में जान-बूझकर फरार नहीं हैं. राहुल की मांग को 25 अप्रैल, 2024 को अग्रिम जमानत मिल चुकी है जबकि अन्य सह-आरोपियों – जयरीजेसन, बिबिन सेबेस्टियन और विक्की कुमार, जिनके खिलाफ अज्ञात व्यक्तियों के तौर पर FIR दर्ज की गई थी और जो बैंक के क्लास-III और क्लास-IV कर्मचारी हैं, उन्हें भी जमानत मिल चुकी है.

विपक्षी पार्टी नंबर 2 के वकील ने पंजाब और हरियाणा हाई कोर्ट के ‘बी. लवजोत कौर बनाम हरबिंदर सिंह’ (AIR ऑनलाइन 2022 P & H 1029) मामले और उत्तराखंड हाई कोर्ट के ‘सी. राकेश मेहरा बनाम उत्तराखंड राज्य और अन्य’ (क्रिमिनल मिसलेनियस एप्लीकेशन नंबर 135/2024, फैसला 17 जून 2026) मामले के फैसलों का हवाला दिया है.

उन्होंने कहा कि FIR में लगाए गए आरोपों से आवेदकों के खिलाफ संज्ञेय अपराध बनता है. इस चरण पर आवेदकों के बचाव पक्ष पर विचार नहीं किया जा सकता है. इसलिए, आवेदक किसी भी रियायत के हकदार नहीं हैं. यह कोर्ट B.N.S.S. की धारा 528 के तहत अपनी शक्तियों का इस्तेमाल करते हुए Proceeding के इस चरण पर मामले में दखल नहीं दे सकता है.

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दोनों पक्षों के तर्कों को सुनने के बाद Criminal Proceeding रद्द करने की मांग में अर्जी पर विचार के लिए कोर्ट ने दो मुद्दे तय किये. पहला यह कि क्या BNSS की धारा 528 के तहत आवेदकों (आवेदक नंबर 1 की बहन के माध्यम से) द्वारा दायर यह आपराधिक अर्जी-जिन्हें घोषित भगोड़ा करार दिया गया है- सुनवाई योग्य है या नहीं; और दूसरा यह कि क्या इस चरण पर, यह कोर्ट अपनी असाधारण शक्तियों का इस्तेमाल करते हुए विवादित चार्ज-शीट, समनिंग ऑर्डर और उक्त आपराधिक मामले की पूरी Proceeding को प्री-ट्रायल चरण में रद्द कर सकता है या नहीं.

इसके लिए अभिषेक बनाम महाराष्ट्र राज्य और अन्य (मामला संख्या (2022) 8 SCC 282) के मामले में सुप्रीम कोर्ट के फैसले का जिक्र किया गया जिसमें सर्वोच्च न्यायालय ने कहा है कि:

“अपीलकर्ता के खिलाफ उद्घोषणा जारी होने के असर के बारे में, हम यह स्पष्ट करने में कोई संकोच नहीं करते कि कोई भी व्यक्ति जिसे “फरार” घोषित किया गया है और जो जांच एजेंसी की पहुंच से बाहर रहता है और इस तरह सीधे तौर पर कानून का उल्लंघन करता है, उसे आम तौर पर कोई रियायत या छूट नहीं मिलनी चाहिए……”

श्रीकांत उपाध्याय के मामले में, जिस पर विपक्षी पार्टी नंबर 2 के वकील ने भरोसा जताया है, शीर्ष अदालत ने पैराग्राफ नंबर… 24 में कहा है:

24. “हमने पहले ही कहा है कि अग्रिम जमानत देने की शक्ति एक असाधारण शक्ति है. हालाँकि कई मामलों में यह कहा गया है कि जमानत मिलना एक नियम है, लेकिन किसी भी तरह से यह नहीं कहा जा सकता कि अग्रिम जमानत भी एक नियम है. यह नियम नहीं हो सकता और इसे देने का सवाल हर मामले के तथ्यों और परिस्थितियों के आधार पर कोर्ट के सावधानीपूर्वक और समझदारी भरे विवेक पर छोड़ दिया जाना चाहिए.

इस शक्ति का इस्तेमाल करते समय, संबंधित कोर्ट को बहुत सावधान रहना होगा क्योंकि गंभीर मामलों में आरोपी को अंतरिम सुरक्षा या सुरक्षा देने से न्याय में बाधा आ सकती है और जांच पर भी काफी असर पड़ सकता है, क्योंकि कभी-कभी इससे सबूतों के साथ छेड़छाड़ या उन्हें नष्ट करने की कोशिश हो सकती है. हमारा यह मतलब नहीं है कि कोर्ट Criminal Proceeding रद्द करने की मांग में दाखिल अर्जी पर विचार करने के दौरान अंतरिम सुरक्षा का आदेश नहीं दे सकता, क्योंकि यह धारा किसी व्यक्ति की आजादी को बिना वजह गिरफ्तारी से बचाने के लिए है और हम कहते हैं कि ऐसे आदेश बहुत जरूरी मामलों में ही दिए जाने चाहिए.

किसी भी स्थिति में, जब गिरफ्तारी का वारंट या उद्घोषणा जारी की जाती है, तो आवेदक इस असाधारण शक्ति का इस्तेमाल करने का हकदार नहीं होता. बेशक, इससे न्याय के हित में बहुत ही खास या असाधारण मामलों में गिरफ्तारी से पहले जमानत देने की कोर्ट की शक्ति खत्म नहीं होती. लेकिन, जो व्यक्ति लगातार आदेशों की अवहेलना करते हैं और फरार रहते हैं, वे ऐसी राहत पाने के हकदार नहीं हैं.

इसी तरह, राकेश मेहता के मामले में, जिस पर विपक्षी पार्टी नंबर 2 के वकील ने भी ज़ोर दिया है, उत्तराखंड हाई कोर्ट ने पैराग्राफ नंबर 39 में यह कहा है:

“…..कानून का यह तय सिद्धांत है, जैसा कि माननीय सुप्रीम कोर्ट और अलग-अलग हाईकोर्ट्स ने कई फैसलों में माना है कि जिस आरोपी को ‘घोषित अपराधी’ करार दिया गया है, वह सरेंडर किए बिना FIR या उससे जुड़ी किसी भी Proceeding को रद्द करने की मांग नहीं कर सकता.

कोर्ट ऐसे व्यक्ति के पक्ष में अपने खास या अंतर्निहित अधिकार क्षेत्र का इस्तेमाल नहीं करेगा जो जानबूझकर कानूनी प्रक्रिया से बच रहा है और फरार है, या जिसे घोषित अपराधी करार दिया गया है. ऐसा आरोपी व्यक्ति Cr.P.C. की धारा 482 के तहत हाईकोर्ट के अधिकार क्षेत्र का इस्तेमाल करने के लिए किसी ‘पावर ऑफ अटॉर्नी होल्डर’ के पक्ष में ‘पावर ऑफ अटॉर्नी’ नहीं दे सकता.

 “एक और नजरिए से देखें तो, न तो ‘लुकआउट सर्कुलर’ और न ही ‘घोषित अपराधी’ करार दिए जाने को चुनौती दी गई है; इसलिए, ऐसी स्थिति में, ‘पावर ऑफ अटॉर्नी होल्डर’ के जरिए राकेश मेहरा की दायर याचिका सुनवाई के लायक नहीं मानी जा सकती.”

कोर्ट के लिए यह बताना भी जरूरी है कि इस मामले में भी आवेदकों ने Cr.P.C. की धारा 82 और 83 के तहत जारी गैर-जमानती वारंट और उद्घोषणा को चुनौती देने के लिए कोई कदम नहीं उठाए हैं. आवेदकों की ओर से दाखिल लिखित बयान में कहा गया है कि आवेदक को मिली धमकी के बारे में 3 दिसंबर, 2023 को शिकायत दर्ज कराने के बाद और 18 दिसंबर, 2023 को मौजूदा FIR दर्ज होने से पहले, आवेदक  भारत छोड़कर अपनी पत्नी के साथ UAE में रहने लगे थे.

बयान से पता चलता है कि जब आवेदकों ने भारत छोड़ा और जांच में सहयोग नहीं किया, तो अधिकारियों के पास उनके पासपोर्ट जब्त करने का आदेश देने के अलावा कोई और विकल्प नहीं बचा था. इसके खिलाफ उन्होंने इस कोर्ट में सिविल रिट याचिका दायर की, जिसमें उन्हें कोई अंतरिम राहत नहीं दी गई.
बेंच ने फैसले में कोट कराया

बेंच ने कहा कि पेश किये गये तथ्यों और कानून के स्थापित सिद्धांतों को देखते हुए वकील की इस दलील में दम है कि आवेदकों की ओर से दायर अर्जी सुनवाई योग्य नहीं है, क्योंकि उन्हें भगोड़ा घोषित किया जा चुका है.  रिकॉर्ड पर मौजूद सामग्री को देखने और इस स्टेज पर मामले के तथ्यों को देखते हुए यह नहीं कहा जा सकता कि आवेदकों के खिलाफ कोई अपराध नहीं बनता है.

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कोर्ट में दी गई सभी दलीलें तथ्यों से जुड़े विवादित सवालों से संबंधित हैं, जिन पर यह कोर्ट Cr.P.C. की धारा 482 के तहत फैसला नहीं कर सकता. इस स्टेज पर केवल प्रथम दृष्टया मामला देखा जाना है, जिसमें FIR/शिकायत में लगाए गए आरोपों को अगर पूरी तरह से भी माना जाए, तो वे प्रथम दृष्टया आरोपी के खिलाफ संज्ञेय अपराध  बनाते हैं.

APPLICATION U/S 528 BNSS No. 44666 of 2025  Rahul Sharma & Others V/s State of U.P. & Others

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