APO Preliminary Examination का मकसद सिर्फ स्क्रीनिंग, इसके अंक फाइनल रिजल्ट में नहीं जुड़ते, यूपी आरक्षण अधिनियम 1994 की धारा 3(6) का लाभ अंतिम चरण में मिलता है
इलाहाबाद हाई कोर्ट ने खारिज की एपीओ भर्ती में आरक्षण विवाद को लेकर दाखिल विशेष अपील, 28 जून से ही शुरू होगी मेंस मुख्य परीक्षा

इलाहाबाद हाई कोर्ट ने उत्तर प्रदेश लोक सेवा आयोग की तरफ से दिये गये इस तर्क पर सहमति जताई है कि Preliminary Examination का मकसद सिर्फ स्क्रीनिंग है. स्क्रीनिंग के जरिए कुल पदों के साक्षेप 15 गुना अभ्यर्थीयों का चयन किया गया है. Preliminary Examination में मिलने वाले अंकों को फाइनल रिजल्ट में नहीं जोड़ा जाता है इसलिए यूपी आरक्षण अधिनियम 1994 की धारा 3(6) का लाभ अंतिम चरण में मिलता है. इसको आधार मानते हुए इलाहाबाद हाई कोर्ट के दो जजों जस्टिस जेजे मुनीर और जस्टिस अरुण कुमार की बेंच ने सहायक अभियोजन अधिकारी भर्ती-2025 से जुड़ी विशेष अपील खारिज कर दी है.
दो जजों की बेंच की तरफ से सुनाये गये फैसले से तय हो गया है कि 28 जून से 30 जून के बीच आयोजित होने वाली मेंस परीक्षा अब निर्धारित शेडयूल के अनुसार ही होगी. न Preliminary Examination का रिजल्ट बदला जायेगा और ही मेंस परीक्षा की डेट चेंज होगी. कोर्ट के नियमों के चैप्टर VIII नियम 5 के तहत यह इंट्रा-कोर्ट अपील, रिट-A नंबर 9155/2026 में सिंगल जज द्वारा 18.06.2026 को पारित आदेश के खिलाफ दाखिल की गयी थी.
अपीलकर्ताओं ने रिट-A नंबर 9155/2026 दायर करके उत्तर प्रदेश पब्लिक सर्विस कमीशन द्वारा जारी 09.01.2020 के ऑफिस मेमोरेंडम और 30.04.2026 को घोषित असिस्टेंट प्रॉसिक्यूशन ऑफिसर (APO) Preliminary Examination -2025 के परिणाम को चुनौती दी थी. उन्होंने बेंच से ने ‘रिट ऑफ मैंडमस’ (आदेश) की मांग की थी जिसमें कमीशन को Preliminary Examination का परिणाम फिर से घोषित करने का निर्देश दिये जाने की प्रार्थना की गयी थी.
मांग की गयीथी कि आरक्षित श्रेणी के उन उम्मीदवारों को जिन्होंने अनारक्षित श्रेणी के कट-ऑफ से अधिक अंक प्राप्त किए हैं, पहले अनारक्षित श्रेणी में स्थानांतरित किया जाए और उसके बाद आरक्षित श्रेणियों के तहत मुख्य परीक्षा के लिए अर्हता प्राप्त करने वाले उम्मीदवारों की सूची फिर से तैयार की जाए.
बता दें कि उत्तर प्रदेश लोक सेवा आयोग सहायक अभियोजन अधिकारी पदों पर भर्ती के लिए प्रक्रिया शुरू कर चुका है. आवेदन की प्रक्रिया पूरी होने के बाद Preliminary Examination आयोजित की गयी. उत्तर प्रदेश लोक सेवा आयोग ने 30 अप्रैल 2026 को एपीओ Preliminary Examination-2025 का रिजल्ट घोषित कर दिया था.
पंकज वर्मा सहित तीन अभ्यर्थियों ने परीक्षा परिणाम को हाई कोर्ट में चुनौती दी थी. अभ्यर्थियों का कहना था कि आयोग ने उन आरक्षित वर्ग के मेधावी अभ्यर्थियों को अनारक्षित श्रेणी में स्थानांतरित नहीं किया, जिन्होंने सामान्य कट-ऑफ से अधिक अंक प्राप्त किए थे. उन्होंने यूपी आरक्षण अधिनियम 1994 की धारा 3(6) का हवाला देते हुए परिणाम फिर से घोषित करने की मांग की थी.
इलाहाबाद हाई कोर्ट की एकल बेंच ने पहले इस मामले की सुनवाई की. सिंगल बेंच ने 18 जून 2026 को प्रतिवादियों को तीन सप्ताह में जवाबी हलफनामा दाखिल करने का समय दिया और अंतरिम राहत की अर्जी को पक्षों की दलीलें पूरी होने के बाद सुनने का निर्देश दिया. चूंकि Mains Examination 28 जून से शुरू हो जानी थी और काउंटर और रिजवाइंडर दाखिल करने में समय लगने वाला था.

इसे देखते हुए अंतरित राहत की मांग के साथ अभ्यर्थियों ने डबल बेंच के समक्ष स्पेशल अपील दाखिल की थी. अभ्यर्थियों ने कहा कि एपीओ Mains Examination 28 से 30 जून 2026 के बीच होनी है. यदि अभी राहत नहीं मिली तो वे Mains Examination में शामिल होने का अवसर हमेशा के लिए खो देंगे और याचिका निरर्थक हो जाएगी.
आशुतोष श्रोत्रिय और अन्य बनाम वाइस-चांसलर, डॉ. बी.आर. अंबेडकर यूनिवर्सिटी और अन्य [2015 (6) ALJ 383] के फुल बेंच के फैसले और साथ ही हरिवंश उपाध्याय बनाम यूपी राज्य (स्पेशल अपील नंबर 232/2016, फैसला 18.03.2016) और केसर सिंह बनाम यूपी राज्य (स्पेशल अपील डिफेक्टिव नंबर 456/2025, फैसला 01.08.2025) के फैसलों का हवाला देते हुए तर्क दिया गया कि महत्वपूर्ण अधिकारों पर असर डालने वाले किसी बीच के आदेश की अपील के जरिए समीक्षा की जा सकती है.
गुण-दोष के आधार पर वकील ने सुप्रीम कोर्ट के ‘सौरव यादव बनाम उत्तर प्रदेश राज्य’ [(2021) 4 SCC 542] और ‘दीपेन्द्र यादव बनाम मध्य प्रदेश राज्य’ [2024 SCC OnLine SC 724] के फैसलों का हवाला देते हुए कहा कि आरक्षित श्रेणी के योग्य उम्मीदवारों को आरक्षित रिक्तियों के तहत नहीं गिना जा सकता, जब उनकी योग्यता उन्हें खुली श्रेणी (ओपन कैटेगरी) में विचार किए जाने का हकदार बनाती है.
आयोग की ओर से पेश वरिष्ठ वकील ने अपील की स्वीकार्यता (मेंटेनेबिलिटी) को लेकर एक प्रारंभिक आपत्ति उठाई. कहा कि जिस आदेश को चुनौती दी गई है, वह न तो किसी ठोस अधिकार का फैसला करता है और न ही किसी महत्वपूर्ण मामले पर निर्णय लेता है. यह आदेश केवल दलीलों (प्लीडिंग्स) को पूरा करने में मदद करता है ताकि विवाद पर सही तथ्यात्मक आधार पर विचार किया जा सके.
कहा गया कि Preliminary Examination केवल एक स्क्रीनिंग प्रक्रिया है जिसका उद्देश्य विज्ञापित रिक्तियों की संख्या से पंद्रह गुना तक उम्मीदवारों को शॉर्टलिस्ट करना है. चूंकि Preliminary Examination में प्राप्त अंक अंतिम चयन में नहीं जुड़ते हैं, इसलिए 1994 के अधिनियम की धारा 3(6) इस चरण में लागू नहीं होती है.
यह भी तर्क दिया कि संबंधित विज्ञापन में विशेष रूप से यह प्रावधान है कि आरक्षण का लाभ और माइग्रेशन (स्थानांतरण) अंतिम चयन के चरण में लागू होंगे, बशर्ते निर्धारित शर्तें पूरी हों. उन शर्तों के तहत प्रक्रिया में भाग लेने के बाद, अपीलकर्ताओं को परिणाम घोषित होने के बाद कार्यप्रणाली को चुनौती देने की अनुमति नहीं दी जा सकती है.
Preliminary Examination परिणाम का कोई भी पुनर्निर्धारण उन उम्मीदवारों को प्रभावित करेगा जो पहले ही मुख्य परीक्षा के लिए योग्य हो चुके हैं
अंत में यह तर्क दिया गया कि Preliminary Examination परिणाम का कोई भी पुनर्निर्धारण उन उम्मीदवारों को प्रभावित करेगा जो पहले ही मुख्य परीक्षा के लिए योग्य हो चुके हैं, फिर भी ऐसे किसी भी उम्मीदवार को रिट कार्यवाही में पक्षकार नहीं बनाया गया है. दोनों पक्षों के तर्कों को सुनने के बाद बेंच ने कहा कि कोर्ट के नियमों के अध्याय VIII नियम 5 के तहत अधिकार क्षेत्र तभी लागू होता है जब चुनौती दिया गया आदेश “निर्णय” (जजमेंट) की परिभाषा में आता हो.
इस शब्द से संबंधित सिद्धांतों को ‘आशुतोष श्रोत्रिय’ (सुप्रा) मामले में फुल बेंच द्वारा आधिकारिक रूप से समझाया गया है. पूर्ण पीठ ने माना है कि केवल दलीलों के आदान-प्रदान का निर्देश अंतरिम राहत से परोक्ष इनकार नहीं माना जा सकता. न ही ऐसा आदेश केवल इसलिए अपील योग्य हो जाता है कि वादी को कार्यवाही के दौरान प्रतिकूल परिणामों की आशंका हो. महत्वपूर्ण बात यह है कि क्या आदेश किसी ठोस अधिकार को पक्के तौर पर तय करता है या किसी ऐसे अहम मामले पर फैसला देता है जिसके नतीजे बदले नहीं जा सकते.
बेंच की तरफ से फैसला सुनाते हुए जस्टिस अरुण कुमार ने कहा कि ऊपर बताए गए सिद्धांतों के आधार पर परखने पर, 18.06.2026 का आदेश पूरी तरह से प्रक्रिया से जुड़ा हुआ है. संबंधित सिंगल जज ने न तो विवादित ऑफिस मेमोरेंडम की वैधता पर कोई फैसला सुनाया है और न ही अपील करने वालों द्वारा उठाए गए आरक्षण के मुद्दे के गुण-दोष पर कोई राय दी है.
यह आदेश केवल प्रतिवादियों को अपना पक्ष रिकॉर्ड पर रखने का मौका देता है और दलीलें पूरी होने तक अंतरिम राहत पर विचार को टाल देता है. इसलिए, हम यह नहीं मान सकते कि इस आदेश में अंतिम निर्णय जैसी विशेषताएं हैं जो इसे चैप्टर VIII नियम 5 के अर्थ में एक ‘जजमेंट’ (फैसला) बनाती हैं.
कोर्ट ने कहा कि हम इस दलील को भी स्वीकार नहीं कर सकते कि अंतरिम राहत की अर्जी पर विचार टालने से ही ऐसा अपूरणीय नुकसान होता है जिसके लिए अपील में दखल देना जरूरी हो. अपील करने वालों ने रिकॉर्ड पर ऐसा कोई सबूत पेश नहीं किया है जिससे यह साबित हो सके कि अगर 1994 के एक्ट की धारा 3(6) के बारे में उनकी व्याख्या मान भी ली जाए, तो भी वे Mains Examination में बैठने के योग्य उम्मीदवारों की सूची में निश्चित रूप से शामिल हो जाएंगे. इस तरह, अपूरणीय नुकसान का तर्क एक ऐसी धारणा पर आधारित है जिसका कोई तथ्यात्मक आधार नहीं है.

इसके अलावा, अपील करने वालों ने जो अंतरिम राहत मांगी है, वह रिट पिटीशन में दावा की गई आखिरी राहत से काफी हद तक मिलती-जुलती है. दोबारा किए गए Preliminary Examination रिजल्ट के आधार पर Mains Examination में हिस्सा लेने की इजाजत देना, असल में, खुद मुख्य राहत देने जैसा होगा. यह एक तय नियम है कि आखिरी राहत आम तौर पर बीच के स्टेज पर नहीं दी जानी चाहिए, सिवाय खास हालात के, जिनमें से कोई भी इस मामले में मौजूद नहीं दिखाया गया है.
वैसे भी, और सिंगल जज के सामने पेंडिंग विवाद के मेरिट पर कोई पक्की राय दिए बिना, हम पाते हैं कि कमीशन की तरफ से पेश की गई बात को बेबुनियाद नहीं कहा जा सकता. 1994 के एक्ट का सेक्शन 3(6) “मेरिट के आधार पर चुना गया” शब्द का इस्तेमाल करता है. पहली नजर में, यह नियम भर्ती प्रक्रिया के अगले फेज के लिए Preliminary Examination से कैंडिडेट्स को शॉर्टलिस्ट करने के मकसद से सिर्फ इंटरमीडिएट स्क्रीनिंग स्टेज के बजाय फाइनल सिलेक्शन के स्टेज पर काम करता हुआ लगता है.
इसी तरह, सौरव यादव (ऊपर) में फैसला फाइनल सिलेक्शन के मामले में रिजर्वेशन के सिद्धांतों को लागू करने से जुड़ा था, जबकि दीपेंद्र यादव (ऊपर) में फैसला मध्य प्रदेश राज्य में भर्ती को कंट्रोल करने वाले खास कानूनी नियमों पर आधारित था, जिसमें शुरुआती स्टेज में माइग्रेशन पर साफ तौर पर विचार किया गया था. मौजूदा सिलेक्शन को कंट्रोल करने वाले लागू भर्ती फ्रेमवर्क के तहत हमारे ध्यान में ऐसा कोई नियम नहीं लाया गया है.
हमें इस आपत्ति में भी दम लगता है कि जिन उम्मीदवारों पर Examination रिजल्ट के किसी भी दोबारा तय होने से बुरा असर पड़ सकता है, उन्हें इस कार्रवाई में शामिल नहीं किया गया है. चूंकि अपील खुद मेंटेनेबिलिटी के आधार पर फेल हो सकती है, इसलिए हम उस मुद्दे को सही स्टेज पर विद्वान सिंगल जज द्वारा विचार के लिए खुला छोड़ते हैं.
बताए गए कारणों से, हमारी राय है कि 18.06.2026 का ऑर्डर पूरी तरह से इंटरलोक्यूटरी और प्रोसिजरल है. यह न तो कोई ठोस अधिकार देता है और न ही इसमें कोर्ट के नियमों के चैप्टर VIII रूल 5 के तहत अपील जांच के लायक फैसले के गुण हैं. इसलिए स्पेशल अपील खारिज की जाती है.
बेंच ने किया कमेंट