Arrest memo के बिना गिरफ्तारी और जेल भेजना सुप्रीम कोर्ट के verdict का उल्लंघन, कोर्ट ने दिया आरोपित को रिहा करने का आदेश

Arrest memo नहीं दिया गया, न याची को न उनके बेटे को और न ही उनके वकील को. साथ ही गिरफ्तारी (Arrest) के आधार नहीं बताए गए, न लिखित रूप में, न मौखिक रूप में. परिजनों को सूचित भी नहीं किया गया. यह सुप्रीम कोर्ट के विहान कुमार बनाम हरियाणा राज्य (2025) के फैसले का खुला उल्लंघन है. इलाहाबाद उच्च न्यायालय ने गुजरात पुलिस द्वारा कपिल चुघ की गिरफ्तारी को अवैध करार देते हुए उन्हें तत्काल रिहा करने का आदेश दिया. जस्टिस सिद्धार्थ और जस्टिस विवेक सरन की खंडपीठ ने बंदी प्रत्यक्षीकरण याचिका की सुनवाई करते हुए यह आदेश दिया.
याचिकाकर्ता कपिल चुघ को पहले गुजरात पुलिस ने 20 अप्रैल 2026 को केंद्रीय जीएसटी एक्ट की धारा 132(1) और 132(5) के तहत गिरफ्तार (Arrest) किया था और वे साबरमती केंद्रीय जेल, अहमदाबाद में बंद थे. इसके बाद 8 मई 2026 को उत्तर प्रदेश के कासना पुलिस स्टेशन (गौतम बुद्ध नगर) ने उन्हें बी-वारंट के आधार पर गौतम बुद्ध नगर की अदालत में पेश किया. जिन्हें 14 दिन की न्यायिक हिरासत में भेज दिया गया.
कोर्ट ने कहा गुजरात से उत्तर प्रदेश लाते समय किसी मजिस्ट्रेट से ट्रांजिट रिमांड नहीं लिया गया. न्यायालय ने कहा कि केंद्रीय जीएसटी अधिनियम एक संपूर्ण संहिता है, जब उसके तहत अभियोजन चल रहा हो तो पुलिस द्वारा बीएनएस के तहत दूसरा मामला दर्ज करना उचित नहीं.
राज्य सरकार की ओर से कहा गया कि याची कानून का पालन करने वाला नागरिक नहीं है, वह गलत पते पर कंपनियां चलाता है और यदि रिहा हुआ तो अदालत में पेश नहीं होगा फरार हो सकता है. सरकार ने यह भी कहा कि गुजरात में पहले ही Arrest memo बन चुका था, इसलिए दोबारा बनाने की जरूरत नहीं थी.
कोर्ट ने इन दलीलों को अस्वीकार करते हुए कपिल चुघ की गिरफ्तारी (Arrest), हिरासत और रिमांड को अवैध एवं असंवैधानिक घोषित कर दिया और उन्हें तत्काल रिहा करने का आदेश दिया. हालांकि, न्यायालय ने स्पष्ट किया कि सरकार कानून के अनुसार नए सिरे से कार्रवाई करने के लिए स्वतंत्र हैं.
प्रक्रिया का पालन नहीं तो Arrest, Custody और Remand पूरी तरह अवैध, रिहाई का आदेश

इलाहाबाद उच्च न्यायालय ने कहा है कि प्रक्रिया का पालन नहीं तो Arrest, Custody और Remand पूरी तरह अवैध होता है, इसके साथ ही कोर्ट ने नितिन राजेश नामक व्यक्ति को तत्काल रिहा करने का आदेश दिया. जस्टिस सिद्धार्थ और जस्टिस विवेक सरन की खंडपीठ ने बंदी प्रत्यक्षीकरण याचिका की सुनवाई करते हुए यह आदेश दिया. कोर्ट ने कहा कि याची की गिरफ्तारी, हिरासत और रिमांड पूरी तरह अवैध है, कानूनी प्रक्रिया का पालन नहीं किया गया है.
केंद्रीय वस्तु एवं सेवा कर आयुक्त, मेरठ ने नितिन राजेश को सेंट्रल एक्साइज एक्ट 1944 की धारा 19(1)(बी) और 19(1)(i) के तहत गिरफ्तार (Arrest) किया था. विशेष मुख्य न्यायिक दंडाधिकारी, मेरठ ने 14 मई 2026 को रिमांड आदेश पारित किया था.
कोर्ट ने कहा गिरफ्तारी (Arrest) के दस्तावेजों पर डिन नंबर नहीं था जो कि विभाग के अपने ही 23 दिसंबर 2019 के सर्कुलर का उल्लंघन है. जो नंबर था वह हाथ से लिखा गया था, जो नियमों के विरुद्ध है. याची पहले से ही 25 अप्रैल 2026 से जेल में था, फिर भी गिरफ्तारी (Arrest) के कारणों में यह तथ्य छुपाया गया. गिरफ्तारी (Arrest) के आधार और “विश्वास के कारण” पर न तो प्रधान आयुक्त का हस्ताक्षर था, न ही मुहर.
बीएनएसएस 2023 की धारा 35(3) के तहत नोटिस भी नहीं दिया गया, जबकि अपराध 7 वर्ष तक की सजा वाला है और धारा 48 के तहत परिजनों को गिरफ्तारी (Arrest) की सूचना नहीं दी गई. रिमांड मजिस्ट्रेट ने बिना न्यायिक विवेक का इस्तेमाल किए यांत्रिक तरीके से रिमांड दे दी. कोर्ट ने स्पष्ट कहा कि याची को तत्काल रिहा किया जाए, यदि किसी अन्य मामले में वांछित न हो. साथ ही विभाग को यह छूट दी कि वह कानून के अनुसार नए सिरे से कार्रवाई कर सकता हैं.