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कहार, कश्यप, मल्लाह, निषाद और बिंद जातियों को मझवार caste की sub caste, पर्यायवाची या सामान्य रूप मानकर संविधान (SC) आदेश, 1950 में मझवार जाति के साथ शामिल नहीं किया जा सकता

इलाहाबाद हाई कोर्ट की लखनऊ बेंच ने गुण दोष के आधार पर खारिज की याचिका

कहार, कश्यप, मल्लाह, निषाद और बिंद जातियों को मझवार caste की sub caste, पर्यायवाची या सामान्य रूप मानकर संविधान (SC) आदेश, 1950 में मझवार जाति के साथ शामिल नहीं किया जा सकता

अनुसूचित जातियों (caste) और जनजातियों को शामिल करते समय राष्ट्रपति को यह अधिकार है कि वे नोटिफिकेशन को किसी caste के हिस्सों या समूहों तक सीमित कर सकें या किसी caste या sub caste को उनकी शैक्षिक और सामाजिक पिछड़ेपन के आधार पर पहचाना जा सकता है. यह भी संभव है कि किसी जाति या sub caste के केवल कुछ हिस्सों या समूहों को ही इसके लिए चुना जाए और यह भी हो सकता है कि उन्हें पूरे राज्य के बजाय राज्य के किसी खास हिस्से के लिए ही पहचाना जाए.

अगर सामाजिक और शैक्षिक पिछड़ेपन को देखते हुए ऐसा करना जरूरी समझा जाए. राज्यों के पास यह मौका था कि वे राज्यपालों के जरिए अपनी राय रख सकें, जब राष्ट्रपति ने उनसे किसी caste या sub caste, या उनके किसी हिस्से या समूह के बारे में सलाह-मशविरा किया हो. इस मामले और याचिकाकर्ता द्वारा उठाई गई बात पर कानून सुप्रीम कोर्ट की संविधान पीठ द्वारा मिलिंद मामले में तय किया जा चुका है.

उत्तर प्रदेश राज्य में कहार, कश्यप, मल्लाह, निषाद और बिंद जातियों (caste) को अन्य पिछड़ा वर्ग के रूप में मान्यता प्राप्त है. इसलिए, संसद द्वारा बनाए गए कानून के बिना उन्हें मझवार जाति की sub caste, पर्यायवाची या सामान्य रूप मानकर संविधान (अनुसूचित जाति) आदेश, 1950 में मझवार caste के साथ शामिल नहीं किया जा सकता है. इसके साथ ही इलाहाबाद हाई कोर्ट की लखनऊ बेंच के जस्टिस आलोक माथुर और अमिताभ कुमार राय की बेंच ने जगदीश सिंह की तरफ से दाखिल की गयी याचिका को गुण दोष के आधार पर खारिज कर दिया है.

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इस रिट सी याचिका में संविधान और हाई कोर्ट द्वारा रिट याचिका संख्या 9312/1988 में दिए गए आदेश के अनुसार मल्लाह और मझवार समुदायों (caste) को अनुसूचित जाति (caste) की सूची में शामिल करने का निर्देश दिये जाने की मांग की गयी थी. साथ ही उन्हें मात्रा के अनुसार कोटा तय करके अनुसूचित caste की सुविधाएं प्रदान करने की मांग उठायी गयी थी. कोर्ट से आग्रह किया गया था कि वह विपक्षी पक्षों को यह आदेश दे कि वे तय की गई समय-सीमा के भीतर इस आशय की एक राजपत्र अधिसूचना (गजट नोटिफिकेशन) जारी करें.

किसी caste को केवल संसद ही अनुच्छेद 341 के तहत ‘संविधान (अनुसूचित जाति) आदेश, 1950’ के अंतर्गत बनाए गए कानून के माध्यम से शामिल कर सकती है

स्थायी वकील ने शुरुआत में ही याचिकाकर्ता द्वारा मांगी गई राहत पर आपत्ति जताई. उन्होंने कहा कि इस रिट याचिका में मांगी गई राहत एक तरह से कानून बनाने जैसा है, क्योंकि किसी caste को केवल संसद ही भारत के संविधान के अनुच्छेद 341 के तहत ‘संविधान (अनुसूचित जाति) आदेश, 1950’ के अंतर्गत बनाए गए कानून के माध्यम से शामिल कर सकती है. तर्क दिया कि ‘स्टेट ऑफ महाराष्ट्र बनाम मिलिंद और अन्य’ (2001 (1) SCC 4) मामले में सुप्रीम कोर्ट की संविधान पीठ के फैसले को देखते हुए, किसी जाति को अनुसूचित caste घोषित करने का निर्देश देना संभव नहीं है.

आपत्ति का जवाब देते हुए याचिकाकर्ता की ओर से पेश हुए सीनियर वकील ने कहा कि अनजाने में, मांगी गई राहत का सही मतलब नहीं निकाला गया और इस रिट याचिका को दायर करने का मकसद निषाद, कश्यप, केवट, मल्लाह और बिंद समुदायों को मझवार caste का ही दूसरा नाम या सामान्य नाम माना जाए, यह मांग करना है.

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यह भी कहा कि राज्य सरकार ने भी नोटिफिकेशन नंबर 4/1/2002-Ka-2/2005 (तारीख 10.10.2005) के जरिए, उत्तर प्रदेश लोक सेवा (अनुसूचित जाति, अनुसूचित जनजाति और अन्य पिछड़ा वर्ग के लिए आरक्षण) अधिनियम, 1994 की धारा 13 के तहत मिली शक्तियों का इस्तेमाल करते हुए संशोधन किए थे. इन संशोधनों के तहत, केवट, मल्लाह, निषाद और बिंद caste को U.P. Act of 1994 के तहत पिछड़ा वर्ग को मिलने वाले फायदों के बजाय अनुसूचित जातियों को मिलने वाले फायदों का हकदार माना गया था.

भारत की जनगणना, 1961 द्वारा उत्तर प्रदेश के लिए जारी किए गए जनगणना मैनुअल, भाग- I के परिशिष्ट में परिशिष्ट-एफ के तहत सूची I का प्रावधान है, जिसमें अनुसूचित जातियों (caste) के नाम उनके पर्यायवाची या सामान्य नामों के साथ शामिल हैं, जिसमें क्रम संख्या 51 पर, caste मझवार को निम्नलिखित पर्यायवाची या सामान्य नामों के साथ संदर्भित किया गया है: मांझी (जिला उन्नाव और प्रतापगढ़); मुजबीर या मुजबिर (जिला बदायूँ); राजगोंड (जिला मिर्ज़ापुर); मल्लाह (जिला आगरा, इटावा, उन्नाव और लखनऊ); केवट (जिला-उन्नाव); और गोंड, मझवार. यह आगे प्रस्तुत किया गया है कि भार्गव बुक डिपो, वाराणसी द्वारा प्रकाशित आदर्श हिंदी शब्दकोष के अनुसार, “मांझी” शब्द का अर्थ नाविक, मल्लाह या केवट के रूप में वर्णित किया गया है.

तर्क का जोर यह था कि जातियां निषाद, केवट, मल्लाह और बिंद caste मझवार के पर्यायवाची हैं, क्योंकि वे एक ही समुदाय से हैं और एक ही पेशे में लगे नाविक हैं. याचिकाकर्ता के वकील ने सर्वोच्च न्यायालय द्वारा 2013 की सिविल अपील संख्या 7362, उड़ीसा राज्य बनाम दसरथी मेहर में पारित निर्णय और आदेश दिनांक 27.02.2018 पर भरोसा किया, जिसमें सर्वोच्च न्यायालय ने माना था कि “कुली” समुदाय के सदस्य भी अनुसूचित जनजाति के रूप में माने जाने के हकदार हैं और “कुली” को अनुसूचित जनजाति के रूप में मान्यता दी गई है.

उपरोक्त निर्णय में, सर्वोच्च न्यायालय, उसके समक्ष रखी गई सामग्री की सराहना करने के बाद, इस निष्कर्ष पर पहुंचा कि “कुलिस” नाम से कोई अलग समुदाय नहीं है और दोनों समुदाय, “कुली” और “कुलिस” एक ही हैं. स्थायी अधिवक्ता ने, मिलिंद (सुप्रा) के मामले पर भरोसा करते हुए, विशेष रूप से फैसले के पैराग्राफ 36 पर, प्रस्तुत किया है कि यह घोषित करने के लिए कोई जांच आयोजित करने की अनुमति नहीं है कि किसी भी caste या sub caste को एक प्रविष्टि के खिलाफ शामिल किया जा सकता है जिसमें ऐसी caste या sub caste का विशेष रूप से संविधान (अनुसूचित जनजाति) आदेश, 1950 में उल्लेख नहीं किया गया है.

यह कहना स्वीकार्य नहीं है कि कोई भी caste, sub caste, किसी जाति या समुदाय का हिस्सा या समूह संविधान (अनुसूचित जाति) आदेश, 1950 और संविधान (अनुसूचित जनजाति) आदेश, 1950 में उल्लिखित का पर्याय है, क्योंकि उन्हें संशोधित नहीं किया जा सकता है.

पक्षों के विद्वान वकीलों को सुनने के बाद, विचारणीय मुद्दा यह है कि क्या जातियां निषाद, कश्यप, केवट, मल्लाह और बिंद को मझवार caste का पर्यायवाची कहा जा सकता है, जिसे अनुसूचित जाति घोषित किया गया है और संविधान (अनुसूचित जाति) आदेश, 1950 में क्रम संख्या 52 पर जगह मिलती है और क्या वे समान लाभ के हकदार हैं.

कोर्ट ने कहा कि भारत के संविधान का अनुच्छेद 341 और 342 राष्ट्रपति को यह अधिकार देता है कि वे सार्वजनिक अधिसूचना जारी करके ऐसी जातियों (caste), नस्लों या जनजातियों (या उनके किसी हिस्से या समूह) को निर्दिष्ट करें, जिन्हें संविधान के उद्देश्यों के लिए किसी राज्य या केंद्र शासित प्रदेश के संबंध में अनुसूचित जाति या अनुसूचित जनजाति माना जाएगा.

आर्टिकल्स 341 और 342 की सीधी भाषा और स्पष्ट शर्तें बताती हैं कि राष्ट्रपति, इन आर्टिकल्स के क्लॉज (1) के तहत, किसी राज्य या केंद्र शासित प्रदेश के संबंध में—और अगर वह राज्य है, तो गवर्नर से सलाह लेने के बाद—सार्वजनिक नोटिफिकेशन के जरिए उन जातियों (caste), नस्लों या जनजातियों, या जातियों, नस्लों या जनजातियों के हिस्सों या समूहों को बता सकते हैं, जिन्हें संविधान के उद्देश्यों के लिए उस राज्य या केंद्र शासित प्रदेश के संबंध में अनुसूचित जाति या अनुसूचित जनजाति माना जाएगा.

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इन आर्टिकल्स के क्लॉज (2) के तहत, क्लॉज (1) के तहत जारी नोटिफिकेशन में संसद द्वारा बनाए गए कानून के अलावा किसी बाद के नोटिफिकेशन से कोई बदलाव नहीं किया जा सकता है. इसका मतलब है कि केवल संसद ही कानून बनाकर इन आर्टिकल्स के क्लॉज (1) के तहत जारी नोटिफिकेशन में बताई गई अनुसूचित जातियों और अनुसूचित जनजातियों की सूची में किसी caste या sub caste को शामिल करने या उससे बाहर करने के लिए अधिकृत है.

कोर्ट ने कहा कि याचिकाकर्ता के वकील द्वारा दशरथी मेहर मामले का हवाला देना गलत है, क्योंकि दशरथी मेहर मामले में “कुलिस” (Kulis) नाम की कोई अलग जाति नहीं मानी गई थी, बल्कि उसे “कुली” (Kuli) जाति के समान ही माना गया था. इस मामले में निषाद, केवट, मल्लाह और बिंद जातियों को अलग जातियों (caste) के रूप में मान्यता दी गई है और राज्य सरकार ने U.P. एक्ट 1994 के तहत इन्हें ‘अन्य पिछड़ा वर्ग’ (OBC) की श्रेणी में रखा है.

असल में बी. बसवलिंगप्पा मामले में सरकार का एक खास आदेश था जिसमें कहा गया था कि “वोड्डा” समुदाय को भविष्य में सभी सरकारी बातचीत और रिकॉर्ड में “बोई” कहा जाएगा और विचार का मुद्दा स्पेलिंग में बदलाव से जुड़ा था.

भैया लाल मामले में जो बी. बसवलिंगप्पा मामले के फैसले के बाद आया था, सुप्रीम कोर्ट ने बी. बसवलिंगप्पा मामले में दिए गए फैसले पर विचार किया और कहा कि  विचार का सवाल यह था कि क्या “वोड्डार” caste का कोई व्यक्ति आदेश में बताई गई अनुसूचित जाति “भोवी” से संबंधित है और क्या इस सवाल पर जांच करना सही है.

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कोर्ट ने उन खास और असामान्य परिस्थितियों का विस्तार से जिक्र किया जिनके आधार पर हाई कोर्ट ने माना था कि आदेश के अर्थ में “वोड्डार” caste और “भोवी” जाति एक ही हैं और कहा कि आम तौर पर नियम यह है कि सबूत पेश करके आदेश में कोई बदलाव करना सही नहीं है.

याचिकाकर्ता के वकील ने पंजाब राज्य और अन्य बनाम दविंदर सिंह और अन्य मामले (रिपोर्ट: (2025) 1 SCC 1) में सुप्रीम कोर्ट की संविधान पीठ के फैसले का हवाला देते हुए कहा कि निषाद, केवट, मल्लाह और बिंद जातियां मझवार की sub caste हैं और दविंदर सिंह मामले में सुप्रीम कोर्ट द्वारा तय किए गए कानून के अनुसार इस तरह का उप-वर्गीकरण सही है.

कोर्ट ने कहा कि याचिकाकर्ता के वकील ने दविंदर सिंह मामले में फैसले का हवाला देते हुए जो तर्क दिया, वह पूरी तरह से गलतफहमी पर आधारित है. उस मामले में संविधान पीठ के सामने मुद्दा यह था कि क्या अनुसूचित जातियों के भीतर उप-वर्गीकरण की अनुमति है या नहीं.

सुप्रीम कोर्ट ने निष्कर्ष निकाला कि संविधान के अनुच्छेद 341(1) में इस्तेमाल किए गए शब्द “डीम्ड” का मतलब है कि राष्ट्रपति द्वारा अधिसूचित जातियों या समूहों को अनुसूचित जाति माना जाएगा और सूची में शामिल जातियों को वे लाभ मिलेंगे जो संविधान अनुसूचित जातियों को देता है. कोर्ट ने यह भी निष्कर्ष निकाला कि अनुसूचित जातियों के भीतर उप-वर्गीकरण अनुच्छेद 341(2) का उल्लंघन नहीं करता है क्योंकि जातियां अपने आप में सूची में शामिल या उससे बाहर नहीं की जाती हैं.

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उप-वर्गीकरण प्रावधान का उल्लंघन तभी करेगा जब अनुसूचित जातियों के भीतर कुछ जातियों या समूहों को उस वर्ग के लिए आरक्षित सभी सीटों पर प्राथमिकता या विशेष लाभ दिया जाए.

दविंदर सिंह मामले में सुप्रीम कोर्ट का फैसला संविधान के अनुच्छेद 341(1) के तहत राष्ट्रपति के आदेश से पहले से अधिसूचित अनुसूचित जातियों के उप-वर्गीकरण से जुड़े एक अलग मुद्दे से संबंधित है न कि उन जातियों को अनुसूचित जाति के रूप में मान्यता देने से जो संविधान (अनुसूचित जाति) आदेश, 1950 के तहत अधिसूचित नहीं हैं. इसलिए, दविंदर सिंह मामले में दिया गया फैसला मौजूदा मामले के तथ्यों और परिस्थितियों पर लागू नहीं होता है.

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