बिना दोष Employee को दंडित करने का चेयरमैन और एमडी का आदेश रद, बकाया का भुगतान 2 माह में करने का आदेश

इलाहाबाद हाईकोर्ट ने चेयरमैन व प्रबंध निदेशक उप्र कोआपरेटिव फेडरेशन लिमिटेड लखनऊ को Employee याची को बिना दोष दंडित करने के आदेशों को रद कर दिया है और दो माह में बकाया Salarie और सेवानिवृत्ति परिलाभो (Pension etc.) सहित निलंबन काल का बकाए वेतन का भुगतान करने का निर्देश दिया. यह आदेश जस्टिस विक्रम डी चौहान ने Employee भंडार नायक गुलाब चंद्र वर्मा की याचिका को स्वीकार करते हुए दिया है.
याचिका पर अधिवक्ता राधेकृष्ण पांडेय व मनीष पांडेय ने बहस की. इनका कहना था कि दर्ज एफआईआर की विवेचना में याची Employee के पक्ष में फाइनल रिपोर्ट को अदालत ने स्वीकार कर लिया. इसमें याची Employee निर्दोष पाया गया. विभागीय जाँच रिपोर्ट में भी Employee को निर्दोष पाया गया इसके बावजूद प्रबंध निदेशक ने प्रतिकूल प्रविष्टि के साथ Employee के दो इंक्रीमेंट स्थाई रूप से रोकने का आदेश दिया. अपील भी चेयरमैन ने खारिज कर दी.
बता दें कि 19 दिसंबर 2013 को एसडीओ ज्ञानपुर ने पीसीएफ गोदाम थानीपुर, संत रविदास नगर भदोही का निरीक्षण किया. उन्होंने देखा कि खाद एक ट्रक में लोड की जा रही थी बिना इन्वाइस व रिलीज आदेश के. उनकी इस सूचना पर प्रथम सूचना रिपोर्ट दर्ज करायी गयी. इसके बाद Employee कर्मचारी के खिलाफ विभागीय जांच बैठा दी गई.
पुलिस रिपोर्ट में याची के खिलाफ कुछ नहीं मिला तो फाइनल रिपोर्ट दाखिल की गई. कोर्ट ने स्वीकार भी कर लिया. विभागीय जांच में याची Employee ने आरोप पत्र का जवाब दिया. बताया रिलीज आदेश पर ही खाद लोग की जा रही थी. जांच अधिकारी ने भी याची के पक्ष में रिपोर्ट दी. किंतु प्रबंध निदेशक ने याची को कारण बताओ नोटिस दी. इस पर कर्मचारी की तरफ से अपना जवाब दाखिल किया गया. जवाब में कहा कि यदि रिलीज आदेश था तो निरीक्षण टीम को क्यों नहीं दिखाया. ऐसा करके Employee ने घोर लापरवाही बरती है और दंडादेश जारी किया.
Employee ने दण्डादेश के खिलाफ अपील में अपना पूरा पक्ष रखा और आदेश को खारिज करने की मांग की लेकिन यहां से उसे कोई राहत नहीं मिली और अपील भी खारिज कर दी गई. इन दोनों आदेशों को हाई कोर्ट में चुनौती दी गयी. कोर्ट ने कहा आपराधिक केस में Employee छूट गया, विभागीय जांच में भी पक्ष में रिपोर्ट आई. इसके बावजूद काल्पनिक अवधारणा पर दंडित करना वैध नहीं कहा जा सकता. कोर्ट ने प्रबंध निदेशक व चेयरमैन के आदेश रद करते हुए बकाया वेतन सहित सेवानिवृत्ति परिलाभो का भुगतान करने का निर्देश दिया है.
रिटायरमेंट के 6 साल बाद Employee की पेंशन दोबारा तय करने पर रोक, हाई कोर्ट ने एसएसपी झांसी से पूछा शासनादेश व कोर्ट आदेश के खिलाफ कैसे पास किया आदेश
इलाहाबाद हाईकोर्ट ने सेवानिवृत्ति के 6 साल बाद मिल रही Employee की पेंशन दोबारा तय करने के आदेश पर रोक लगा दी है और एसएसपी झांसी से व्यक्तिगत हलफनामा दाखिल कर स्पष्टीकरण देने को कहा है कि शासनादेश 16 जनवरी 2007 व सुशील कुमार सिंघल केस के फैसले के विपरीत आदेश कैसे पास किया. याचिका की सुनवाई 21 जुलाई को होगी.
जस्टिस अनीश कुमार गुप्ता की एकल पीठ ने कुंवर सिंह की याचिका की सुनवाई करते हुए यह आदेश दिया है. याचिका पर अधिवक्ता बीएन सिंह राठौर ने बहस की. याची Employee की पेंशन को वरिष्ठ पुलिस अधीक्षक झांसी ने 3 दिसंबर 2025 और 10 दिसंबर 2025 के आदेशों से प्राप्त अंतिम वेतन के आधार पर दोबारा तय कर दिया था. यह कार्रवाई सेवानिवृत्ति के 6 साल बाद की गई.
याची अधिवक्ता का तर्क था कि 16 जनवरी 2007 के शासनादेश के मुताबिक सेवानिवृत्ति से पहले हुई वेतन निर्धारण की गलती के आधार पर 34 महीने बाद सेवानिवृत्ति लाभ नहीं घटाए जा सकते. सुप्रीम कोर्ट इस शासनादेश को सुशील कुमार सिंघल केस में कोर्ट ने सही माना है. कोर्ट ने एसएसपी, झांसी को व्यक्तिगत हलफनामा दाखिल कर यह बताने को कहा कि शासनादेश और सुप्रीम कोर्ट के फैसले का उल्लंघन कर आदेश कैसे जारी हुए.