पत्नी के पक्ष में जारी भरण-पोषण Recovery warrant रद्द, हाईकोर्ट ने कहा सीपीसी की धारा 128 के उपबंधो के तहत की जा सकती है गुजारे भत्ते की वसूली

याचिकाकर्ता के अधिवक्ता संजय कुमार पांडेय ने अदालत के समक्ष दलील दी कि परिवार अदालत का आदेश सुप्रीम कोर्ट के *रजनेश बनाम नेहा एवं अन्य मामले के पैरा 132 में तय कानून पर विचार किए बिना पारित किया गया.
सुप्रीम कोर्ट ने उस फैसले में स्पष्ट किया था कि भरण-पोषण आदेशों का प्रवर्तन हिंदू विवाह अधिनियम, 1956 की धारा 28ए, घरेलू हिंसा अधिनियम की धारा 20(6), या सीआरपीसी की धारा 128 के तहत किया जा सकता है, लेकिन Recovery सिविल न्यायालय की डिक्री की तरह सिविल प्रक्रिया संहिता के प्रावधानों विशेष रूप से धारा 51, 55, 58, 60 तथा आदेश 21 के अनुसार होनी चाहिए.
परिवार अदालत ने सीपीसी में निर्धारित प्रक्रिया का पालन किए बिना ही सीधे Recovery warrant जारी कर दिया
अधिवक्ता ने तर्क दिया कि परिवार अदालत ने सीपीसी में निर्धारित प्रक्रिया का पालन किए बिना ही सीधे Recovery warrant जारी कर दिया, जो कानूनन गलत है. जस्टिस दीपक वर्मा की एकलपीठ ने माना कि यह मामला पूरी तरह से कानून के तय सिद्धांत से जुड़ा है और इसमें विचार के लिए कोई अन्य बिंदु शेष नहीं है.
कोर्ट ने कहा 16 अप्रैल 2025 का Recovery warrant रद्द किया जाता है. संबंधित अदालत भरण-पोषण की बकाया राशि को सिविल न्यायालय की डिक्री के रूप में ही पी सी के प्रावधानों और रजनेश मामले में सुप्रीम कोर्ट द्वारा निर्धारित कानून के अनुसार वसूल करने के लिए स्वतंत्र होगी.
इस फैसले से यह स्पष्ट है कि भरण-पोषण की वसूली में सीधे Recovery warrant जारी करने की बजाय सीपीसी में निर्धारित प्रक्रिया अपनाई जानी चाहिए, जैसा कि सुप्रीम कोर्ट रजनेश बनाम नेहा मामले में पहले ही स्पष्ट कर चुका है.
वैवाहिक विवाद में समझौते पर आपराधिक कार्यवाही निरस्त
इलाहाबाद उच्च न्यायालय ने एक महत्वपूर्ण आदेश पारित करते हुए वैवाहिक विवाद से संबंधित थाना काकादेव, जनपद कानपुर नगर, से उत्पन्न समस्त आपराधिक कार्यवाही को पक्षकारों के बीच हुए समझौते के आधार पर रद कर दिया. न्यायालय ने धारा 528 बीएनएसएस के अंतर्गत दायर याचिका को स्वीकार करते हुए ट्रायल कोर्ट में लंबित संपूर्ण कार्यवाही समाप्त कर दी.
जस्टिस चवन प्रकाश की एकलपीठ ने यह पाया कि दोनों पक्ष न्यायालय के बाहर विवाद का सौहार्दपूर्ण समाधान कर चुके हैं. समझौते का सत्यापन भी ट्रायल कोर्ट द्वारा 07 अप्रैल 2026 को किया जा चुका था. ऐसे में मुकदमे को आगे चलाने का कोई औचित्य शेष नहीं है.
न्यायालय ने अपने आदेश में सर्वोच्च न्यायालय के विभिन्न महत्वपूर्ण निर्णयों का उल्लेख करते हुए कहा कि पक्षकारों के बीच हुए समझौते के आधार पर आपराधिक कार्यवाही को समाप्त किया जा सकता है. इसी सिद्धांत के आधार पर ट्रायल कोर्ट में लंबित संपूर्ण कार्यवाही को निरस्त कर याचिका स्वीकार कर ली गई. याचिकाकर्ताओं की ओर से अधिवक्ता प्रारब्ध पांडेय ने बहस की. राज्य सरकार की ओर से अपर शासकीय अधिवक्ता ने तथा विपक्षी पक्ष की ओर से अधिवक्ता ने न्यायालय के समक्ष पक्ष रखा.