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Dowry के कारण हुई मौत (IPC की धारा 304-B ) के मामलों में सही आरोप तय करना ट्रायल कोर्ट की जिम्मेदारी

इलाहाबाद हाई कोर्ट ने Dowry death के आरोपित को ट्रायल कोर्ट से सुनायी गयी सजा को किया रद्द, प्रदेश के सभी न्यायिक अधिकारियों के लिए जारी किये निर्देश

Dowry के कारण हुई मौत (IPC की धारा 304-B ) के मामलों में सही आरोप तय करना ट्रायल कोर्ट की जिम्मेदारी

इलाहाबाद हाई कोर्ट ने एक महत्वपूर्ण फैसले में कहा है कि Dowry के कारण हुई मौत के मामलों में सही आरोप तय करना ट्रायल कोर्ट की जिम्मेदारी है. Dowry death के मामलों में जांच के दौरान जांच अधिकारियों द्वारा इकट्ठा किए गए सबूतों को आरोप तय करते समय ध्यान से देखा जाना चाहिए और अगर IPC की धारा 302 के तहत आरोप का समर्थन करने के लिए सीधे या परिस्थितिजन्य सबूत मौजूद हों, तो ट्रायल कोर्ट का यह कर्तव्य है कि वह IPC की धारा 302 के तहत आरोप तय करे और IPC की धारा 304-B (Dowry death) के तहत वैकल्पिक आरोप भी तय करे.

IPC की धारा 302 को बिना सोचे-समझे नहीं जोड़ा जाना चाहिए; इसे तभी जोड़ा जाना चाहिए जब जांच के दौरान इकट्ठा किए गए सबूत IPC की धारा 302 के तहत आरोप तय करने (Dowry death) का समर्थन करते हों. जस्टिस सलिल कुमार राय और जस्टिस डॉ. अजय कुमार-II की बेंच ने कहा कि 302 के तहत आरोप (Dowry death) मुख्य आरोप होना चाहिए न कि वैकल्पिक. इस तरह के मामले साफ तौर पर हत्या को दर्शाते हैं और इसलिए ऐसे मामलों में मुख्य आरोप तय करना जरूरी है.

दो जजों की बेंच ने प्रदेश भर के लोअर कोर्ट में जज की भूमिका निभाने वाले जजेज से उम्मीद की है कि ट्रायल कोर्ट दहेज के कारण हुई मौत (Dowry death) से जुड़े मामलों में सही आरोप तय करेंगे. कोर्ट ने फैसले की कापी रजिस्ट्रार (अनुपालन) के जरिए उत्तर प्रदेश राज्य के सभी न्यायिक अधिकारियों को भेजने का निर्देश दिया है.

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इन चर्चाओं और व्यवस्था तय करने के साथ कोर्ट में जीवित अपीलकर्ता चंद्र भान की अपील मंजूर कर ली है. कोर्ट ने चंद्र भान के लिए इटावा के पहले अतिरिक्त सत्र न्यायाधीश द्वारा सत्र परीक्षण संख्या 190/1988 (राज्य बनाम चंद्र भान) में 04.10.1989 को पारित फैसला और आदेश जो केस क्राइम नंबर 101/1988 (IPC की धारा 302 और दहेज निषेध अधिनियम की धारा 3/4, पुलिस स्टेशन- कोतवाली, जिला इटावा) से संबंधित था को रद्द कर दिया है. कोर्ट ने अपीलकर्ता चंद्र भान को उन सभी आरोपों से बरी कर दिया है जिसके लिए उन पर मुकदमा चलाया गया था.

इस आपराधिक अपील में इटावा के प्रथम अतिरिक्त सत्र न्यायाधीश द्वारा 04.10.1989 को दिए गए फैसले को चुनौती दी गई थी. यह फैसला सत्र वाद संख्या 190/1988 (राज्य बनाम चंद्रभान) और सत्र वाद संख्या 256/1988 (राज्य बनाम जयराम) से संबंधित था, जो केस क्राइम नंबर 101/1988 (धारा 302 आईपीसी और दहेज निषेध अधिनियम की धारा 3/4, थाना- कोतवाली, जिला इटावा) से उत्पन्न हुए थे.

ट्रायल कोर्ट ने धारा 304-B (Dowry death) और 498-A आईपीसी के तहत दोषी ठहराया और सजा सुनाई

ट्रायल कोर्ट ने आरोपी-अपीलकर्ताओं जयराम और चंद्रभान को धारा 304-B और 498-A आईपीसी के तहत दोषी ठहराया था और दोनों को धारा 304-B आईपीसी (Dowry death) के तहत आजीवन कठोर कारावास तथा धारा 498-A आईपीसी के तहत तीन साल के कठोर कारावास की सजा सुनाई थी.

यह अपील दोषी ठहराए गए चंद्रभान और जयराम ने दायर की थी. आरोपी चंद्रभान और जयराम पर सत्र वाद संख्या 190/1988 और सत्र वाद संख्या 256/1988 में अलग-अलग मुकदमा चलाया गया था और दोनों को 04.10.1989 के एक ही फैसले में दोषी ठहराया गया था. इस आपराधिक अपील के लंबित रहने के दौरान एक अपीलकर्ता जयराम की मृत्यु हो गई.

तथ्यों के अनुसार शिकायतकर्ता महेश चंद्र (मृतक मुन्नी देवी के पिता) ने 01.03.1988 को सुबह 5:45 बजे अपीलकर्ता-आरोपी चंद्र भान और तीन अन्य लोगों के खिलाफ FIR दर्ज कराई थी. उनका कहना था कि उनकी बेटी मुन्नी देवी की शादी लगभग 8-9 महीने पहले इटावा के साकुवा गाँव के रहने वाले बद्री प्रसाद के बेटे, आरोपी चंद्र भान से हुई थी. शादी के समय वे अपनी बेटी को Dowry में स्कूटर नहीं दे पाए थे, इसलिए आरोपी चंद्र भान और उसके परिवार वाले उनकी बेटी को परेशान करते थे.

अक्टूबर 1987 में जब चंद्र भान उनकी बेटी के साथ उनके घर आया, तो बेटी ने उन्हें बताया कि ससुराल वाले Dowry में स्कूटर न देने के कारण उसे शारीरिक रूप से प्रताड़ित करते थे और कहते थे कि या तो स्कूटर दें या 10,000 रुपये नकद दें, वरना उसे गंभीर परिणाम भुगतने होंगे. 29.02.1988 को उन्हें खबर मिली कि उनकी बेटी मुन्नी देवी जल गई है.

इस सूचना पर वे इटावा शहर के मोहल्ला मढ़ैया खयालीराम पहुँचे और उन्हें पता चला कि उनकी बेटी जलकर मर गई है. श्री शिव सिंह, दीन दयाल और उस इलाके के अन्य लोगों ने उन्हें बताया उनकी बेटी की मौत हो गई है. Dowry की माँग पूरी न होने के कारण, आरोपी-अपीलकर्ताओं (जिनमें श्री प्रभु दयाल की पत्नी और बद्री प्रसाद भी शामिल थे, जो घटना के समय मोहल्ला खयालीराम में किराए के मकान में रह रहे थे) ने उनकी बेटी को जलाकर मार डाला.

पुलिस ने शिकायत के आधार पर रिपोर्ट दर्ज की और विवेचना के बाद विवेचनाधिकारी ने गवाहों के बयान के साथ कोर्ट में चार्जशीट दाखिल की. इसके बाद, इस पर संज्ञान लिया गया और मामले को सेशन कोर्ट में भेज दिया गया. दोनों पक्षों की बात सुनने के बाद अपीलकर्ताओं के खिलाफ IPC की धारा 498A और 304-B (Dowry death) के तहत आरोप तय किए गए.

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अभियोजन पक्ष के सबूत पूरे होने के बाद, आरोपी व्यक्तियों के बयान Cr.P.C. की धारा 313 के तहत दर्ज किए गए. सभी पक्षों को सुनने और रिकॉर्ड पर उपलब्ध साक्ष्यों को परखने के बाद ट्रायल कोर्ट ने आरोपी-अपीलकर्ता चंद्र भान और जयराम को दोषी ठहराया और सजा सुनाई. उस फैसले से असंतुष्ट होकर दोषियों की तरफ से अपील दायर की गई.

अपीलकर्ता के वकील ने तर्क दिया कि विवादित फैसला गैर-कानूनी और गलत है, निचली अदालत ने अभियोजन पक्ष के सबूतों पर ठीक से विचार किए बिना उन्हें गैर-कानूनी और गलत तरीके से आरोपों का दोषी ठहराया. कहा गया कि अभियोजन पक्ष उस कहानी को साबित करने में नाकाम रहा है जिसे वह साबित करना चाहता था.

अभियोजन पक्ष की कहानी पूरी तरह से इस आरोप पर आधारित है कि Dowry की अतिरिक्त मांग पूरी न होने के कारण मृतका को परेशान किया जाता था. लेकिन ऐसा कोई सबूत पेश नहीं किया जिससे पता चले कि स्कूटर/रकम की मांग को लेकर पीड़िता के साथ क्रूरता की जा रही थी.

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राज्य की ओर से एजीए ने इस अपील का विरोध किया और कहा कि निचली अदालत द्वारा सुनाए गए विवादित फैसले में कानून या तथ्य की कोई गैर-कानूनी बात या गलती नहीं है, जिसके कारण इस कोर्ट को दखल देने की जरूरत पड़े. निचली अदालत ने मामले के किसी भी पहलू को छोड़े बिना, रिकॉर्ड पर मौजूद सबूतों के आधार पर अभियोजन पक्ष के मामले की बारीकी से जांच की है.

बेंच ने कहा कि वर्तमान मामले में यह माना गया है कि अपीलकर्ता-आरोपी चंद्र भान और सह-आरोपी सुनीता अलग-अलग रह रहे थे. मृतक ने विशेष रूप से कहा है कि अपीलकर्ता और अन्य दो सह-आरोपियों ने उस पर केरोसिन तेल डाला और उसके बाद उसे जला दिया, लेकिन अभियोजन पक्ष के सबूतों में स्पष्ट रूप से यह बात सामने आई है कि मृतक इस बात से परेशान थी कि अपीलकर्ता-आरोपी चंद्र भान सह-आरोपी सुनीता के परिवार का भरण-पोषण कर रहा था, क्योंकि उसे (चंद्र भान को) सह-आरोपी सुनीता के मृतक पति, जो उसका बड़ा भाई था, की जगह सरकारी नौकरी मिली थी.

मृतक ने 29.11.1987 के अपने पत्र में स्पष्ट रूप से कहा है कि अपीलकर्ता-आरोपी चंद्र भान सह-आरोपी सुनीता के घर पर रहता था और रात में भी वहीं रुकता था. कोर्ट ने कहा कि इस पृष्ठभूमि में, हमने मौखिक और दस्तावेजी चिकित्सा साक्ष्यों का सावधानीपूर्वक अध्ययन किया है, जो स्पष्ट रूप से संकेत देते हैं कि अपीलकर्ता-आरोपी चंद्र भान ही अपनी पत्नी (मृतक) को अस्पताल ले गया था और इस घटना में उसे भी जलने से चोटें आई थीं.

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हमने इस नतीजे पर पहुँचते हुए पाया है कि अपील करने वाले आरोपी चंद्र भान के लिए, शाम करीब 6 बजे ऑफिस के बाद घर लौटने पर अपनी पत्नी को जलते हुए देखकर उसे बचाने की कोशिश करने की संभावना ज्यादा है. रिकॉर्ड में यह बात आई है कि आरोपी भी जलने से घायल हुआ था और वह मृतका को घायल (जली हुई) हालत में अस्पताल ले गया था. रिकॉर्ड में यह भी है कि शिकायतकर्ता अस्पताल में अपील करने वाले आरोपी चंद्र भान से मिला था, जो अपनी पत्नी को भर्ती कराने के बाद अस्पताल से भागा नहीं था.

मृतका के शरीर पर जलने के घावों के अलावा ऐसी कोई चोट नहीं थी जो मौत से पहले अपीलकर्ता द्वारा उसे शारीरिक रूप से प्रताड़ित किए जाने का संकेत देती हो. अभियोजन पक्ष यह साबित करने में भी नाकाम रहा है कि FIR में नामजद सभी आरोपी एक ही छत के नीचे रहते थे. घटना में अपील करने वाले आरोपी चंद्र भान को लगी जलने की चोटों के बारे में अभियोजन पक्ष की ओर से कोई स्पष्टीकरण नहीं दिया गया है.

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इसलिए, हमारी राय है कि मरने से पहले दिए गए बयान (डाइंग डिक्लेरेशन) पर भी शक की गुंजाइश है. मौजूदा मामले में सिर्फ मरने से पहले दिए गए बयान के आधार पर ही जीवित अपीलकर्ता को दोषी नहीं ठहराया जा सकता. घटना 1988 की है, इसलिए उचित आरोप तय करने के बाद अपीलकर्ता पर दोबारा मुकदमा चलाने के लिए मामले को निचली अदालत (ट्रायल कोर्ट) में वापस भेजना भी सही नहीं होगा.

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