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Evidence उचित संदेह से परे प्रमाणित नहीं तो संदेह का लाभ आरोपित को, 38 साल पुराने हत्या के मामले में दो भाइयों की सजा रद्द

Evidence उचित संदेह से परे प्रमाणित नहीं तो संदेह का लाभ आरोपित को, 38 साल पुराने हत्या के मामले में दो भाइयों की सजा रद्द

इलाहाबाद हाईकोर्ट ने कहा है कि Evidence उचित संदेह से परे प्रमाणित नहीं तो संदेह का लाभ आरोपित को भी दिया जाना चाहिए. इस कमेंट के साथ कोर्ट ने Evidence उचित संदेह से परे प्रमाणित न न होना मानते हुए मुरादाबाद के एक चर्चित हत्या मामले में सत्र न्यायालय के 1987 के फैसले को पलटते हुए चितेंद्र सिंह और मुनेश को बरी कर दिया है. यह मामला मुरादाबाद के बनियाठेर थाना क्षेत्र के विजयपुर गांव से जुड़ा था, जहां 4 अगस्त 1986 को जमीन विवाद को लेकर हुई झड़प में रामवीर सिंह नामक व्यक्ति की मौत हो गई थी.

अभियोजन पक्ष के अनुसार, प्रथम सूचना रिपोर्ट में आरोप था कि तिकम सिंह अपने बेटों चितेंद्र और मुनेश के साथ हथियारों से लैस होकर खेत में पहुंचे और खेती कर रहे रामपाल सिंह के परिवार पर हमला कर दिया, जिसमें रामवीर सिंह की मौत हो गई तथा दुर्गपाल व मनोहर सिंह घायल हुए. Evidence के आधार पर सत्र न्यायालय ने चितेंद्र सिंह को धारा 302 के तहत आजीवन कारावास तथा मुनेश को धारा 323 के तहत सजा सुनाई थी.

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आरोपियों का कहना था कि विवादित जमीन तिकम सिंह के कब्जे में थी, जिस पर लंबे समय से सिविल मुकदमेबाजी चल रही थी. उनके अनुसार, जब उन्होंने खेत जोतने पर आपत्ति जताई, तो सामने वाले पक्ष ने तिकम सिंह पर हमला कर 20 चोटें पहुंचाईं. Evidence के आधार पर कहा गया कि तिकम सिंह का दाहिना हाथ पहले से ही कटा हुआ था. यह देखकर उनके बेटों ने पिता को बचाने के लिए हथियार छीनकर आत्मरक्षा में इस्तेमाल किए.

जस्टिस जे.जे. मुनीर और जस्टिस संजीव कुमार की खंडपीठ ने पाया कि अभियोजन पक्ष Evidence के आधार पर तिकम सिंह की 20 चोटों को स्पष्ट करने में विफल रहा. कोर्ट ने कहा कि यदि आरोपी वास्तव में हमलावर होते, तो प्रतिकार सीधे चितेंद्र और मुनेश पर होना चाहिए था, न कि निहत्थे तिकम सिंह पर. घटनास्थल से न तो भाला बरामद हुआ न ही पउना, जिससे चोटों के कारण को लेकर संदेह पैदा होता है. मेडिकल Evidence के अनुसार भी चोटों की प्रकृति भाले से मेल नहीं खाती.

कोर्ट ने माना कि तिकम सिंह पर हमला होते देख उनके पुत्रों को अपने पिता की जान को खतरे की उचित आशंका हुई, और भारतीय दंड संहिता की धारा 97 के तहत उन्हें अपने पिता की रक्षा के लिए निजी प्रतिरक्षा का अधिकार प्राप्त था.

कोर्ट ने ट्रायल कोर्ट के फैसले को Evidence के गलत मूल्यांकन पर आधारित बताते हुए रद्द कर दिया और दोनों अपीलकर्ताओं को सभी आरोपों से बरी कर दिया. मामले में तीसरा आरोपी तिकम सिंह अपील के दौरान ही निधन हो गया था, जिसके चलते उसके खिलाफ अपील पहले ही समाप्त हो चुकी थी.

हत्या आरोपी की आजीवन कारावास की सजा बरकरार, अपील खारिज हाई कोर्ट ने कहा, चश्मदीद गवाह (Evidence) रिश्तेदार होने से गवाही अमान्य नहीं

इलाहाबाद हाईकोर्ट ने मुरादाबाद की एक चर्चित हत्या के मामले में तीन दोषियों की सजा को बरकरार रखते हुए उनकी अपीलें खारिज कर दी हैं. जस्टिस जेजे मुनीर और जस्टिस विनय कुमार द्विवेदी की खंडपीठ ने यह फैसला सुनाया. कोर्ट ने जमानत पर चल रहे आरोपितों को पंद्रह दिन के भीतर सीजेएम मुरादाबाद के समक्ष आत्मसमर्पण करने का आदेश दिया है.

27 सितंबर 1987 की रात करीब 9:45 बजे मुरादाबाद के कुंदरकी थाना क्षेत्र के एक गांव में अखंड रामायण पाठ सुनकर घर लौट रहे राम कुंवर को महेश, नरेश उर्फ छोटे, वीरपाल और बलिस्टर नामक चार लोगों ने घेर लिया. आरोप है कि महेश, नरेश और वीरपाल के पास बंदूकें थीं जबकि बलिस्टर के पास तमंचा था. तीनों ने मिलकर राम कुंवर पर गोली चला दी, जिससे उसकी मौके पर ही मौत हो गई.

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इसके बाद आरोपी शव को रस्सी से घसीटते हुए ले गए और जंगल में उसका सिर धड़ से अलग कर दिया ताकि Evidence मिटाया जा सके. गोलीबारी में मौके पर मौजूद एक लड़की वीरम को भी छर्रे लगे थे. शव  का धड़ 4 अक्टूबर 1987 को नजरुद्दीन के गन्ने के खेत से बरामद हुआ, लेकिन सिर बरामद नहीं हो सका.

मृतक के भाई रोहतास सिंह उर्फ छोटे की शिकायत पर मुकदमा दर्ज हुआ था. सत्र न्यायालय, मुरादाबाद ने Evidence के आधार पर 2 मई 1989 को महेश, नरेश और वीरपाल को धारा 302 आईपीसी और बलिस्टर को धारा 302/34 आईपीसी के तहत दोषी करार देते हुए आजीवन कारावास व जुर्माने की सजा सुनाई थी. इसके अलावा धारा 201 और 324/34 आईपीसी में भी अलग-अलग सजा दी गई थी.

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दोषियों ने सजा के खिलाफ हाईकोर्ट में अपील की थी, जिसमें एफआईआर दर्ज करने में देरी, गवाहों के मृतक से रिश्तेदार होने और हत्या का मकसद न होने जैसे तर्क दिए गए. हालांकि कोर्ट ने पाया कि घटना के महज साढ़े चार घंटे के भीतर रिपोर्ट दर्ज हो गई थी, जो देरी नहीं मानी जा सकती. कोर्ट ने यह भी कहा कि रिश्तेदार गवाहों की गवाही (Evidence) सिर्फ इस आधार पर खारिज नहीं की जा सकती कि वे मृतक के परिजन हैं, बशर्ते वे घटना के प्रत्यक्षदर्शी हों.

कोर्ट ने पोस्टमार्टम रिपोर्ट और चश्मदीद गवाहों के बयानों (Evidence)में पूरा तालमेल पाया. मकसद के तौर पर यह बात सामने आई कि मृतक राम कुंवर पर आरोपी महेश की बहन सुमन को भगाने का मामला दर्ज था, जिसके चलते दुश्मनी थी. इन सब आधारों पर हाईकोर्ट ने ट्रायल कोर्ट के फैसले में कोई खामी न पाते हुए तीनों अपीलों को खारिज कर दिया.

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