Child Custody मामलों में वित्तीय स्थिति नहीं, बल्कि बच्चे का कल्याण सर्वोपरि, नाबालिग बेटे की कस्टडी 2 माह में माँ को सौंपने का आदेश
उच्च न्यायालय ने ट्रायल कोर्ट के फैसले को किया सेट असाइड

इलाहाबाद उच्च न्यायालय ने पारिवारिक विवादों और Child Custody (संरक्षकता) से जुड़े मामलों में एक अत्यंत महत्वपूर्ण और दूरगामी फैसला सुनाया है. अदालत ने स्पष्ट किया है कि माता-पिता में से किसी एक की आर्थिक स्थिति या संपन्नता को Child Custody तय करने का एकमात्र आधार नहीं बनाया जा सकता है. अदालत के अनुसार, बच्चे का कल्याण (Welfare of the Child), उसका मानसिक और नैतिक विकास तथा उसका सुरक्षित परिवेश ही किसी भी मामले में सर्वोपरि और प्राथमिक विचार होना चाहिए.
यह फैसला जस्टिस सरल श्रीवास्तव और जस्टिस सुधांशु चौहान की खंडपीठ ने प्रीति शर्मा बनाम प्रवीण प्रकाश शर्मा के मामले में सुनवाई करते हुए दिया है. इस निर्णय ने देश भर की पारिवारिक अदालतों और कानूनी गलियारों में एक नई बहस छेड़ दी है, जहाँ अक्सर Child Custody (संरक्षकता) से जुड़े मामलों में वित्तीय रूप से मजबूत पक्ष को प्राथमिकता दे दी जाती थी.
तथ्यों के अनुसार, प्रीति शर्मा और प्रवीण प्रकाश शर्मा का विवाह 19 फरवरी 2007 को हिन्दू रीति-रिवाजों के साथ वाराणसी में हुआ था. शादी के बाद उनके दो बेटे हुए- यथार्थ शर्मा और अनिकेत @ समर्थ शर्मा. आरोप है कि अप्रैल 2016 में पति ने अपनी पत्नी को वाराणसी स्थित मायके में छोड़ दिया और बड़े बेटे यथार्थ शर्मा को अपने साथ ले गया, जिससे माँ और छोटे बेटे को अकेला छोड़ दिया गया.
इसके बाद पति की तरफ से तलाक का मुकदमा दाखिल किया गया, जो बाद में खारिज हो गया. वहीं, पत्नी की ओर से कंजुल राइट्स (दांपत्य अधिकारों की बहाली) का मुकदमा दायर किया गया, जिसे अदालत ने स्वीकार कर लिया था. इसके बावजूद पति ने न तो पत्नी को अपने साथ रखा और न ही उचित देखभाल की. निचली अदालत ने मां (प्रीति शर्मा) की वित्तीय स्थिति कमजोर होने और आय का स्वतंत्र साधन न होने का हवाला देते हुए Child Custody पिता को सौंप दी थी, जिसके खिलाफ यह अपील उच्च न्यायालय में दाखिल की गई थी.
इलाहाबाद उच्च न्यायालय ने निचली अदालत के Child Custody फैसले को खारिज करते हुए कई कड़े और मार्गदर्शक कानूनी सिद्धांत प्रतिपादित किए:

वित्तीय सम्पन्नता एकमात्र पैमाना नहीं: खंडपीठ ने स्पष्ट किया कि पिता या माता का अमीर होना या बच्चे को भौतिक सुख-सुविधाएं और महंगी शिक्षा देना ही Child Custody का एकमात्र आधार नहीं हो सकता. यदि कोई पिता आर्थिक रूप से मजबूत है, लेकिन वह न्यायिक आदेशों की अवहेलना करता है और बच्चे के नैतिक तथा सामाजिक विकास के लिए अनुकूल माहौल नहीं दे पाता, तो उसका दावा कमजोर हो जाता है.
पारिवारिक अदालतों और प्राकृतिक न्याय के सिद्धांत: अदालत ने इस बात पर भी जोर दिया कि यद्यपि पारिवारिक न्यायालय अधिनियम की धारा 14 के तहत साक्ष्य अधिनियम के कड़े नियम पारिवारिक अदालतों पर पूरी तरह लागू नहीं होते, इसका यह अर्थ कतई नहीं है कि अदालतें प्राकृतिक न्याय के सिद्धांतों (जैसे जिरह या क्रॉस-एग्जामिनेशन का अवसर देना) की अनदेखी कर दें. इस मामले में पति बिना क्रॉस-एग्जामिनेशन का सामना किए केवल शपथ पत्र के सहारे लाभ लेने की कोशिश कर रहा था, जिसे उच्च न्यायालय ने अनुचित ठहराया.
दूसरा विवाह और बच्चे पर प्रभाव: अदालत ने इस बात का भी संज्ञान लिया कि पति ने वैवाहिक संबंध जीवित रहते हुए दूसरा विवाह कर लिया था. ऐसी स्थिति में बच्चे के मन पर और उसकी परवरिश पर सौतेली माँ के व्यवहार का क्या असर पड़ेगा, यह एक अत्यंत संवेदनशील और महत्वपूर्ण बिंदु है, जिसे अनदेखा नहीं किया जा सकता. सर्वोच्च न्यायालय के पूर्व के कई फैसलों का हवाला देते अदालत ने माना कि ऐसी परिस्थितियों में बच्चे को माँ का आत्मीय और सुरक्षित आंचल मिलना अधिक उचित है.
माँ के मिलने के अधिकार की अनदेखी: निचली अदालत ने इस आधार पर Child Custody नहीं दी थी कि माँ ने पिछले कुछ समय से बच्चे से मुलाकात नहीं की थी. उच्च न्यायालय ने इस तर्क को सिरे से खारिज करते हुए कहा कि यह माँ की इच्छा नहीं थी, बल्कि पिता द्वारा रची गई बाधाओं और कानूनी पेंचों के कारण माँ को जबरन उसके बच्चे से दूर रखा गया था. कोई भी गलत काम करने वाला व्यक्ति अपने ही गलत आचरण का कानूनी लाभ नहीं उठा सकता.
इलाहाबाद उच्च न्यायालय ने निचली अदालत के फैसले को पूरी तरह से अपास्त (सेट-असाइड) कर दिया. अदालत ने निर्देश दिया कि नाबालिग बेटे, मास्टर यथार्थ शर्मा की Child Custody उसकी माँ (प्रीति शर्मा) को एक महीने के भीतर सौंपी जाए. इसके साथ ही, पिता के अधिकारों का भी ध्यान रखा गया है ताकि बच्चे के समग्र विकास में पिता का मार्गदर्शन भी मिलता रहे. अदालत ने व्यवस्था दी है कि पिता प्रवीण प्रकाश शर्मा हर शनिवार को दोपहर 3:00 बजे से शाम 5:00 बजे के बीच जिला विधिक सेवा प्राधिकरण (DLSA), वाराणसी के परिसर में अपने बेटे से मिल सकेंगे.
यह फैसला उन तमाम मामलों में एक मजबूत नजीर बनेगा जहाँ माता-पिता के आपसी विवादों में Child Custody को वर्चस्व की लड़ाई बना लिया जाता है. उच्च न्यायालय ने एक बार फिर साबित कर दिया है कि कानून की नजर में बच्चा कोई संपत्ति या वस्तु नहीं है, बल्कि उसके मानवीय अधिकार और उसका उज्ज्वल भविष्य ही सबसे महत्वपूर्ण है.