Sanctioned post पर कार्यरत शिक्षक को केवल देरी के आधार पर बकाये वेतन से वंचित नहीं किया जा सकता: इलाहाबाद हाई कोर्ट

इलाहाबाद हाई कोर्ट ने स्पष्ट किया है कि यदि कोई शिक्षक Sanctioned post पर विधिवत कार्यरत रहा है और सरकार स्वयं उसके नियमित वेतन भुगतान का आदेश जारी कर चुकी है, तो उसे केवल प्रशासनिक देरी या याचिका दाखिल करने में हुई देरी के आधार पर उसके बकाये वेतन से वंचित नहीं किया जा सकता. जस्टिस मंजू रानी चौहान की एकल पीठ ने बलिया जिले के प्रवक्ता अशोक कुमार सिंह द्वारा दाखिल याचिका (WRIT-A No. 12682 of 2026) को स्वीकार करते हुए जिला विद्यालय निरीक्षक बलिया द्वारा 5 मई 2026 को पारित निरसन आदेश को रद्द कर दिया.
अदालत ने मामले को पुनः DIOS बलिया को प्रेषित करते हुए दो माह के भीतर सात तय मापदंडों की जांच कर Sanctioned post पर विधिवत कार्यरत शिक्षक को बकाये वेतन का भुगतान सुनिश्चित करने का आदेश दिया है. याचिकाकर्ता अशोक कुमार सिंह की नियुक्ति 31 मई 1991 को एल.टी. ग्रेड सहायक अध्यापक के Sanctioned post पर हुई थी. इसके पश्चात उप शिक्षा निदेशक (माध्यमिक), आजमगढ़ मंडल द्वारा 3 मई 1997 को उनकी सेवाओं का नियमितीकरण कर दिया गया. 7 अगस्त 2008 को कृषि जीव विज्ञान के प्रवक्ता का पद रिक्त होने पर याचिकाकर्ता को प्रवक्ता पद पर पदोन्नत किया गया.
हालांकि, उस समय प्रदेश भर में सरप्लस कर्मचारियों और पद सृजन के विवादों के कारण Sanctioned post पर नियुक्ति के बाद भी याचिकाकर्ता सहित कई शिक्षकों का वेतन रोक दिया गया था. इसके खिलाफ हाई कोर्ट में कई याचिकाएं दाखिल की गईं, जिनमें मुख्य याचिका ध्रुव नारायण सिंह बनाम यूपी राज्य व अन्य (Civil Misc. Writ Petition No. 26307 of 2010) थी.
13 जनवरी 2017 को हाईकोर्ट ने उक्त याचिकाओं का निस्तारण करते हुए आदेश दिया था कि Sanctioned post पर कार्यरत पाए गए सभी शिक्षकों का रुका हुआ वेतन दो महीने के भीतर जारी किया जाए. याचिकाकर्ता के अधिवक्ता ने अदालत के समक्ष पक्ष रखते हुए बताया कि 1 फरवरी 2016 के शासनादेश के अनुसार विद्यालय में प्रवक्ता के सात पद स्वीकृत पाए गए थे. इसी आधार पर मुख्य सचिव, उत्तर प्रदेश शासन के निर्देशों के क्रम में याचिकाकर्ता को अन्य छः सहकर्मियों के साथ नियमित वेतन का भुगतान प्रारंभ कर दिया गया था.
नियमित वेतन मिलने के बावजूद याचिकाकर्ता को उनके बकाये वेतन की राशि का भुगतान नहीं किया गया. इसमें फरवरी 2010, मई 2010 से जून 2013, फरवरी 2016 का वेतन, वर्ष 2009-10 से 2012-13 का बोनस तथा जनवरी 2010 से अप्रैल 2010 तक का महंगाई भत्ता (DA) शामिल था. कई बार प्रत्यावेदन देने के बाद भी जब अधिकारियों ने कोई कार्रवाई नहीं की, तो याचिकाकर्ता ने पूर्व में Writ-A No. 16009 of 2025 दाखिल की. हाईकोर्ट ने अधिकारियों को निस्तारण का निर्देश दिया था, जिसके अनुपालन में DIOS बलिया ने 5 मई 2026 को याचिकाकर्ता के दावे को केवल ‘अत्यधिक देरी से आने’ के आधार पर खारिज कर दिया था.
राज्य सरकार की ओर से पेश विद्वान स्थायी वकील शैलेंद्र सिंह ने DIOS के आदेश का बचाव किया. उन्होंने तर्क दिया कि 18 अप्रैल 2019 के शासनादेश के तहत एक समिति का गठन किया गया था, जिसे बकाया वेतन के मामलों में सात बिंदुओं/मानदंडों पर जांच करनी होती है. इसके अतिरिक्त, सरकारी पक्ष ने दावा किया कि याचिकाकर्ता ने अपने अधिकारों की रक्षा के लिए न्यायालय का दरवाजा खटखटाने में काफी विलंब किया है.
अपने पक्ष के समर्थन में राज्य सरकार ने भागीरथी प्रसाद शर्मा बनाम यूपी राज्य (2024), संतोष कुमारी उप्पल बनाम यूपी राज्य (2026) तथा सर्वोच्च न्यायालय के सेंट्रल कोलफील्ड्स लिमिटेड बनाम पारदेन उरांव (2021) जैसे निर्णयों का हवाला देते हुए तर्क दिया कि जो व्यक्ति अपने अधिकारों के प्रति सतर्क नहीं रहता, उसे विलंब के आधार पर राहत नहीं मिलनी चाहिए.
कोर्ट ने अपने फैसले में कहा कि सरकार Sanctioned post की संख्या की जांच के बाद याचिकाकर्ता को वेतन देने का निर्देश दे
दोनों पक्षों की बहस सुनने के बाद जस्टिस मंजू रानी चौहान ने राज्य सरकार के तर्कों को खारिज कर दिया. अदालत ने अपने फैसले में कहा कि जब राज्य सरकार ने Sanctioned post की संख्या की जांच के बाद 1 फरवरी 2016 को ही याचिकाकर्ता को वेतन देने का निर्देश दे दिया था और हाईकोर्ट ने 13 जनवरी 2017 के आदेश में इसे संज्ञान में लिया था, तो अब केवल विलंब के आधार पर एरियर (बकाया राशि) रोकने का कोई न्यायसंगत आधार नहीं बनता.
अदालत ने कहा कि जब याचिकाकर्ता Sanctioned post के विरुद्ध कार्यरत होने के कारण पहले से ही नियमित वेतन प्राप्त कर रहा है, तो उसे बकाये वेतन का भुगतान सिर्फ इसलिए नहीं रोका जा सकता कि उसने अधिकारियों के समक्ष देर से गुहार लगाई, जबकि वह लगातार प्रत्यावेदन देता रहा है.
हाईकोर्ट द्वारा तय किए गए 7 अनिवार्य मापदंड
- अदालत ने DIOS बलिया द्वारा पारित 5 मई 2026 के निरसन आदेश को असंवैधानिक और प्राकृतिक न्याय के सिद्धांतों के विपरीत मानते हुए रद्द कर दिया. इसके साथ ही मामले को पुनः DIOS बलिया के पास भेजते हुए आदेश दिया कि वे दो महीने के भीतर निम्नलिखित 7 मापदंडों का सत्यापन कर याचिकाकर्ता के एरियर का भुगतान करें:
- पद की स्वीकृति: नियुक्ति के समय पद स्वीकृत (Sanctioned post) और उपलब्ध था या नहीं.
- विज्ञापन: Sanctioned post का विज्ञापन राज्य में व्यापक प्रसार वाले दो समाचार पत्रों में प्रकाशित हुआ था या नहीं.
- चयन समिति: चयन प्रक्रिया के लिए नियमानुसार चयन समिति का गठन किया गया था या नहीं.
- विधिपूर्वक चयन: चयन प्रक्रिया कानून द्वारा स्थापित प्रक्रिया के अनुसार संचालित हुई थी या नहीं.
- सक्षम प्राधिकारी का अनुमोदन: Sanctioned post पर चयन को सक्षम प्राधिकारी द्वारा अनुमोदित किया गया था या नहीं.
- न्यूनतम योग्यता: Sanctioned post पर उम्मीदवार चयन की तिथि पर पद के लिए आवश्यक न्यूनतम योग्यता रखता था या नहीं.
- वास्तविक कार्य की पुष्टि: जिस अवधि के बकाये वेतन का दावा किया जा रहा है, उस दौरान उम्मीदवार ने वास्तव में अपने कर्तव्यों का पालन किया था या नहीं.
इलाहाबाद हाईकोर्ट के इस निर्णय से उत्तर प्रदेश के अशासकीय सहायता प्राप्त और शासकीय माध्यमिक विद्यालयों के उन हज़ारों शिक्षकों और कर्मचारियों को बड़ी राहत मिलेगी, जिनके बकाये वेतन के मामले वर्षों से प्रशासनिक लालफीताशाही और ‘विलंब’ के बहानों के कारण लंबित पड़े थे. अदालत ने स्पष्ट संदेश दिया है कि यदि सेवा और नियुक्ति वैध है, तो हक के बकाये को तकनीकी आधार पर रोकना गैर-कानूनी है.