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Sports colleges के शिक्षक उत्तर प्रदेश लोक सेवा (अधिकरण) अधिनियम, 1976 के तहत ‘लोक सेवक’ की श्रेणी में नहीं आते

इलाहाबाद हाई कोर्ट की लखनऊ बेंच के दो जजों ने ट्रिब्यूनल के फैसले को किया रद्द, शिक्षक को उचित फोरम में जानें की छूट

Sports colleges के शिक्षक उत्तर प्रदेश लोक सेवा (अधिकरण) अधिनियम, 1976 के तहत 'लोक सेवक' की श्रेणी में नहीं आते

इलाहाबाद हाई कोर्ट की लखनऊ बेंच ने स्पष्ट किया है कि उत्तर प्रदेश Sports colleges Society द्वारा संचालित कॉलेजों के शिक्षक और कर्मचारी उत्तर प्रदेश लोक सेवा (अधिकरण) अधिनियम, 1976 के तहत ‘लोक सेवक’ की श्रेणी में नहीं आते हैं. उत्तर प्रदेश राज्य लोक सेवा अधिकरण के एक महत्वपूर्ण आदेश को खारिज करते हुए कोर्ट ने कहा कि ऐसे Sports colleges के शिक्षक व कर्मचारी राज्य सरकार के प्रत्यक्ष कर्मचारी नहीं हैं, बल्कि एक स्वायत्त निकाय द्वारा नियुक्त किए जाते हैं.

यह फैसला जस्टिस आलोक माथुर और जस्टिस अमिताभ कुमार राय की बेंच ने ‘प्रिंसिपल, गुरु गोविंद सिंह स्पोर्ट्स कॉलेज बनाम उ.प्र. राज्य लोक सेवा अधिकरण व अन्य’ (WRIT – A No. 3923 of 2026) की याचिका पर सुनवाई करते हुए सुनाया. पूरा मामला गुरु गोविंद सिंह स्पोर्ट्स कॉलेज, लखनऊ के पूर्व सहायक शिक्षक (फुटबॉल) हरवीर सिंह से जुड़ा है. हरवीर सिंह की नियुक्ति वर्ष 1994 में Sports colleges, देहरादून (तब उत्तर प्रदेश का हिस्सा) में हुई थी.

उत्तर प्रदेश के पुनर्गठन के बाद, वर्ष 2001 में उन्हें गुरु गोविंद सिंह Sports College, लखनऊ स्थानांतरित कर दिया गया. वर्ष 2023 में सेवानिवृत्त होने के बाद, वेतन निर्धारण (Pay Fixation) में हुई गड़बड़ी के सुधार और उनसे की जा रही वसूली के आदेशों को चुनौती देते हुए उन्होंने राज्य लोक सेवा अधिकरण (Tribunal) में एक याचिका (Claim Petition) दायर की थी.

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Sports colleges प्रशासन ने ट्रिब्यूनल के समक्ष प्राथमिक आपत्ति दर्ज कराई कि हरवीर सिंह एक ‘लोक सेवक’ नहीं हैं, इसलिए ट्रिब्यूनल को इस याचिका पर सुनवाई करने का क्षेत्राधिकार नहीं है. हालांकि, ट्रिब्यूनल ने 4 सितंबर 2025 को इस आपत्ति को खारिज करते हुए याचिका को सुनवाई योग्य माना था. ट्रिब्यूनल का तर्क था कि Sports colleges का खर्च राज्य सरकार के खेल विभाग द्वारा वहन किया जाता है, इसलिए कर्मचारी ‘लोक सेवक’ की श्रेणी में आते हैं. ट्रिब्यूनल के आदेश के खिलाफ Sports colleges प्रशासन ने इलाहाबाद हाईकोर्ट की लखनऊ पीठ में रिट याचिका दायर की थी.

Sports colleges को लेकर हाईकोर्ट का तर्क और मुख्य बिंदु:-

उच्च न्यायालय ने ट्रिब्यूनल के तर्क को सिरे से खारिज करते हुए मामले के कानूनी और प्रशासनिक पहलुओं का गहराई से विश्लेषण किया:-

सोसाइटी का स्वायत्त स्वरूप: अदालत ने पाया कि उत्तर प्रदेश Sports colleges सोसाइटी, समिति पंजीकरण अधिनियम, 1860 के तहत पंजीकृत एक स्वतंत्र और स्वायत्त संस्था है. यद्यपि इसके प्रबंध बोर्ड (Board of Management) में राज्य सरकार के वरिष्ठ अधिकारी शामिल हैं, लेकिन इससे सोसाइटी का स्वतंत्र कानूनी अस्तित्व समाप्त नहीं होता.

नियुक्ति और वेतन का आधार: शिक्षकों की नियुक्ति Sports colleges के प्रधानाचार्य द्वारा प्रबंध बोर्ड के अनुमोदन से की जाती है. अदालत ने स्पष्ट किया कि भले ही राज्य सरकार इन कॉलेजों को ‘अनुदान-इन-एड’ (Grant-in-Aid) देती है, लेकिन अनुदान पर चलने वाली संस्था के कर्मचारी सीधे राज्य सरकार के वेतनभोगी नहीं माने जा सकते.

‘लोक सेवक’ की परिभाषा से बाहर: उत्तर प्रदेश लोक सेवा (अधिकरण) अधिनियम, 1976 की धारा 2(b) के तहत केवल राज्य सरकार के कर्मचारियों, स्थानीय प्राधिकरणों या राज्य द्वारा स्वामित्व/नियंत्रित निगमों (Corporations) के कर्मचारियों को ही लोक सेवक माना गया है. Sports colleges सोसाइटी न तो कोई निगम है और न ही स्थानीय निकाय. इसलिए इसके शिक्षक लोक सेवक नहीं हैं.

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याचिका में Sports colleges प्रशासन की ओर से यह तर्क भी दिया गया था कि सेवानिवृत्ति के बाद वेतन निर्धारण का मुद्दा ‘सेवा संबंधी मामला’ (Service Matter) नहीं माना जाना चाहिए. हालांकि, अदालत ने इस तर्क को खारिज कर दिया. अदालत ने उच्चतम न्यायालय के पूर्व फैसलों का हवाला देते हुए कहा कि गलत वेतन निर्धारण एक सतत चलने वाली त्रुटि (Continuing Wrong) है, जो हर महीने कर्मचारी और बाद में पेंशनभोगी की पेंशन को प्रभावित करती है. इसलिए यह स्पष्ट रूप से सेवा शर्तों के तहत आता है.

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हाई कोर्ट ने ट्रिब्यूनल द्वारा पारित 4 सितंबर 2025 के आदेश को पूरी तरह रद्द कर दिया और ट्रिब्यूनल में लंबित याचिका को भी खारिज (Quash) कर दिया. हालांकि, अदालत ने हरवीर सिंह को राहत देते हुए यह स्पष्ट किया कि वे अपने वेतन पुननिर्धारण और वसूली से जुड़े विवाद के समाधान के लिए अन्य उपयुक्त मंचों पर जा सकते हैं. अदालत ने उन्हें संविधान के अनुच्छेद 226 के तहत उच्च न्यायालय में रिट याचिका दाखिल करने का विकल्प भी खुला रखा है.

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