20 साल की Service पूरी किए बिना स्वेच्छा से इस्तीफा देने वाले बीएसएफ जवान को पेंशन का हक नहीं, याचिका खारिज

इलाहाबाद हाईकोर्ट ने कहा है कि सीमा सुरक्षा बल का जो जवान 20 साल की अर्हक Service पूरी किए बिना स्वेच्छा से इस्तीफा देता है, वह पेंशन का हकदार नहीं है. जस्टिस जस्टिस अनीश कुमार गुप्ता की सिंगल बेंच ने 23 सितंबर 2026 को पूर्व कॉन्स्टेबल बचा लाल सिंह की याचिका खारिज कर दी. याचिकाकर्ता 22 अक्टूबर 1973 को बीएसएफ में कॉन्स्टेबल नियुक्त हुए थे. पारिवारिक कारणों से (भाई की मृत्यु, वृद्ध माता-पिता और घर में कोई पुरुष सदस्य न होना) उन्होंने 13 सितंबर 1984 को Service से इस्तीफा दे दिया.
Service से इस्तीफा देने के बाद 29 सितंबर 1984 को साक्षात्कार में उन्हें इस्तीफे के परिणाम समझाए गए, फिर भी उनके आग्रह पर Service से इस्तीफा स्वीकार हुआ और 1 अक्टूबर 1984 से प्रभावी हुआ. 1985 में उन्होंने दोबारा भर्ती की कोशिश की कि उन्हें Service में वापस ले लिया जाय लेकिन उनकी मांग को 12 फरवरी 1985 को खारिज कर दिया गया. इसके बाद करीब 15 साल चुप रहने के बाद उन्होंने 2000 में पेंशन की मांग करते हुए विभाग में आवेदन किया. उनके इस आवेदन को नियमों का हवाला देते हुए 20 जून 2000 को अस्वीकार कर दिया गया. इसी आदेश को उन्होंने याचिका में चुनौती दी थी.
याचिकाकर्ता के अधिवक्ता ने सीसीएस (पेंशन) नियम, 1972 के नियम 49 और सुप्रीम कोर्ट के बसीरभाई आर. खिलजी (2007) फैसले का हवाला दिया. उनका कहना था कि 10 साल 11 महीने 10 दिन की Service के बाद वे पेंशन के हकदार हैं. कोर्ट ने कहा कि याचिकाकर्ता के अधिवक्ता जिस फैसले का हवाला दे रहे हैं उसकी कंडीशन अलग है.
कोर्ट ने वह नियम दिखाने के लिए कहा, जिसके आधार पर Service से इस्तीफा देने के बाद याचिकाकर्ता पेंशन के लिए पात्र बन पाता था
कोर्ट ने उन्हें वह नियम दिखाने के लिए कहा, जिसके आधार पर Service से इस्तीफा देने के बाद याचिकाकर्ता पेंशन के लिए पात्र बन पाता था. उधर भारत सरकार के अधिवक्ता ने कहा कि बीएसएफ में जवानों के प्रशिक्षण पर भारी धन और समय खर्च होता है, इसलिए मर्जी से इस्तीफे के लिए न्यूनतम 20 साल की Service का प्रावधान किया गया है. इससे पहले किसी को अपनी मर्जी से इस्तीफा देने की छूट नहीं दी जा सकती.
चूंकि याचिकाकर्ता को पहले ही इन तथ्यों से अवगत करा दिया गया था, इसके बाद भी उन्होंने Service से त्यागपत्र दिया था. उन्होंने इस तरफ भी कोर्ट का ध्यान आकृष्ट कराया कि Service में पुन: लिये जाने की मांग खारिज कर दिये जाने के बाद वह 15 साल तक खामोश रहे और फिर पेंशन की मांग में आवेदन किया.
दोनों पक्षों की तरफ से पेश किये गये तर्कों को सुनने के बाद हाईकोर्ट ने कहा कि नियम 49 केवल पेंशन की गणना की प्रक्रिया बताता है, न्यूनतम अर्हक Service तय नहीं करता. सीसीएस पेंशन नियमों का नियम 26 इस्तीफे पर पिछली Service जब्त होने का प्रावधान करता है. बसीरभाई का मामला अलग है, क्योंकि वह इस्तीफे का नहीं बल्कि दोनों कानों की क्षति से अमान्य होकर डिस्चार्ज होने का मामला था.
कोर्ट ने यह भी कहा कि याची ने न तो इस्तीफा स्वीकार करने के आदेश को चुनौती दी और न ही दोबारा भर्ती से इन्कार के आदेश को. 15 साल की अस्पष्टीकृत देरी के आधार पर भी याचिका सुनवाई योग्य नहीं थी. इन आधारों पर याचिका खारिज कर दी गई.
याचिका में नहीं Facts का खुलासा नहीं किया गया तो उसे मौखिक बहस में स्वीकार नहीं किया जा सकता

याची को 13 अगस्त 2020 को देशी शराब की दूकान का लाइसेंस मिला था. 21 अक्टूबर 2020 को जिलाधिकारी मऊ ने उनकी दुकान का निरीक्षण किया था. Facts के अनुसार निरीक्षण के दौरान जिलाधिकारी ने तमाम अनियमितताओं को पकड़ा था. इसके आधार पर दुकान के खिलाफ 21 नवंबर 2020 को कारण बताओ नोटिस जारी किया गया और थाना कोतवाली, मऊ में आईपीसी की धारा 419, 420, 270 सहित उत्तर प्रदेश आबकारी अधिनियम की धारा 34, 64 व 68 के तहत एफआईआर दर्ज कराया गया.
इसके आधार पर 12 दिसंबर 2020 को लाइसेंस निरस्त कर दिया गया. अपील में 23 दिसंबर 2020 को यह आदेश रद्द कर मामला वापस भेजा गया, लेकिन उसी दिन नया नोटिस जारी हुआ और 29 दिसंबर 2020 को लाइसेंस फिर निरस्त कर दिया गया. इसके खिलाफ अपील 5 अक्टूबर 2021 को खारिज हो गई, जिसके बाद याची हाईकोर्ट पहुंचा.
याची के अधिवक्ता ने कहा कि आबकारी अधिनियम की धारा 74 और 1 अक्टूबर 2019 की आबकारी नीति के तहत अपराध शमनीय थे, इसलिए लाइसेंस रद्द करने के बजाय शमन किया जा सकता था. साथ ही याची आदतन अपराधी नहीं है. इसलिए भी उसके खिलाफ इस तरह की कार्रवाई नहीं की जानी चाहिए थी. इसी के आधार पर याचिकाकर्ता के अधिवक्ता ने आग्रह किया कि दुकान का लाइसेंस रद्द करने का फैसला कर दिया जाना चाहिए.
राज्य की ओर से अपर मुख्य स्थायी अधिवक्ता ने कहा कि याचिका में यह यह Facts सामने रखे ही नहीं गए. कोर्ट ने यह दलील मानी और कहा कि याची को संबंधित वैधानिक प्रावधान व आबकारी नीति का उल्लेख करना, यह बताना कि यह आधार अपीलीय प्राधिकारी के सामने उठाया गया था और उस पर विचार नहीं हुआ, याचिका में स्पष्ट रूप से लिखना जरूरी था.
कोर्ट ने कहा कि ऐसी बुनियादी दलीलों के बिना याची मौखिक बहस में नया मामला खड़ा नहीं कर सकता, इससे प्रतिवादियों को जवाब देने का अवसर भी नहीं मिलता. इसी आधार पर कोर्ट ने आदेशों में हस्तक्षेप से इन्कार करते हुए याचिका खारिज कर दी.