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30 करोड़ से अधिक के फतेहाबाद विद्युत Scam में दर्ज FIR इलाहाबाद हाई कोर्ट ने रद्द करने से किया इनकार

30 करोड़ से अधिक के फतेहाबाद विद्युत Scam में दर्ज FIR इलाहाबाद हाई कोर्ट ने रद्द करने से किया इनकार

इलाहाबाद हाई कोर्ट ने दक्षिणांचल विद्युत वितरण निगम लिमिटेड (DVVNL) के अंतर्गत फतेहाबाद (आगरा) विद्युत वितरण खंड में हुए बहुचर्चित टेंडर Scam और वित्तीय अनियमितताओं के मामले में एक कड़ा रुख अपनाया है. जस्टिस चंद्रधारी सिंह और जस्टिस तरुण सक्सेना की बेंच ने नीरज पाठक बनाम उत्तर प्रदेश राज्य व अन्य मामलों में Scam से जुड़ी दर्जनों आपराधिक रिट याचिकाओं को खारिज करते हुए स्पष्ट किया है कि प्रथम दृष्टया संज्ञेय अपराध बनता है और इस स्तर पर प्रथम सूचना रिपोर्ट को रद्द नहीं किया जा सकता.

यह पूरा विवाद वित्तीय वर्ष 2023-24, 2024-25 और 2025-26 के दौरान फतेहाबाद, आगरा में बिजली के कार्यों के टेंडर आवंटन और निष्पादन में बरती गई कथित अनियमितताओं (Scam) से जुड़ा है. मामले की गंभीरता को देखते हुए मुख्य अभियंता के स्तर पर 12 नवंबर 2025 को एक तीन सदस्यीय जांच समिति का गठन किया गया था. इस समिति ने 31 दिसंबर 2025 को अपनी विस्तृत रिपोर्ट सौंपी. रिपोर्ट में लगभग 30 करोड़ 44 लाख रुपये से अधिक की भारी-भरकम वित्तीय हानि और व्यापक स्तर पर हेराफेरी (Scam) का खुलासा हुआ.

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जांच रिपोर्ट में Scam सामने आने के बाद 10 जनवरी 2026 को थाना फतेहाबाद में केस क्राइम संख्या 0014/2026 दर्ज किया गया. इसके बाद नीरज पाठक, रवि कांत मिश्रा समेत विभिन्न विभागीय अधिकारियों, लिपिकीय कर्मचारियों और ठेकेदारों ने उच्च न्यायालय में याचिकाएं दाखिल कर एफआईआर को चुनौती दी थी.

सुनवाई के दौरान लिपिकीय कर्मचारियों के वकीलों ने दलील दी कि वे कैंप असिस्टेंट, स्टेनोग्राफर, ड्राफ्ट्समैन या लिपिक जैसे निचले पदों पर कार्यरत हैं. उनका वित्तीय या प्रशासनिक निर्णयों से कोई लेना-देना नहीं है. टेंडर प्रक्रिया और वित्तीय संस्वीकृति का कार्य उच्च स्तरीय समितियों द्वारा किया जाता है, इसलिए उन पर Scam में शामिल होने का आपराधिक दायित्व नहीं बनता. वकीलों ने तर्क दिया कि भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम की धारा 17-ए लगाने के मामले में वैधानिक प्रावधानों का उचित पालन नहीं किया गया और प्रशासनिक जांच रिपोर्ट के आधार पर की गई यह कार्रवाई दुर्भावनापूर्ण है.

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दूसरी तरफ ठेकेदारों का पक्ष रखने वाले अधिवक्ताओं की ओर से कहा गया कि कई कार्य ‘आपातकालीन श्रेणी’ के अंतर्गत नियमानुसार कराए गए थे. इसके अलावा, एक ही आईपी एड्रेस से टेंडर डाले जाने के पीछे ग्रामीण क्षेत्रों में साइबर कैफे के इस्तेमाल जैसी सामान्य वजह हो सकती है, जिसे मात्र संयोग माना जाना चाहिए.

राज्य की ओर से पेश एजीए ने कहा कि एफआईआर में नामजद आरोपियों की संलिप्तता, टेंडर नंबर, तारीख और रकम के साथ स्पष्ट रूप से उल्लेखित है. रद्द किए जा चुके टेंडरों पर अनुबंध तैयार करना, बिना टेंडर प्रकाशन के कार्य आवंटित करना और बिना वित्तीय बोलियां खोले चहेतों को ईआरपी खरीद आदेश जारी करना किसी भी सामान्य प्रशासनिक प्रक्रिया का हिस्सा नहीं हो सकता, बल्कि यह एक गहरी साजिश (Scam) का प्रमाण है.

Scam पर बेंच ने अपने विस्तृत निर्णय में सभी बिंदुओं का बारीकी से विश्लेषण किया और निम्नलिखित महत्वपूर्ण टिप्पणियां कीं:

भ्रष्टाचार अधिनियम की धारा 17-ए पर: अदालत ने स्पष्ट किया कि टेंडर में हेराफेरी, दस्तावेजों के साथ छेड़छाड़ और फर्जी समझौते करना किसी भी लोक सेवक के ‘आधिकारिक कर्तव्यों के निर्वहन’ के दायरे में नहीं आता. इस स्तर पर इस धारा का लाभ नहीं दिया जा सकता.

जांच रिपोर्ट और प्राकृतिक न्याय: अदालत ने दोहराया कि प्रशासनिक जांच रिपोर्ट प्राथमिकी दर्ज कराने का आधार बन सकती है. प्राथमिक जांच के स्तर पर प्राकृतिक न्याय के सिद्धांत का उल्लंघन होने की दलील टिक नहीं सकती, क्योंकि आरोपियों को जांच और विचारण (Trial) के दौरान अपना पक्ष रखने का पूरा अवसर मिलेगा.

टेक्नोलॉजिकल हेराफेरी और साजिश: अदालत ने माना कि बिना वित्तीय बिड खोले और कॉमन आईपी एड्रेस के जरिए बड़े पैमाने पर ठेके हासिल करना महज इत्तेफाक नहीं हो सकता. यह गहरी साजिश (Scam) और मिलीभगत की ओर इशारा करता है, जिसकी गहराई से जांच जरूरी है.

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सुप्रीम कोर्ट के प्रसिद्ध फैसलों (जैसे ‘राज्य बनाम भजनलाल’ और ‘नीनिहारिका इन्फ्रास्ट्रक्चर मामला’) का हवाला देते हुए उच्च न्यायालय ने स्पष्ट किया कि अनुच्छेद 226 के तहत असाधारण शक्तियों का प्रयोग करते हुए प्राथमिकी को तभी खारिज किया जा सकता है जब प्रथम दृष्टया कोई मामला न बनता हो. वर्तमान मामले में अपराध की गंभीरता को देखते हुए अदालत ने हस्तक्षेप करने से इंकार कर दिया और तमाम रिट याचिकाओं को खारिज कर दिया.

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